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रविवार, जून 9

गंध और सुगंध




गंध और सुगंध

जब मन द्वेष के धुंए से भर जाये
या भीतर कोई चाह जगे
अपने को खोजने की थोड़ी कोशिश करें
यह गंध कहाँ से आ रही है ?
दबी होगी कहीं कोई दुर्वासना
किसी प्रतिशोध की भावना
कोई अपमान जो चुभा हो गहरे कभी
सारी गंधें वहीं जन्म लेती हैं
जब नहीं रहेगी कोई आकांक्षा
हार और जीत की कामना
मिट जाएगी हर उलझन
खिल जायेंगे ध्यान के सुमन
और तब नहीं पूछना होगा
 यह सुगंध कहाँ से आ रही है ?

बुधवार, जुलाई 12

गाना होगा अनगाया गीत

गाना होगा अनगाया गीत


गंध भी प्रतीक्षा करती है
उन नासापुटों की, जो उसे सराहें
प्रसाद भी प्रतीक्षा करता है
उन हाथों की, जो उसे स्वीकार लें
जो मिला उसे बांटना होगा
होने को आये जो हो जाना होगा
गाना होगा अनगाया गीत
लुटाना होगा वह कोष भीतर छुपा   
पलकों में बंद ख्वाबों को,
रात्रि का अँधकार नहीं सुबह का उजाला चाहिए
अंतर में भरी नर्माहट को शब्दों का सहारा चाहिए
गर्माहट जो सर्दियों की धूप गयी थी भर 
अलस जो भर गयी तपती दोपहर,
उन्हें उड़ेंलना होगा
बचपन में मिले सारे दुलार को
किस्सों में सुने परी के प्यार को
चाँद पर चरखा कातती बुढ़िया
रोती-हँसती सी जापानी गुड़िया
देख-देख कर जो मुस्कान की कैद हृदय में
उसे बिखराना होगा
बारिश की पहली-पहली बौछार में
भीगने का वह सहज आनंद
हृदय में लिए नहीं जाना होगा
इस जग ने कितना-कितना भर दिया है
मनस को उजागर कर दिया है
पिता की कहानियों का वह जादूगर
जो उगाता था सोने के पेड़ और चाँदी के फल
जीवन में पाए अनायास ही वे अमोल पल
अंतहीन वक्त की कोरी चादर पर
कुछ अमोल बूटे काढ़ने हैं
राह दिखाएँ भटके हुओं को
ऐसे कई और दीपक बालने हैं !

शुक्रवार, मार्च 18

थोड़ी सी हँसी


थोड़ी सी हँसी

फूल क्या लुटाते हैं ? इतना जो भाते हैं
थोडा सा रंग.. गंध थोड़ी सी
और ढेर सारी खिलावट !
नहीं उनके होने में
जरा सी भी मिलावट,
पास उनके है वही तो मात्र अपना
काया तो माटी से ली उधार है
जल और सूरज का भी उन पर उपकार है
खिलावट मात्र पर ही उनका अधिकार है

बच्चे क्या दे जाते हैं ? जो इतना लुभाते हैं
सहजता सरलता जो उनकी अपनी है
काया का कारण तो जनक-जननी है
भला है क्या हमारे पास कहने को अपना
डर नहीं कभी खोने का जिसका
थोड़ी सी हँसी, खालिस प्यार
शांति और प्रेम की बहती हुई धार !
शेष तो सब जगत से ही पाया है
जिसके होने से न कोई भी 'हो' पाया है
अपना आप ही लुटाना है
यदि फूलों सा मुस्काना है
झरनों सा गाना है
तितलियों सा इतराना है
बच्चों सा खिलखिलाना है !

शुक्रवार, सितंबर 11

एक और अनेक


एक और अनेक

जैसे आकाश एक बाहर है चहुँ ओर
वैसा ही भीतर है..
जिसमें चमकता है एक सूरज
मन के पानियों को जो
उड़ा ले जाता है द्युलोक में
भाव सुगंध भरे
फिर बरस जाती है धारा तृप्ति की
तन की माटी लहलहाने लगती है
बाहर और भीतर का आकाश
कहने को ही दो हैं
वैसे ही जैसे बाहर और भीतर का सूरज
एक पानी से दूसरे का गहरा नाता है
और पुष्प की गंध से भाव सुगंधि का
एक ही है जो अनंत होकर जीता है
पल-पल की खबर रखता वह जादूगर
जाने कैसे यह खेल रचता है ! 

मंगलवार, फ़रवरी 24

पंख बिन ही उड़ रहा है

पंख बिन ही उड़ रहा है



मिट गया चुपचाप भू में
खिल उठा वह ही गगन में,
गंध बन कर डोलता भी
मुस्कुराता है चमन में !

हट गया चुपचाप मग से
घट भरा वह ही मिलन से,
पंख बिन ही उड़ रहा है
प्रीत की सोंधी लगन से !

खो गया जो व्यर्थ ही था
पा लिया इक अर्थ सुंदर,
झर गया ज्यों जीर्ण जर्जर
नव मिला तब लक्ष्य मनहर !

गुरुवार, फ़रवरी 5

सुर में भरकर गा लेना है

सुर में भरकर गा लेना है


प्रस्तर में मूरत तो है ही
केवल व्यर्थ हटा देना है,
इस जीवन में अर्थ घटेगा
केवल व्यर्थ घटा देना है !

शब्दों में ही छुपा गीत है
केवल उन्हें बिठा देना है,
छंदों से संगीत बहेगा
सुर में भरकर गा लेना है !

माटी में ही गंध छिपी है
उपवन एक बना लेना है,
सुमनों से ही मधु टपकेगा
भ्रमरों को चुरा लेना है !

हर अंतर में प्रीत छिपी है
नयनों में बसा लेना है,
हाथों में सौभाग्य की रेखा
आगे बढ़कर पा लेना है !





गुरुवार, जनवरी 22

है हवा कुछ बोलती सी

 है हवा कुछ बोलती सी




गंध ले आयी सुमन की
भरे आंचल डोलती सी,
नीर नद की कुछ नमी
राज कोई खोलती सी
है हवा कुछ बोलती सी !

कर रही सरगोशियाँ ये
तोडती खामोशियाँ ये.
उड़ चली पाखी के पंखों
राह उनकी मोड़ती सी
है हवा कुछ बोलती सी !


शनिवार, नवंबर 1

ऋतू आयी मृदु भावों वाली


ऋतु आयी मृदु भावों वाली


धूप, हवा संग एक हो सकें
नदिया, पिकनिक, फूलों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

हल्की-हल्की ठंड रेशमी
नहीं ताप अब रवि बरसाता,
बादल लौट गये निज धाम
नीला चंदोवा हर्षाता !

धरा तृप्त है वारिद पीकर
कलियों, तितली, भंवरों वाली
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !

 मदिर गंध ले बही समीरा
सुरभि बिखरने को है आतुर,
जीवन अपना राज खोलता
चले भूमि में सोने दादुर !

थिर गम्भीर हुई जलवायु
कण कण को हर्षाने वाली  
ऋतु आयी मृदु भावों वाली !