घर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
घर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, जुलाई 3

कोई दूसरा कब था



कोई दूसरा कब था



जिसकी खोज में दौड़ते हम फिरे  

वह घर आने को बेताब जब था

 

राह जिसकी तकी बिछायीं थी पलकें

आने वाला आया ही हुआ जब था

 

हजारों खत न उसे भेजे होंगे

परदेश कभी गया ही नहीं जब था 

 

याद कर करके जिसे थकते नहीं

दिल ने उसे भुलाया ही कब था

 

माँगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं

हाले दिल उससे छिपा ही कब था

 

 पुकारें किसे राह निहारें किसकी

वहाँ कभी कोई दूसरा कब था


 

शुक्रवार, जून 12

भुला दिया है

भुला दिया है 


देह एक नाव है 

मुझ नदी में तैरती हुई 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार बह रही है 

मैं नाव नहीं हूँ,  

 नदी हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक घर है 

मुझ विदेह के लिए 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार शून्य है 

मैं देह नहीं हूँ 

विदेह हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक दीपक है 

प्राण स्नेह है जिसमें 

मन बाती और मैं ज्योति हूँ 

जो जो अनंत काल से, अनंत देश के पार दिप-दिप करती है 

मैं दीपक नहीं हूँ 

ज्योति हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


गुरुवार, मई 28

पहली मंज़िल पर बाढ़

पहली मंज़िल पर बाढ़ 



अचानक नहीं आयी थी वर्षा 

सुबह से बादल बने थे 

दे दी थी चेतावनी 

मौसम विभाग ने पिछले ही हफ़्ते 

भले-चंगे घर में बैठे थे हम 

बारिश से कोई परेशानी   

भला क्या होने वाली थी 

शाम होने से थोड़ा पहले 

एक पुरानी सखी पहली बार 

इस घर में मिलने आने वाली थी 

उसे बालकनी व पूरा घर दिखाया 

 छत पर रखे असबाब दिखाए 

तभी दो-चार बूँदे गिरीं तो 

 सीढ़ियों से नीचे कदम बढ़ाये 

डाइनिंग टेबल के इर्दगिर्द 

कॉफ़ी के कप लिए हाथ में 

सुंदर चर्चा में जब लीन थे 

तब तेज बूँदों की लग गई क़तार 

कानों में गूंजता था स्वर 

और सामने वाली बड़ी खिड़की से 

रहे थे निहार 

पत्तों पर गिरती हुई जल धार 

अचानक सीढ़ियों से आयी

पानी गिरने की आवाज़

सोचा नहीं था कि होने लगेगी 

घर के अंदर ही बरसात 

देखते ही देखते बहने लगी 

पानी की धार

 पहली मंज़िल की बालकनी में 

आ गयी थी बाढ़ 

रिस-रिस कर जल कमरों में भरने लगा 

क़ालीन को भिगोता हुआ 

लकड़ी के फ़र्श के भीतर घुसने लगा 

अब तो कोई चारा नहीं था 

मग और बालटियाँ फटाफट लाये गये 

भर-भर कर ऊपर से गिराये गये 

आधे घंटे की बरसात में 

सैकड़ों लीटर पानी हो गया जमा

प्रकृति के आगे फिर एक बार 

अपने मस्तक झुका 

नलसाज (प्लम्बर) को बुलाया 

तो समस्या समझ में आयी 

ज़मीन के नीचे से जा रहे पाइप में  

 अवरोध आ गया था

पानी बाहर जाने के बजाय  

वापस आ रहा था 

इस पूरे वक्त में 

 मेहमान भी साथ में खड़ी थी 

उसका धैर्य असीम और हिम्मत भी बड़ी थी 

पाइप को काटा गया कुछ ऊपर ज़मीन से

निकास होने लगा पानी का रफ़्तार से 

अब कमरों का पानी सुखाना था 

मॉपिंग मशीन बहुत काम आयी 

बारी-बारी से सभी ने हाथ आज़माया 

मेहमान को ठंडी हो गई काफ़ी को 

गर्म करके पिलाया 

इत्मीनान से बैठ उसने 

उबर से कार को बुलाया 

किया विदा उन्हें 

फिर जुट गये बाक़ी काम में 

कालीन को लपेट कर बाहर रखा 

फ़र्श से पानी की आख़िरी बूँद को पोछा 

अब पंखे सारी रात चलेंगे 

पूरी तरह से भीतर तक जल सोखेंगे 

पहली बार जोरदार बरसात ने

 ले ली हमारी परीक्षा 

सफल हुए हैं जिसमें 

मिली जो है गुरु से दीक्षा !


