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रविवार, जनवरी 16

जब जागो तभी सवेरा है

जब जागो तभी सवेरा है 


चढ़ आया हो सूरज नभ पर 

निद्रा में गहन अँधेरा है, 

सही कह गए परम सयाने 

जब जागो तभी सवेरा है !


सोए-सोए युग बीते हैं 

जाने कब आँख खुले अपनी, 

निज हाथों से छलते खुद को 

तज पाते नहीं जब आसक्ति !


कुदरत चेताती है हर पल 

हम आदतों के ग़ुलाम बने, 

गुरु के वचनों को सदा भुला 

मन्मुख होकर जीते रहते !


जब बारी आती तजने की 

हम झट प्रकाश को तज देते, 

वह अंतर्यामी जाग रहा 

दस्तक ना उसके दर देते !


वह हर अभाव को हर लेता 

उसकी छाया में सब पलते, 

कोई कमी नहीं शेष रहे 

यदि उसके जैसे हो पाते !