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शुक्रवार, सितंबर 1

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

जो न छंद बद्ध हुए
बिल्कुल कुंआरे हैं
तिरते अभी गगन में  
गीत बड़े प्यारे हैं !

जो न अभी हुए मुखर
अर्थ कौन धारे हैं
ले चलें जाने किधर
पार नद उतारे हैं !

पानियों में संवरें
पी रहे गंध माटी
जी रहे ताप सहते
मौन रूप धारे हैं !

गीत गाँव व्यथा कहें 
भूली सी कथा कहें 
गूंजते, गुनगुनाते
अंतर संवारे हैं !

गीत जो हृदय छू लें
पल में उर पीर कहें
ले चलें अपने परों 
दूर से पुकारें हैं !


रविवार, अप्रैल 29

वह जो कोई भी है


वह जो कोई भी है


कोई दूर रह कर भी
निकटतम हो सकता है !

दूरी प्रेम को बढ़ाती है
विरह की अनल में जल जाते हैं
उर के अवांछनीय तत्व,
जल ही जाते होंगे...
तभी तो विरह के आँसूओं का स्वाद
कुछ अलग होता है !


हो सकता है मुखरित कोई मौन होकर भी !

मौन भीतर के मौन को जगाता है
करता है परिचय अनंत से
शब्द की सीमा है, मौन असीम है
कोई चार शब्द कहे तो चार सौ की इच्छा होगी
पर मौन, एक पल का हो या एक पहर का
स्वाद दोनों का एक है !


कोई उदासीन होकर भी
रख सकता है ख्याल !

उदासीनता अंतर्मुखी कराती है
दूसरे का ध्यान मिले तो मन उसी पर जायेगा
अंतर्मुखता अपने आप से मिलाती है

अनंत उपकार हैं उसके
जो दूर है
मौन है
उदासीन है !