जग में जितना ढूँढा उसको
क्या कोई ऐसा प्रांगण है
उगे जहाँ हैं सुरभि कमल ?
जहाँ पहुँच कर दोनों मिलते
परम ब्रह्म व जीव अमल !
जग में जितना ढूँढा उसको
कहीं न पाया अविरत प्यार,
होश जगे तो भीतर झाँकें,
सुना जहाँ है इक भंडार !
पल-पल जन्मे पल-पल हत हो,
इस सृष्टि का इक-इक कण-कण
यह तन एक नगर है जिसमें,
छिपे हुए हैं अगणित पल-क्षण !
भुला दिया है जिसको हमने,
वह अपना ही होगा विस्तार
याद आ जाये जिस पल उसकी ,
शायद मिल जायेगा प्यार !