जब जागो तभी सवेरा है
चढ़ आया हो सूरज नभ पर
निद्रा में गहन अँधेरा है,
सही कह गए परम सयाने
जब जागो तभी सवेरा है !
सोए-सोए युग बीते हैं
जाने कब आँख खुले अपनी,
निज हाथों से छलते खुद को
तज पाते नहीं जब आसक्ति !
कुदरत चेताती है हर पल
हम आदतों के ग़ुलाम बने,
गुरु के वचनों को सदा भुला
मन्मुख होकर जीते रहते !
जब बारी आती तजने की
हम झट प्रकाश को तज देते,
वह अंतर्यामी जाग रहा
दस्तक ना उसके दर देते !
वह हर अभाव को हर लेता
उसकी छाया में सब पलते,
कोई कमी नहीं शेष रहे
यदि उसके जैसे हो पाते !