गुरुवार, मई 21

असली घर है रिक्त आकाश

असली घर है रिक्त आकाश



घर की चिंता करते करते 

समय और शक्तियाँ लगायी, 

साथ नहीं जाने वाला है 

धोखा देगा, पड़े सुनायी !


दीवारों से नहीं बना है 

असली घर है रिक्त आकाश, 

वातावरण विशुद्ध बना लें 

अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !


वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों 

भाव विमल मुस्कान सजीली, 

घर के भीतर रहने वाला 

हर इक छेड़े तान सुरीली !


प्रेम बहे कोई द्वन्द्व न हो 

जीवन इक वरदान बनेगा, 

पलकों में शुभ स्वप्न सजेंगे 

सम्मुख वही अनाम रहेगा !

 

शुक्रवार, अक्टूबर 17

उड़ें गगन में मुक्त हुए से

उड़ें गगन में मुक्त हुए से


निज नूतन नीड़ की ख़ुशी में 

असली घर भी याद रहेगा ?

आज नहीं तो कल जाना है 

‘जाओ’ यह संसार कहेगा !


ह्रदयहीन तब लगता जग

जब अपने ही बेगाने होंगे, 

बेबस से हम देखें ख़ुद को 

उस घर से अनजाने होंगे !


दुनिया एक सराय मात्र है 

बोरा-बिस्तर बाँधों अपना, 

सोये-सोये उमर बिता दी 

कब से देख रहे हो सपना !


सच से आँखें चार करो तुम 

वरना फिर पछताना होगा, 

जीते जी ही मरना आये 

इक दिन जग से जाना होगा !


याद रहे यदि ‘असली घर’ तो 

ज़ंजीर नहीं बाँधें पग में, 

 उड़ें गगन में मुक्त हुए से

हित सबके ही साधें जग में !



रविवार, अप्रैल 20

घर इक मंज़िल

घर इक मंज़िल 

 इन वक्तों का यही तक़ाज़ा

 रहे ह्रदय का ख़्वाब अधूरा, 


बनी रहे मिलने की ख्वाहिश 

जज़्बा क़ायम कुछ पाने का !


है स्वयं पूर्ण, जगत अधूरा

मिथ्या स्वप्न, सत्य है पूरा, 

 

 क्षितिज कभी हाथों ना आता

चलता राही थक सो जाता !


 फूलों के दर्शन हो सकते

मंज़िल कहाँ मिलेगी मग में, 


लौट जरा अपने घर आना 

वहीं मिलेगा सरस ठिकाना !


सोमवार, जनवरी 8

बूँद एक घर से निकली थी

बूँद एक घर से निकली थी 


अंधकार में ठोकर खाते 

आँखें बंद किए चलते हैं, 

जाने कौन  मोह में फँस कर 

अक्सर ख़ुद को ही छलते हैं !


छोटी-छोटी इच्छाओं के 

बोझे तले व्यर्थ दबते हैं, 

सिर पर गठ्ठर लादे, जाने

कब से बीहड़ पथ चलते हैं !


अनजाने ही रह जाते वह 

अपने दिल की गहराई से, 

जीवन की संध्या आ जाती 

कान भरे हैं शहनाई से !


सागर से मिल सकती थी जो 

मरुथल में दम तोड़ रही है, 

बूँद एक घर से निकली थी 

जाने क्या वह जोड़ रही है ! 


अपनी ही ऊँचाई से बच 

बौना होता जाता मानव, 

पहचाने जाते थे पहले 

अब सबके भीतर ही दानव ! 


दुख की ठोकर जब भी लगती 

जाग देखता है सोया मन, 

पीड़ा ही पथ पर रखती है 

सुख में तो भटका है जीवन !


पर्वत जैसा दुख भी आये 

सागर सुख का ठाँठे मारे, 

आँख मूँद कर चलते पथ में 

ज्योति निरंतर जलती द्वारे ! 


सोमवार, अगस्त 21

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

धरती हमें धरती है 

माँ की तरह 

पोषित करती है 

फल-फूल, अन्न,  शाक से 

क्षुधा हरती है 

वे पात्र जिनमें ग्रहण किया भोजन 

वे घर जो सुरक्षा दे रहे 

वे वस्त्र जो बचाते हैं 

सजाते हैं ग्रीष्म, शीत, वर्षा से 

सभी तो धरती माँ ने दिये 

अनेक जीवों, प्राणियों का आश्रय धरा 

उसने कौन सा दुख नहीं हरा 

अंतरिक्ष की उड़ान के लिए मानव ने 

ईंधन कहाँ से पाया 

आलीशान पोत बनाये 

समान कहाँ से आया 

धरा से लिया है सदा हमने 

कृतज्ञ होकर पुकारा है कभी माँ ! 

