मृगतृष्णा सा सारा जीवन
जो भी चाहो सब मिलता है
माया का जादू चलता है,
फिर भी जीवन उपवन सूना
दिल का फूल कहाँ खिलता है !
रूप रंग है कोमल स्वर भी
थमकर देखें समय कहाँ,
सपनों का इक नीड़ बनाते
नींद खो गयी चैन गया !
अरमानों को बड़ा सहेजा
चुन-चुन कर नव स्वप्न
संजोये,
बिखर गये सूखे पत्तों से
बरबस ही फिर नयन भिगोये !
कदमों में आशा भर दौड़े
हाथों में था गगन समाया,
किंतु दूर ही रहा क्षितिज
सम
मुट्ठी में कुछ भी न आया !
मृगतृष्णा सा सारा जीवन
पार नहीं इसका मिलता है,
मन मयूर भी सदा डोलता
ज्यों लहरों में शशि हिलता
है !
