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गुरुवार, मार्च 21

होली के रंगों में जाने

होली के रंगों में जाने 

 सभी भाव जल गये द्वेष के 

मन उजले-उजले हो आये , 

जिस पर फिर प्रियतम ने आकर 

मदिर अबीर-गुलाल लगाये !


निखर गये हैं रूप सलोने  

अंतर ज्यों आश्वस्त हुए हैं, 

होली के आने से देखो 

आज ह्रदय मदमस्त हुए हैं !


सभी नज़र आते हैं अपने 

आज एक भी नहीं पराया, 

होली के रंगों में जाने 

छुपा कौन सा राज अनोखा !


दूर-दूर ही रहते थे जो 

आज बने हैं सब हमजोली, 

मिलकर सभी मनाने आये 

प्रीत रंग की सुंदर होली !


सोमवार, मार्च 6

होली अंतर की उमंग है

होली अंतर की उमंग है


 है प्रतीक वसंत जीवन का

यौवन का इंगित वसंत है,

होली मिश्रण है दोनों का

हँसते जिसमें दिग-दिगंत है !


रस, माधुर्य,  सरसता कोमल

आशा, स्फूर्ति और मादकता,

होली अंतर की उमंग है

अमर प्रेम की परम  गहनता !


जिंदादिल उत्साह दिखाते

साहस  भीतर भर-भर पाते,

होली के स्वागत में ख़ुशियाँ 

पाते उर में और लुटाते !


सुंदर, सुखमय सजे  कल्पना  

रंगों की आपस में ठनती,

मस्तक लाल, कपोल गुलाबी

मोर पंख सी चुनरी बनती !


कण-कण वसुधा का मुस्काए 

फूलों से मन खिल-खिल जाते ,

लुटा रहा सुवास मौसम जो

चकित हुए नासापुट पाते !


हरा-भरा पुलकित  उर अंतर

कण-कण में झलके वह सुंदर,

मधुरिम, मृदुलिम निर्झर सा मन  

कल-कल करे निनाद निरंतर !


मादक पीयुष सी ऋतु  होली

अमराई में कोकिल बोली,

जोश भरा उन्मुक्त हृदय ले

निकली मत्त मुकुल की टोली !


बुधवार, अगस्त 17

भीतर रंग सुवास छिपे थे


भीतर रंग सुवास छिपे थे 


डगमग कदम पड़े थे छोटे

शिशु ने जब चलना था सीखा, 

लघु, दुर्बल काया नदिया की 

उद्गम पर जब निकसे धारा !


बार-बार गिर कर उठता जो  

इक दिन दौड़ लगाता बालक, 

तरंगिणी बीहड़ पथ तय कर 

तीव्र गति से बढ़े ज्यों धावक !


 खिला पुष्प जो आज विहँसता 

प्रथम बंद इक कलिका ही था, 

भीतर रंग सुवास छिपे थे 

किंतु कहाँ यह उसे ज्ञात था ?


हर मानव इक वृक्ष छिपाए 

बीज रूप में जग में आता, 

सीखा जिसने तपना, मिटना 

इक दिन  वह जीवन खिल जाता !


बूँद-बूँद से घट भरता है 

बने अल्प प्रयास महाशक्ति ,  

इक दिन में  परिणाम न आते  

बस छूटे नहीं धैर्य व युक्ति !


मंगलवार, मार्च 15

कुदरत की होली

कुदरत की होली 


झांको कभी निज नयनों में 

और थोड़ा सा मुस्कुराओ,

रंग भरने हैं अंतर में मोहक यदि  

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !

नीले नभ पर पीला चाँद 

रूपहले सितारों में जगमगाये  

कभी स्याह बादलों में 

इंद्र धनुष भी कौंध अपनी दिखाए !

हरे रंग से रंगी वसुंधरा

जिस पर अनगिन फूल टंके हैं 

ज़रा संभल कर जाना पथ पर

तितलियों के झुंड उड़े हैं !

होली खेलती दिनरात यह कुदरत 

जगाना उल्लास ही इसकी फ़ितरत 

केवल आदमी लड़ाई के बहाने खोजता  

जहाँ रंगों के अंबार लगते

तुच्छ बातों को एक मसला बना लेता  !

रंग सजते बन उमंग जीवन में 

भर जाते तरंग तन और मन में 

अगर रंग भरने हैं सदा के लिए अंतर में 

सहज हर भोर में

संग सूरज के खिलखिलाओ 

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !


