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शुक्रवार, नवंबर 7

अँधेरा और प्रकाश

अँधेरा और प्रकाश  


अंधेरे में बदल जाती हैं चीजें 

जो है 

वह नहीं दिखायी देता 

जो नहीं है 

वह नयी शक्लें धर लेता है 

अंधेरा भय जगाता है 

अंधेरा बाहर का हो या भीतर का 

परिणाम वही रहता है 

देख सके जो पार अंधेरे के 

ऐसी आँख जगानी है 

प्रकाश की एक नन्ही सी किरण 

उस पार से लानी है 

कितना भी बड़ा हो अँधेरा 

मिट जाएगा 

शांति और मौन की तरह 

छुपा प्रकाश बाहर आयेगा 

तब ज्ञात होगा

जो है 

वही तो प्रकट हो रहा है 

भीतर अज्ञान है 

तो मोह, क्रोध और भय की बेलें पनपेंगी 

कभी शोक सताएगा 

कभी घेर लेगा विषाद 

भीतर ज्ञान है 

तो आनंद की फसल लहलहायेगी !

किंतु जो मूल में है 

अंततः वही बच जाता है 

जो ओढ़ा हुआ है 

वह एक न एक दिन

 झर जाता है  

ओढ़ा हुआ अज्ञान 

भी उतर जाएगा 

और उस दिन 

जीवन पूरी तरह मुस्कुरायेगा !

रविवार, जनवरी 16

जब जागो तभी सवेरा है

जब जागो तभी सवेरा है 


चढ़ आया हो सूरज नभ पर 

निद्रा में गहन अँधेरा है, 

सही कह गए परम सयाने 

जब जागो तभी सवेरा है !


सोए-सोए युग बीते हैं 

जाने कब आँख खुले अपनी, 

निज हाथों से छलते खुद को 

तज पाते नहीं जब आसक्ति !


कुदरत चेताती है हर पल 

हम आदतों के ग़ुलाम बने, 

गुरु के वचनों को सदा भुला 

मन्मुख होकर जीते रहते !


जब बारी आती तजने की 

हम झट प्रकाश को तज देते, 

वह अंतर्यामी जाग रहा 

दस्तक ना उसके दर देते !


वह हर अभाव को हर लेता 

उसकी छाया में सब पलते, 

कोई कमी नहीं शेष रहे 

यदि उसके जैसे हो पाते !


मंगलवार, मई 26

जब

जब
जब चुक जाती हैं संवेदनाएं सिकुड़ जाती है आत्मा आत्मकेंद्रित हो जाता है प्रेम दुःख का असली क्षण वही होता है ! होता है ये सब भी किसी पीड़ा के कारण पर वह पीड़ा किसी निजी दुःख की परिणति है अपने-अपने अंधेरों से घिरे हम अपने खोलों में सिमट जाते हैं ! जब आशा की उम्मीद लगाए जगत हमारी ओर तकता है हम अपने ही दुखों के बोझ तले दबे रहते हैं ! जगत जब फेर लेता हैं आँखें तो हमें ज्ञात होता है निज पीड़ा में कर्त्तव्यों को भुलाना हम अपना अधिकार समझते हैं तब किसी की जरा सी भी अपेक्षा को दिल पर भार समझते हैं किन्तु सीमित हो जाती चेतना के रूप में एक अभिशाप भी ढोते हैं प्रेम जो वरदान के रूप में मिला है उसे ही खोते हैं ! बिन बंटा पदार्थ शेष रह जाता होगा पर बिन बंटी ऊर्जा बिखर ही जाती है प्रेम न बन सकी तो उदासी बन कर दूर अंतरिक्ष में खो जाती है !

