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शनिवार, मार्च 23

एक बूंद मानव का देय



एक बूंद मानव का देय


रंगों की बौछार हो रही
पल-पल इस सुंदर सृष्टि में,
लाखों-लाखों रंग छिपे हैं
नहीं समाते जो दृष्टि में !  

सजा मंच है इक अनंत का
प्रकृति नटी दिखाती खेल,
जैसे कोई बाजीगर हो
क्षण-क्षण घटे तत्व का मेल !

अनल दमकता, रक्तिम लपटें
स्वर्णिम आभा, हँसीं दिशाएँ,
सतरंगी उर्मियाँ रवि की
कण-कण वसुधा का रंग जाएँ !

धरा गंध का कोष लुटाती
बहे सुवासित पवन पुष्प छू,
ध्वनियाँ कैसी मधुरिम गूंजें
खग कूजित मुखरित नभ भू !

है अनंत, अनंत का सब कुछ
एक बूंद मानव का देय,
उतना ही रिसता जब उससे
मिल जाता जीवन में श्रेय !