गुरुवार, जुलाई 12

नदिया सा हर क्षण बहना है



नदिया सा हर क्षण बहना है



ख्वाब देखकर सच करना है 
ऊपर ही ऊपर चढ़ना है,  
जीवन वृहत्त कैनवास है 
सुंदर सहज रंग भरना है !

साथ चल रहा कोई निशदिन 
हो अर्पित उसको कहना है,
इक विराट कुटुंब है दुनिया 
सबसे मिलजुल कर रहना है !

ताजी-खिली रहे मन कलिका
नदिया सा हर क्षण बहना है,
घाटी, पर्वत, घर या बीहड़ 
भीतर शिखरों पर रहना है !

वर्तुल में ही बहते-बहते 
मुक्ति का सम्मन पढ़ना है,
फेंक भूत का गठ्ठर सिर से 
हर पल का स्वागत करना है !

जुड़े ऊर्जा से नित रहकर 
अंतर घट में सुख भरना है,  
छलक-छलक जाएगा जब वह 
निर्मल निर्झर सा झरना है !

बुधवार, फ़रवरी 28

गीत उपजते अधरों से यूँ






गीत उपजते अधरों से यूँ


रंग बिखेरे जाने किसने
उपवन सारा महक रहा है,
लाल, गुलाबी, नीले, पीले
कुसुमों से दिल बहक रहा है !

एक सुवास नशीली छायी
मस्त हुआ है आलम सारा,
रँगी हुई है सारी धरती
होली का है अजब नजारा !

फगुनाई भर पवन बह रही
उड़ा रही है पराग गुलाल,
सेमल झूमी, महुआ टपका
फूले कंचन, कनेर, पलाश !

कण-कण वसुधा का हर्षित है
किसने आखिर किया इशारा,
मधुमास में चहकते पंछी
जाने किसने उन्हें पुकारा !

रस टपके मुदिता भी बरसे
कुदरत सारी नई हुई है,
गीत उपजते अधरों से यूँ
जैसे वर्षा बूंद झरी है !

मौसम का ही असर हुआ है
मन मयूर दिनरात नाचता,
बासंती यह पवन सुहाना
अंतर्मन में प्यास जगाता  !

होली रंग बहाती सुखमय
तन के संग-संग मन भीगे,
सारे जग को मीत बना लें
पिचकारी से प्रीत ही बहे !

मंगलवार, मार्च 7

रंग चुरा के कुछ टेसू के




 रंग चुरा के कुछ टेसू के

सुरभि भरे निज आंचल में फिर 
गीत गा रही  पवन बसंती,
नासापुट की खत्म प्रतीक्षा 
भीगा उर फागुन  की मस्ती !

कंचन झूमा, खिला पलाश 
बौराया आम्रवन सारा,
आड़ू, नींबू सभी महकते 
कामदेव ने किया इशारा ! 

एक तरफ झरते हैं पत्ते 
नव कोमल पल्लव उग आते,
जीवन-मृत्यु संग घट रहे 
महुआ चूता भंवरे गाते !

कुसुमित प्रमुदित खिली वाटिका
ऋतुराज रचता रंगोली,
  रंग चुरा के कुछ टेसू के 
क्यों न खेलें पावन होली !



शुक्रवार, मार्च 18

थोड़ी सी हँसी


थोड़ी सी हँसी

फूल क्या लुटाते हैं ? इतना जो भाते हैं
थोडा सा रंग.. गंध थोड़ी सी
और ढेर सारी खिलावट !
नहीं उनके होने में
जरा सी भी मिलावट,
पास उनके है वही तो मात्र अपना
काया तो माटी से ली उधार है
जल और सूरज का भी उन पर उपकार है
खिलावट मात्र पर ही उनका अधिकार है

बच्चे क्या दे जाते हैं ? जो इतना लुभाते हैं
सहजता सरलता जो उनकी अपनी है
काया का कारण तो जनक-जननी है
भला है क्या हमारे पास कहने को अपना
डर नहीं कभी खोने का जिसका
थोड़ी सी हँसी, खालिस प्यार
शांति और प्रेम की बहती हुई धार !
शेष तो सब जगत से ही पाया है
जिसके होने से न कोई भी 'हो' पाया है
अपना आप ही लुटाना है
यदि फूलों सा मुस्काना है
झरनों सा गाना है
तितलियों सा इतराना है
बच्चों सा खिलखिलाना है !

शुक्रवार, मार्च 13

पास आकर दूर जाये

पास आकर दूर जाये

तितलियाँ जो उड़ रही हैं
गंध पीतीं रस समोती,
रंगे जिसने पर सजीले
उस अलख के गीत गातीं !

