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मंगलवार, मई 5

एक रागिनी है मस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की


इक ही धुन बजती धड़कन में

इक ही राग बसा कण-कण में,

एक ही मंजिल, एक  रस्ता

इक ही प्यास शेष जीवन में !


इक ही धुन वह निज हस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की,

एक पुकार सुनाई देती

दूर पर्वतों की बस्ती की !


मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया

पंछी जैसे उड़ते गाते,

उड़ते मेघा संग हवा के

बेसुध छौने दौड़ लगाते !


खुल जायें जैसे नीलगगन 

उड़ती जैसे मुक्त पवन है,

क्यों दीवारों का कैदी है 

उर परम प्रीत की लगे लगन  !


एक अजब सा खेल चल रहा

लुकाछिपी है खुद की खुद से,

ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको

ख़ुद ही बंध दूर है खुद से ! 


 

बुधवार, नवंबर 11

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


 हजार राहे हैं जिनसे गुजर के तू मिलता है 
किसी बाग में कमल कभी गुलाब बना खिलता है 

हरेक मुट्ठी में कैद है एक आसमां अपना 
जब जो ख्वाहिश करेगा चाँद उस पल निकलता है 

एक रस्ता पकड़ ले और चलता चले उसी पर 
क्यों निगाहों को बिखेरे दिलेदर्द पिघलता है 

हजार नदियां गुजर कर जहाँ भी पहुँचें
समंदर एक ही हरेक को मिलता है 

क्यों कशमकश में दिनों तक लम्हे गुजरते हैं 
वक्त के पार ही वह जांनिसार मिलता है 

थम जाये मन की दौड़ जिस पल किसी की कहीं
खुले वह द्वार जो उसके दर पे निकलता है 

गौर से देखा है कभी मन को समझा भी 
इन्हीं के पानियों में उसका कमल खिलता है 

बुधवार, नवंबर 27

तू


तू 


जर्रे जर्रे में छिपा है तू ही
बोलता है हर जुबां से तू ही,
हरेक दिल, हर जिगर का बाशिंदा
हर सवाल का जवाब है तू ही !

हर चुनौती इक खेल है जहाँ में
चप्पे-चप्पे पर बिछा है तू ही,
हर दर्द तुझसे मिलने का सबब
हरेक तरंग, हर लहर है तू ही !

किसलिए डरें, तंज करें जग  पर
जब कि हर बात बनाता है तू ही,
तुझ से उपजा हर फलसफा जग का
तेरी रहमत जानता है तू ही !

हर फ़िक्र तुझसे दूर रखती है
हर निशां से झलकता है तू ही,
हर  रस्ता मंजिल की तरफ  जाता
इशारे दिए जाता है तू ही !