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सोमवार, जून 1

निजता

निजता 


किसी को, कुछ और नहीं होना है 

जो, जो है, वही होकर, स्वयं को संजोना है 

गुलाब, गुलाब रहकर ही महकेगा 

कमल जल में ही चहकेगा 

निजता को पहचान, उस पर महल बनाना है 

न कि किसी की अनुकृति बनने की दौड़ में 

ख़ुद को तपाना है 

जीवन हरेक के योगदान से बना है 

एक घास का तिनका भी उतना ही ज़रूरी है 

जितना आकाश में कोई वृक्ष तना है 

एक पत्थर भी नदी के तल को 

मज़बूत बनाना है 

हिमालय भी धरती की शोभा बढ़ाता है 

हर कोई अपने जैसा है,  तभी खास है 

कोई दो पत्ते भी एक से नहीं होते

जो रहते आसपास हैं !

सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !



मंगलवार, सितंबर 10

बहा करे संवाद की धार

बहा करे संवाद की धार 

टूट गई वह डोर, बँधे थे 

जिसमें मन के मनके सारे, 

बिखर गये कई छोर, अति हैं  

प्यारे से ये रिश्ते सारे !


गिरा धरा पर पेड़ प्रीत का 

नीड़ सजे जिस पर थे सुंदर, 

 शाखा छोड़  उड़े सब पंछी

आयी थी ऐसी एक सहर !


 अब उनकी यादों का सुंदर 

चाहे तो इक कमल खिला लें, 

मिलजुल कर आपस में हम सब 

 मधुर गीत कुछ नये बना लें !


बहा करे संवाद की धार 

चुप्पी सबके दिल को खलती, 

जुड़े हुए हैं मनके अब भी 

चाहे डोरी नज़र न आती !


कभी कोई प्रियजन सदा के लिए विदा ले लेता है तो परिवार में एक शून्यता सी छा जाती है।

इसी भाव को व्यक्त करने का प्रयास इस रचना में किया गया है।


सोमवार, मई 20

सत्य

सत्य 

पाया नहीं जा सकता इसे 

 पहचानना है 

महसूस भर करना है  

जो अस्तित्व में उपस्थित है  

इसे उजागर भर होना है  

 नया नहीं है सत्य

अनादि अस्तित्व है

 जागरूक होना है जिसके प्रति

जो जानता है जितना अधिक 

 उतना ही ढका है अज्ञान से 

ज्ञान  बन जाता है अज्ञान

  जब  ढक जाता है मन 

उसकी स्मृति के काले बादलों से

सोचने से नहीं मिलता यह 

न ही स्थानांतरित हो सकता है

सदैव प्रतीक्षारत है

वृक्ष, पशु, यहाँ तक निर्जीव भी 

ओतप्रोत हैं इससे

चट्टानों में जो सोया है

थोड़ा सा जगा है पेड़ों में 

पशुओं में कुछ अधिक 

और खिल गया है पूरा मानव में 

कोई बुद्ध सत्य की याद दिलाता है 

जो गहराई तक उतर जाती है 

 आंदोलित हो जाता है अस्तित्व

और एक दिन खिल जाता है 

मन का कमल

या कहें सत्य कमल  !



रविवार, जून 4

नयनों में नित नव साध रहे

नयनों में नित नव साध रहे


मृदु छंद बहा, मकरंद बहा 

जब वे अनजाने हाथ गहे,

जीवन में शुभ सन्तोष जगा 

नयनों में नित नव साध रहे !


लय, ताल, सुगम सध जाते सुर 

जब अनदेखे नाते जुड़ते, 

पंछी, पादप, चाँद,  सूर्य  से 

नेह भरे संदेशे मिलते !


जिसके तट पर मानस ठहरे 

सरिता अंतर में उग आती, 

जन्मों की तृप्ति कराये जो 

अजस्र धारा बहती जाती !


गंध धरा से, रंग गगन से 

सरसिज खिला पंक में कोमल, 

जल से जुड़ी मूल नभ से तन 

पवन झुलाता अम्बुज  श्यामल !


अंतर्कमल  चेतना का जब 

महासरोवर में खिलता है, 

प्रकृति माँ की भरे सुवास उर 

जग से पुलकित हो मिलता है !


शनिवार, दिसंबर 24

ज्योति कमल नित नए खिलाता

ज्योति कमल नित नए खिलाता


वह अनंत ही, सांत बना है 

भरमाता खुद को, माया से 

सत्य मान जो, भ्रमित हो गया 

डर जाता है, जो छाया से !