विशाल है धरा 

जलाशयों, सागरों 

और पर्वतों का आश्रय स्थल 

भीतर ज्वाला की लपटें 

तन पर हिमाच्छादित शिखर 

रेतीले मैदान और ऊँचे पठार 

वह सभी कुछ धारती है 

निरंतर घूमती हुई 

अपनी धुरी पर 

सूर्य की परिक्रमा करती है 

हरेक का जीवन संवारती है 

उसका दिल इतना कोमल है कि 

एक पुकार पर पसीज जाता है 

धरती को अपना नहीं अपने बच्चों का 

ख़्याल घुमाता है !


गुरुवार, सितंबर 22

अंतहीन उसका है आंगन


अंतहीन उसका है आंगन 

मौन से इक उत्सव उपजता 
नई धुनों का सृजन हो रहा,
मन में प्रीत पुष्प जन्मा है  
सन्नाटे से गीत उठ रहा !

उस असीम से नेह लगा तो
सहज प्रेम जग हेतु जगा है,
अंतहीन उसका है आंगन  
भीतर का आकाश सजा है !

बिन ताल एक कमल खिला है  
हंसा लहर-लहर जा खेले,
बिन सूरज उजियाला होता  
अंतर का जब दीप जला ले !

शून्य गगन में हृदय डोलता
मधुमय अनहद नित राग सुने,
अमिय बरसता भरता जाता   
अंतर घट को जो रिक्त करे !

घर में ही जब ढूँढा उसको
वहीं कहीं छुप कर बैठा था
नजर उठा के देखा भर था
हुआ मस्त जो मन रूठा था !

आदि, अंत से रहित हो रहा
आठ पहर है सुधा सरसती,
दूर हुई जब दौड़ जगत की  
निकट लगी नित कृपा बरसती !

शनिवार, सितंबर 4

नींद

नींद 


हर रात हम अपने घर जाते हैं 

अनजाने ही 

और भोर में पोषित होकर लौटते हैं 

जाहिर है घर पर कोई है 

यदि रात सो न सका कोई

तो वह घर का पता ही भूल गया है 

या भटक गया है आधी रात को 

अथवा घर से दूर निकल गया है 

जाना चाहता है 

पर कोई वाहन नहीं मिलता 

भय और थकान भी उसे घेर लेते हैं 

नींद न आने पर अगले दिन 

लोग कैसे खोये-खोये से रहते हैं !


बुधवार, फ़रवरी 3

अब भी उस का दर खुला है

अब भी उस का दर खुला है 


खो दिया आराम जी का 

खो दिया है चैन दिल का,

दूर आके जिंदगी से 

खो दिया हर सबब कब का !


गुम हुआ घर का पता ज्यों

भीड़ ही अब नजर आती,

टूटकर बैठा सड़क पर 

घर की भी न याद आती !


रास्तों पर कब किसी के 

फैसले किस्मत के होते, 

कुछ फ़िकर हो कायदों की 

हल तभी कुछ हाथ आते !


दूर आके अब भटकता 

ना कहीं विश्राम पाता, 

धनक बदली ताल बदली 

हर घड़ी सुर भी बदलता !


अब भी उस का दर खुला है 

जहाँ हर क्षण दीप जलते, 

अब भी संभले यदि कोई 

रास्ते कितने निकलते !

 

गुरुवार, अगस्त 13

फिर कोरोना देव अवतरित

 फिर कोरोना देव अवतरित 

 

पीला पात डाल से बिछड़ा 

संग पवन के डोले  इत उत,

हम भी बिछुड़े अपने घर से 

पता खोजते गली-गली में !

 

कोई कहता काशी जाना 

काबा की भी राह दिखाता,

गंगा तट पर शिव के डेरे  

कोई महामंत्र ही फेरे !

 

द्वारे -द्वारे भटक रहे थे 

 हुए बंद मंदिर व शिवालय, 

फिर कोरोना देव अवतरित 

बैठे हैं सब घर में कंपित !

 

घर से बिछुड़े घर लौटे हैं 

प्रेम का पाठ सिखायेगा, 

इसकी दीवारों को सजा लें 

घर को ही अब स्वर्ग बना लें !