मौन ही होता मुखर
संग पवन जब डोलती हैं,
नृत्य झलके हर अदा में
शान से पर तोलती हैं !

हैं अनोखी कलाकृतियाँ
चमचमाते रंग धारे,
सूर्य रश्मि छू रही ज्यों
चित्र कोई कर उकेरे !

रंग बदलें धूप-छाहीं
पारदर्शी पंख भी हैं,
जाने किसकी राह देखें
लाल बुंदकी से सजी हैं !

पंख रक्तिम हैं किसी के
पीतवर्णी धारियां भी,
श्याम, नीले पर किसी के
श्वेत बूँदें तारिका सी !

हैं हजारों रूप सुंदर
रंग भी लाखों किसिम के,
बैंगनी, नीली, सजीली
पर गुलाबी हैं किसी के !

श्वेत वर्णी भी सुहाए
पास आकर दूर जाये,
बैठ जाती पर समेटे
पुष्प का आसन बनाये !

शोख रंगीं छटा जिनकी
ज्यों रंगोली हो सजी,
रंग घुले हैं इस अदा से
होड़ हो ज्यों पुष्प से ही !

विविध हैं आकार अनुपम
लघु काया है लुभाती,
मन उड़े जाता उन्हीं संग
प्रीत उनसे बंध लजाती !


कला उसकी राज खोले
मूक है जो कुछ न बोले,
तितलियों, फूलों के चर्चे
उपवनों में गीत घोलें !

आँख जैसे हो परों पर
देखती हों सब नजारे,
घूमती पुष्पों के ऊपर
नजर उनकी ज्यों उतारें !


गुरुवार, अगस्त 28

वर्तन सृष्टि का

वर्तन सृष्टि का


माँ की गोद की तरह थामे है धरा
आकाश सम्भाले है पिता के हाथ की मानिंद
मखमली गलीचों से बढ़कर
कोमल दूब का स्पर्श
जो भर जाता है एक अहसास आनिंद !
स्वर्ग और कहाँ होगा कभी ?
नाचते हुए मोर देखे हैं अभी  
सुनी है पंछियों की रुनझुन
रंगो का यह अनोखा फैलाव
सागर का उतार और चढ़ाव
झुकता हर शाम लाल फूल
पर्वतों के पीछे उन अदृश्य चरणों पर
अनुपम है चमकीले सितारों का झुरमुट
कैसा अनोखा यह वर्तन सृष्टि का
खो जाता संसार और हर तरफ
है जलवा उसी का !  

बुधवार, अगस्त 13

उसने भी कर दिया इशारा

उसने भी कर दिया इशारा

रंग हमारे हाथ लगे हैं
कैनवास है यह जग सारा,
रंगी इसे बना डालें अब
उसने भी कर दिया इशारा !

कोई गीत रचे जाता है
हम भी सुर अपने कुछ गा लें,
गूँजे स्वर्णिम स्वर लहरियाँ
उन संग आशाएं सजा लें !

रचा जा रहा पल-पल यह जग
सृजन हमारे हाथों कुछ हो,
कोई मौन सजाता निशदिन
मिलन हृदय का उससे भी हो !

बिन मांगे ही जो देता है
देख तृप्त होता है अंतर,
नजर जहाँ भी टिक जाती है
उसका ही तो दिखता मंजर !



शुक्रवार, नवंबर 22

चलो, कुछ करें

चलो, कुछ करें 


चलो उठ खड़े हों, झाड़ें सिलवटों को
मन के कैनवास को फैला लें क्षितिज तक
प्यार के रंगों से फिर कोई खूबसूरत सोच रंग डालें
बांटे आपस में हर शै जो अपनी हो
चलो आँखें बंद करें, गहरे उतर जाएँ
जानें पर्त दर पर्त अंतर्मन को
आत्मशक्तियाँ जागृत होकर एक हो जाएँ
अपना छोटे से छोटा सुख भी साझा हो जाये
चलो कह दें, सुना दें मन की हर उलझन
समझ लें, गिन लें दिल की हर धडकन
अपना सब कुछ सौंप कर निश्चिंत हो जाएँ
विश्वास का अमृत पियें
चलो करीब आयें, जश्न मनाएं
मैं और तुम से ‘हम’ होने की याद में
कोई गीत गुनगुनाएं
खुली आँखों से सपने देखें
मौसम की मस्ती में डूबे उतरायें !