नित  प्रेम जो, मोह में फँसता

सदा शांत, पर द्वेष जगाए 

जीवन विमल अमृत सा बरसे, 

अनजाने में गरल बनाए !


सुख की चाह सदा भरमाती 

खुद से दूर चला जाता है, 

अपने भीतर भर भंडारे 

उर चिर तृषित  छला जाता है !


जो हल्का है लघु तिनके सा 

भारी भीषण हिम पर्वत सा, 

दूर अति नक्षत्र अनंत सा 

श्वासों से भी निकट बसा है !


जिसका होना वही जानता

बिरला कोई  ही लख पाता,

गुनगुन भँवरे सा गाता है 

ज्योति कमल नित नए खिलाता !


सोमवार, जुलाई 18

जब याद कमल सर खिलता है

जब याद कमल सर खिलता है


तू हर उस पल में मिलता है 

जब याद कमल सर खिलता है, 

नहीं अतीत न भावी में ही 

दर्पण दर्शन का मिलता है !


मन जो नित भागा ही रहता 

कही हुई को फिर-फिर कहता, 

व्यर्थ कल्पना महल बनाए 

इस पल में ना कभी झाँकता !


जिसके पीछे ही अनंत इक 

अमन समंदर लहराता है, 

उस पल का उर बने आवरण 

जाने क्यों स्वयं को छल रहा !


शुक्रवार, अक्टूबर 8

काली माँ, कपालिनी अम्बा

काली माँ, कपालिनी अम्बा


कल्याणी, निर्गुणा, भवानी

अखिल विश्व आश्रयीदात्री,

वसुंधरा, भूदेवी, जननी

धी, श्री, कांति, क्षमा, सुमात्री !


श्रद्धा, मेधा, धृति तुम माता 

अम्बा गौरी, दुःख निवारिणी

जया, विजया, धात्री, लज्जा

कीर्ति, स्पृहा, हो दया कारिणी !


चिन्मयी दिव्य पराम्बा तुम

उमा, पार्वती, सती, भवानी,

ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मस्वरूप 

सावित्री, शाकम्बर देवी !


काली माँ, कपालिनी अम्बा

स्वाहा तुम्हीं स्वधा कहलाती,

विश्वेश्वर, आनन्ददायिनी

क्षेमंकरी, पर्वत वासिनी  I


त्रिगुणमयी, करुणामय, कमला

चण्डी, शाम्भवी, हो सुभद्रा,

हे भुवनेश्वरी, मात गिरिजा

मंगल दायी, हे जगदम्बा !  


सिंह वाहिनी, कात्यायनी

चंद्रघंटा, कुष्मांडा भी, 

अष्टभुजा, स्वर्णमयी माता 

त्रिनेत्री तुम सिद्धि दात्री I


रविवार, जून 13

मंजिल या मंझधार

मंजिल या मझधार 


हम पहुँच ही जाते हैं किनारे पर 

कि कोई लहर बहा ले जाती है 

संग अपने 

और डूबने लगते हैं फिर मझधार में 

न जाने कितनी बार 

यह इतिहास दोहराया गया है 

मंजिल जिसे समझ बैठे थे 

हर बार वह रास्ता ही पाया गया है 

जब अनंत है वह 

तो मंजिल बन भी नहीं सकता 

अनंत ही होंगे उसके ठिकाने 

अनंत की हो तो चाहत मन में 

तभी वह मिलेगा 

जीवन का यह भेद जानकर ही 

मन का कमल खिलेगा 

वह पूर्ण है तो पूर्णता में ही उसे खोजना होगा 

कोई भी अभाव न खले भीतर 

तभी एक क्षण के लिए भी 

वह हाथ नहीं छोड़ेगा !

 

बुधवार, नवंबर 11

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


 हजार राहे हैं जिनसे गुजर के तू मिलता है 
किसी बाग में कमल कभी गुलाब बना खिलता है 

हरेक मुट्ठी में कैद है एक आसमां अपना 
जब जो ख्वाहिश करेगा चाँद उस पल निकलता है 

एक रस्ता पकड़ ले और चलता चले उसी पर 
क्यों निगाहों को बिखेरे दिलेदर्द पिघलता है 

हजार नदियां गुजर कर जहाँ भी पहुँचें
समंदर एक ही हरेक को मिलता है 

क्यों कशमकश में दिनों तक लम्हे गुजरते हैं 
वक्त के पार ही वह जांनिसार मिलता है 

थम जाये मन की दौड़ जिस पल किसी की कहीं
खुले वह द्वार जो उसके दर पे निकलता है 

गौर से देखा है कभी मन को समझा भी 
इन्हीं के पानियों में उसका कमल खिलता है 

गुरुवार, अक्टूबर 15

सिंधु से नाता जोड़ लें

 सिंधु से नाता जोड़ लें

नींद टूटे, स्मरण जागे 

फिर खिल उठे मन का कमल  

 जो बन्द है मधु कोष बन  

   हो प्रकट वह शुभता अमल !


