पल-पल सरक रहा संसार
कौन यहाँ किसको ढूंढे है
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी
पल भर का नहीं ठिकाना है !
जोड़-तोड़ में लगा है मनवा
बुद्धि उहापोह में खोयी,
हर पल कुछ पाने की हसरत
जाने किस भ्रांति में सोयी !
दिवास्वप्न निरन्तर देखे
मन ही स्वप्न निशा में गढ़ता,
नहीं मिला आधार स्वयं का
लक्ष्यहीन सा रहे विचरता !
एक तिलिस्म महामाया का
घुमा रहा जिसको करतार,
एक व्यूह में भ्रमण चल रहा
पल-पल सरक रहा संसार !
