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शुक्रवार, मार्च 11

सत्यमेव जयते

सत्यमेव जयते 


सत्य की विजय होती है सदा 

क्योंकि सत्य ही विजय है !

सत्य अग्नि है 

जो हर झूठ को निगल जाती है अंतत: !

सत्य का दामन काँटों भरा लगता है 

पर उल्लास के पुष्प भी वहीं खिलते हैं !

कहते हैं सत्य की राह दुधारी तलवार की तरह होती है 

पर संतुलन की कला  वहीं सीखी जाती है !

सत्य हरेक शै का आधार है 

हरेक के अंतर्मन में  छिपा निर्दोष प्यार है !

असत्य भी सत्य का सहारा लेता है 

नादान रस्सी को ही साँप समझ लेता है 

और सीपी को चाँदी !

सत्य कभी मरता नहीं 

क्योंकि वह कभी जन्मता नहीं 

असत्य बनावट है, जो जन्माया जाता है  

सो एक दिन निश्चित है उसकी मृत्यु ! 


गुरुवार, सितंबर 16

चाह और प्रेम


चाह 


हर चाह नश्वर की होती है 

शाश्वत को नहीं चाहा जा सकता  

वह आधार है चाहने वाले का 

हर याचक आकाश से उपजा है 

और पृथ्वी की याचना करता है 

पृथ्वियां बनती-बिगड़ती हैं 

आकाश सदा एक सा है 

याचक नहीं जानता खुद का स्रोत 

वह अंधकार में टटोलता है 

प्रकाश का नहीं उसे बोध 

पृथ्वी घूम रही है 

इसका भी नहीं प्रबोध ! ​​


प्रेम 


प्रेम की डोर 

जो हमें बांधती है 

एक दूजे से 

टूटने न पाए 

यही आधार है 

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है 

प्रेम की डोर बांधे रहे परिवार 

समाज और राष्ट्रों को 

तभी जीवन का फूल महकता है !

रविवार, जनवरी 17

तुम यदि

तुम यदि 
 तुम यदि बन जाओ सूत्रधार 
तो सँवर ही जायेगा जीवन का हर क्षण  
मुस्कान झरेगी जैसे झरते हैं फूल शेफाली के 
अनायास ही 
हवा के हल्के से झोंके की छुअन से 
या सूरज की पहली किरण आकर जगाती है  
तो हो जाते हैं समर्पित अस्तित्त्व को सहज ही !

तुम यदि बनो जीवन आधार
तो निखर ही जायेगा उर आंगन 
जहां प्रीत के पंछी प्रातः जागरण के गीत गाएंगे 
और उल्लास के पादप लहलहायेंगे
जिनकी सुवास आप्लावित कर देगी हर कोना !

तुम यदि बन सको पुकार उसकी 
तो उबर ही जायेगा अंतर अतीत के जंगल से 
झर जाएगी हर आशंका भी भावी की 
चल पड़ेंगे अजस्र शक्ति भरे कदम 
पीड़ा आज की हरने जग में !

मंगलवार, अक्टूबर 20

ठहरे विमल झील का दर्पण

 ठहरे विमल झील का दर्पण 

पूर्ण चन्द्रमा, पूर्ण समंदर 

पूर्ण, पूर्ण से मिलने जाये, 

 माने मन स्वयं को अधूरा 

अधजल गगरी छलकत जाये !


चाहों के मोहक जंगल में 

इधर भागता उधर दौड़ता, 

कुछ पाने की कुछ करने  की

सदा किसी फ़िराक में रहता !


ठहरे विमल झील का दर्पण 

शांत सदा भीतर तल झलके, 

जिस पर टिकी हुई वह धरती 

थिर अकंप आधार वह दिखे  !


मन लहरों सा जब भी कँपता 

भुला दिया बस निज आधार, 

उस तल से संदेसे आते 

सदा बुलाता भेजे दुलार !


हर कम्पन उसकी रहमत है 

फिर-फिर पूर्ण की चले तलाश, 

जाने खुद को पूर्ण पुष्प  सा 

हर सिंगार या रूद्र पलाश !


गुरुवार, अप्रैल 12

पल-पल सरक रहा संसार



पल-पल सरक रहा संसार

कौन यहाँ किसको ढूंढे है 
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी 
पल भर का नहीं ठिकाना है !

जोड़-तोड़ में लगा है मनवा
बुद्धि उहापोह में खोयी,
हर पल कुछ पाने की हसरत 
जाने किस भ्रांति में सोयी !

दिवास्वप्न निरन्तर देखे 
मन ही स्वप्न निशा में गढ़ता,
नहीं मिला आधार स्वयं का 
लक्ष्यहीन सा रहे विचरता !

एक तिलिस्म महामाया का 
घुमा रहा जिसको करतार
एक व्यूह में भ्रमण चल रहा 
पल-पल सरक रहा संसार !