हम बिंदु हैं तो क्या हुआ 

सिंधु से नाता जोड़ लें, 

इक लपट ही हों आग की 

रवि की तरफ मुख मोड़ लें !


अब शक्ति को पहचान निज 

खिल कर उसे बह लेने  दें, 

जो सुप्त है कई जन्म से 

हो व्यक्त सब कह लेने दें !


रविवार, जून 14

तेरा आना

तेरा आना 

तू देता है तो दिए ही चला जाता है 
बह जाते हैं सारे  द्वंद्व जिसमें 
खो जाते हैं भेद सभी 
गिर जाती हैं दीवारें 
तू बरसता है तो बरसे ही चला जाता है 
धुल जाती है धूल मन के दर्पण से 
स्वच्छ हो जाती है दृष्टि 
उग आते हैं कोमल अंकुर 
उगता है केवल देने का भाव 
मिट जाते हैं सारे अभाव 
तेरा आना किसी बदली की तरह नहीं होता 
आच्छादित हो जाता है सारा नभ क्षितिजों तक 
तेरा आना हवा के किसी झोंके की तरह नहीं होता 
छा जाती है मधुऋतु 
तेरा आना किसी महाआकाश के आंगन में उतर जाने सा है 
किसी सागर के दिल में समाने सा है 
तू सुहृद बनकर साथ चलता है 
तेरे साये में ही हर दिल का कमल खिलता है !

रविवार, मई 3

उसका होना

उसका होना


कोई रेशमी सा ख्याल या 
इंद्रधनुष अटका अम्बर में, 
मादक मीठी तान गूँजती 
कोमल कमल खिला सर्वर में !

कोई ज्यों आवाज दे रहा 
हरियाली सी बिछी डगर पर,
मखमली पगत्राण धरे हों, 
या फूलों के दल हों पथ पर ! 

जैसे कोई लड़ी गीत की
या कोई अनकही कहानी,
रस्ता दिखलाती जाती हो
झरनों में जो बसी रवानी !

हौले हौले से छूती हो, 
कोई अनजानी फुहार या, 
धीमे-धीमे से बहती हो, 
पूरब की मीठी बयार या !

मेघों में जा छुपा सूर्य क्या, 
कोई तृप्ति शाल ओढ़ाकर,
तकता हो बनकर आशीषें, 
जीवन का सुअर्थ महकाकर !

कोई अपने हाथों से आ, 
सहला जाता उर का पाखी, 
पंखों में उड़ान भर जाता, 
देकर खबर किसी मंजिल की !

सोमवार, अप्रैल 27

हम और दुनिया

हम और दुनिया 


हम जैसे हैं, 
वैसे ही स्वीकार करे दुनिया 
चाहते हैं हम, 
क्योंकि बदलना हमें भाता नहीं 
इसमें श्रम लगता है, खुद को तराशना पड़ता है 
जो हमें  आता नहीं !
अपनी भूलें भी सहज लगती हैं 
आखिर वे किसी का क्या बिगाड़ती  हैं ?
पर... दुनिया को तो बदलना होगा 
हमारी ख्वाहिश यही है !
वहां असत्य है ( जैसे कि हम सत्य के अवतार हैं )
वहां अन्याय है ( हम तो न्याय के पुजारी हैं )
वहां अधर्म है ( जैसे कि हम धर्म का पाठ पढ़कर ही जन्मे थे )
वहाँ हमें कोई समझता नहीं (जैसे हमने हर किसी को समझने का प्रयास कर ही लिया है )
हम स्वीकारते हैं स्वयं को सारी भूलों सहित 
तो क्यों न स्वीकार लें जगत को जैसा वह है !
परमात्मा हर जगह उतना ही समाया है 
जिसे वह कमल और कीचड़ दोनों में नजर आया है 
वह जानता है
 कमल खिल नहीं सकता बिना कीचड़ के 
हाँ, उससे ऊपर उठता है जो 
वह यह राज देख पाता है 
धर्म-अधर्म दोनों के परे जाकर ही 
कोई उस एक से जुड़ पाता है !