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गुरुवार, जून 4

सार सार को गहि रहे

सार सार को गहि रहे 


‘साधना’ में छुपी है धन की परिभाषा 
धन वही है जो पार लगाए 
वह नहीं जो रखा रह जाये 
जो सारयुक्त है 
वही धन है 
उसे ही साधना है 
हंस की तरह जो विवेक धरे 
उस मन में जगती भावना है 
भावना जो भर देती है शांति और प्रेम से 
जो आनंद की लहर उठाती है 
व्यर्थ जब हट जाता है प्रस्तर से 
तो सुंदर मूरत उभर आती है 
क्यों हम व्यर्थ ही दुःख के भागी बनें 
कंकड़ों-पत्थरों के रागी बनें 
जब एक हीरा सामने जगमगाता है 
तब क्यों सूना दिल कसमसाता है 
मुद्दे की बात ‘एक’ ही है
जिसका जिक्र किताबों में है 
शेष सब तो उसी की व्याख्या है 
इस ‘एक’ का जो ध्यान लगाता है दिल में 
जाग जाती उसकी प्रज्ञा है ! 

गुरुवार, फ़रवरी 5

सुर में भरकर गा लेना है

सुर में भरकर गा लेना है


प्रस्तर में मूरत तो है ही
केवल व्यर्थ हटा देना है,
इस जीवन में अर्थ घटेगा
केवल व्यर्थ घटा देना है !

शब्दों में ही छुपा गीत है
केवल उन्हें बिठा देना है,
छंदों से संगीत बहेगा
सुर में भरकर गा लेना है !

माटी में ही गंध छिपी है
उपवन एक बना लेना है,
सुमनों से ही मधु टपकेगा
भ्रमरों को चुरा लेना है !

हर अंतर में प्रीत छिपी है
नयनों में बसा लेना है,
हाथों में सौभाग्य की रेखा
आगे बढ़कर पा लेना है !