रविवार, दिसंबर 8
मंगलवार, अक्टूबर 4
जितना खुद को बाँटा जग में
जितना खुद को बाँटा जग में
जितना ‘मैं’ ‘तुझमें’ रहता है
उतने से ही मिल पाता है,
खुद की ही तलाश में हर दिल
दूजों के घर-घर जाता है !
जितना खुद को बाँटा जग में
उतने पर ही होता हक़ है,
बिन बिखरे बदली कब बनती
इसमें नहीं मेघ को शक है !
प्रियतम प्रेमी मिलने ख़ातिर
रूप हज़ारों धर लेते हैं,
खुद को मंदिरों में सजाया
खुद ही सजदे कर लेते हैं !
कोई नहीं सिवाय उसी के
जिससे तिल भर का नाता है,
भेद कभी खुल जाए जिसका
कुदरत का कण-कण भाता है !
सहज हुआ वह बंजारा फिर
बस्ती-बस्ती गीत सुनाता ,
मुक्त हो रहो बहो पवन से
सुख स्वप्नों के गाँव बसाता !
रविवार, मार्च 14
मैं और तू
मैं और तू
तू वहाँ भी है जहाँ नहीं दिखता
तू जहाँ भी है ‘उससे’ नहीं छिपता
जिसका ‘मैं’ तुझमें समा गया है
‘तू’ जिसके ‘मैं’ में आ गया है
अब खोज खत्म हुई
देखता है ‘मैं’ ही जगत को
वह ‘मैं’ जो असल में ‘तू’ है
तो क्यों वह अब खुद को खोजेगा?
बल्कि जहाँ नहीं पाता था तुझे पहले
वहाँ भी तेरे सिवा कुछ नहीं पाता
क्योंकि आँखें जो बाहर देखती हैं
वह भीतर ही तो दिखता है
जब इन आँखों से ‘तू’ ही ‘मैं’ बनकर देखता है
तो सारा जगत मेरे अंदर ही बसता है
फिर कौन सा भेद रहा
जहाँ तू नहीं है, हर कहीं
‘मैं’ जहाँ भी देखे तेरी ही छवि देखता है
अब कोई चारा नहीं ‘तू’ दूर हो जाए
भला खुद से भी कभी कोई दूर जा सकता है
जब ‘मैं’ न बचे तो एक नई ‘मैं’ मिलती है
जो पल-पल तेरी सुरति से खिलती है !






