कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते
दीवाली अभी गयी नहीं है
भाई दूज है याद दिलाता,
बहना के अंतर में निर्मल
स्नेह की पावन धार बहाता !
पुलक जगी कैसी भीतर जब
फोन की घंटी थी खनकाई,
कानों में भाई-भाभी की
प्रीत भरी जब ध्वनि सुनाई !
हफ्तों पहले भेज दिया था
बहुत सहेज के अक्षत-केसर,
मुहं मीठा करने को बांधा
छोटी सी पुडिया में शक्कर !
सदा सुखी हो प्रियजनों सँग
यही दुआ मन आज दे रहा,
सहज हृदय की गहराई से
सबके हेतु यही कह रहा !
स्नेह ही है जीवन की थाती
दिल में इसे समाये रहते,
जग में सब कुछ मिल सकता है
कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते !
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