मंगलवार, सितंबर 3

झक्क उजाले सा



झक्क उजाले सा


रेशमी धूप सा जो सहलाता है अंतर
वही सूरज पांव मरुथलों में जलाता है

मीठी सुवास सा बहलाता है जो मन को
नुकीले पथ सा वही प्रेम चुभे जाता है

झक्क उजाले सा जो भर देता है आकाश
घन अँधेरे का सबब वही तो बन जाता है

सिवाय हँसने के क्या कहें इन अदाओं पर
 दे एक हाथ दूजे हाथ लिए जाता है


बुधवार, जनवरी 9

नया वर्ष


नया वर्ष


समय के अनंत प्रवाह में...
गुजर जाना एक वर्ष का, मानो
सागर में एक लहर का उठना
और खो जाना !
और इस दिन
लाखों की आतिशबाजी जलाना
उस दुनिया में ?
जहाँ लाखों घरों में अँधेरा है
एक दिये के लिए भी नहीं है तेल
नया वर्ष तो तब भी आएगा,
जब हम कान फोड़ पटाखे नहीं जलायेंगे
नहीं खोएंगे होश आधी रात को सडकों पर
अजीब रिवाज जन्म ले रहे हैं शहर की हवा में
नये साल के पहले दिन
इच्छाओं की सूची बहुत लम्बी होती है मनों में
तभी तो मन्दिरों के बाहर पंक्तियाँ भी
दोपहर तक खत्म होने को नहीं आतीं !

सोमवार, दिसंबर 22

उजाले से पीठ

उजाले से पीठ


पूर्व दिशा में ही उगा था ज्ञान का सूरज
जो आया इधर उसने जगमगा लीं अपनी राहें !
क्यों अँधेरे में रहे चले जाते हैं कुछ लोग
नहीं कि उन्हें जरूरत नहीं है रौशनी की
या कि चुंधिया जाती हैं उनकी आँखें
उजाले की चमक से
बस अभ्यास हो गया है उन्हें अन्धेरों का
वे छोड़ नहीं पाते काले लिबास
जिसपर कितने ही धब्बे लगें दिखाई नहीं देते
भय लगता है उन्हें श्वेत परिधान से
जिस पर लगा एक छींटा भी
कर सकता है उन्हें शर्मिंदा
अमरत्व की विरासत मिली है जिन्हें
मारकर दूसरों को कहलाते स्वयं को जिन्दा !

गुरुवार, जुलाई 17

अँधेरे के पार


अँधेरे के पार



प्रकाश की एक दूधिया नदी
बहती है भीतर
जिसका कोई तट नजर नहीं आता
एक अंतहीन सन्नाटे की गूँज
जिसकी लहरों में सुनाई देती है
अदृश्य कमलों की गंध भी चली आती है
खो जाते हैं स्पंदन.. और
जम जाता है शिराओं में बहता रक्त
थम जाता है ज्यों सृष्टि का सारा व्यापार
 एक मधुर रस टपकता है
दिग दिगंत से
सहेजते हैं अदेखे हाथ
महसूस होती है छुअन बन परस
नृत्य घटता है कहीं गहराइयों में
नजर नहीं आता पर कोई नर्तक !


गुरुवार, अक्टूबर 11

जीना इसी का नाम है


जीना इसी का नाम है 

अँधेरे कमरे में
बंद आँखों से
खाते हुए ठोकरें
वे चल रहे हैं
और इसे जीना कहते हैं...

बाहर उजाला है
सुंदर रास्ते हैं
वे अनजान हैं
इस शहर में
सो बाहर नहीं निकलते हैं....

जाने क्या आकर्षण
है इस पीड़ा में
कि दुःख को भी
बना लेते हैं साथी
बड़े एहतियात से
बना कर घाव
उस पर मरहम धरते हैं..

पुकारता है अस्तित्त्व
वह प्रतीक्षा रत है
कैसा आश्चर्य है
सीमाओं में बंधा हर मन
फड़फड़ाता है अपने पंख
पिंजरे में बंद पंछी की तरह
पर द्वार पिंजरे का
खोले जाने पर भी
नहीं जाता बाहर
अपने सलीबों से वे बंधे रहते हैं