मुक्त गगन सा गीत गा सके
‘सावधान’ का बोर्ड लगाये
हर कोई बैठा है घर में,
मिलना फिर कैसे सम्भव हो
लौट गया वह तो बाहर से !
या फिर चौकीदार है बुद्धि
साहब से मिलने न देती,
ऊसर ऊसर ही रह जाता
अंतर को खिलने न देती !
प्राणों का सहयोग चाहिए
भीतर वह प्रवेश पा सके,
सत्य को जो भी पाना चाहे
मुक्त गगन सा गीत गा सके !
प्रकृति अपने गहन मौन में
निशदिन उसकी खबर दे रही,
सूक्ष्म इशारे करे विपिन भी
गुपचुप वन की डगर कह रही !
पल में नभ पर बादल छाते
गरज-गरज कर कुछ कह जाते
पानी का बौछारें भी तो
पाकर कितने मन खिल जाते !
जो भी कुछ जग दे सकता है
शब्दों में ही घटता है वह,
लेकिन सच है पार शब्द के
जो निशब्द में ही मिलता है !
