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रविवार, दिसंबर 29

चिकमगलूर डायरी

चिकमगलूर डायरी 


आज सुबह लगभग सात बजे हम बैंगलुरु से निकले थे, हमारा लक्ष्य था कर्नाटक का एक खूबसूरत पहाड़ी स्थान चिकमगलूर ! चिकमगलूर शब्द का अर्थ है छोटी बेटी का शहर. कहा जाता है कि इसे सखरायपटना के प्रमुख रुक्मंगदा की छोटी बेटी को दहेज में दिया गया था. हासन आने से पूर्व ही ‘पाकशाला’ में सुबह का नाश्ता ग्रहण किया; दोसा-इडली और कॉफ़ी।दोपहर बारह बजे तक हम चिकमगलूर पहुँच गये, गेटवे ताज होटल में कदम रखते ही लाइम कोल्ड कॉफ़ी से स्वागत किया गया। यहाँ चारों ओर हरे-भरे बगीचे, लॉन और विशाल वृक्ष लगाये गये हैं। पंछियों की आवाज़ें रह-रह कर आ रही हैं। चीड़ के एक वृक्ष के नीचे सुंदर छोटे कोन गिरे थे, गुड़हल के अनेक रंगों के बड़े-बड़े फूल अपनी ओर खींच रहे थे।स्विमिंग पूल भी है और बाहर व भीतर खेल खेलने के ढेर सारे इंतज़ाम।हमने कुछ देर ऊँचे विशालकाय वृक्षों को निहारते बिताया फिर भोजनालय का रुख़ किया। 

दोपहर के भोजन के बाद तीन बजे हम श्री प्रसाद का कॉफ़ी बाग़ान देखने निकले। हरा-भरा बाग़ान काफ़ी बड़े इलाक़े में फैला था, पौधों पर हरे और लाल रंग के फल लगे थे, अधिक पके या कच्चे दोनों ही तरह के फलों से कॉफ़ी नहीं बनती।फल तोड़ने वाले मज़दूरों को पूरी जानकारी होनी चाहिए कि वे सही मात्रा में पका फल ही तोड़ें। यह सारा इलाक़ा कॉफ़ी की खेती के लिए जाना जाता है।हमारे गाइड श्री प्रसाद ने बड़े ही मनोयोग से इस बारे में कई जानकारियाँ साझी कीं।उन्होंने बताया, पहले-पहल इथियोपिया में चरवाहों को अपनी बकरियों के कारण इस पौधे की जानकारी मिली, जिसके फल खाकर वे ऊर्जा से भर जाती थीं। इसके बाद अरब देशों में इसकी खेती होने लगी। कर्नाटक में या कहें कि भारत में  कॉफी का इतिहास 17वीं शताब्दी से शुरू होता है, जिसका श्रेय बाबा बुदन को जाता है, जो एक सम्मानित सूफी संत थे। मक्का की तीर्थयात्रा करते समय किसी तरह वे यमन से कॉफी के सात बीज लाए और उन्हें चंद्रगिरी पहाड़ियों की ढलानों पर लगाया, जिससे इस क्षेत्र में कॉफी की खेती की शुरुआत हुई।भारत से ही कॉफ़ी की जानकारी यूरोप में गई। 

चिकमगलूर में अरबिका कॉफ़ी और कूर्ग में रोबस्टा क़िस्म उगायी जाती है।वैसे कॉफ़ी की सौ से अधिक क़िस्में हैं पर वे सभी इन दो मुख्य क़िस्मों में ही आती हैं। उनके बाग़ान में उगायी जाने वाली काफ़ी की फसल का नाम हेमावती अरबिका है। उन्होंने बताया कॉफ़ी का एक पौधा बीस से साठ वर्षों तक जीवित रह सकता है पर अधिक पुराना होने पर फल कम देता है, इसलिए पहले ही नये पौधे लगा दिये जाते हैं। बाद में श्री प्रसाद हमें अपनी कार्यशाला कम दुकान में ले गये। जहाँ उन्होंने अनेक प्रकार के सूखे हुए कॉफ़ी के बींस दिखाए, उनके पाउडर से फ़िल्टर काफ़ी बनाकर भी सभी को चखने के लिए दी।यदि इसके फल को पूरा सुखाया जाता है, तो उन बीजों से बनी कॉफ़ी को फ़्रूटी कहते हैं, केवल बीजों को सुखाकर नटी कॉफ़ी तथा पूरी तरह धोकर सुखाए गये बीजों से चाकलेटी काफ़ी बनती है। फ़िल्टर कॉफ़ी बनाने के लिए एक ग्राम पाउडर में सोलह ग्राम गरम पानी धीरे-धीरे करके डालना चाहिए।इंस्टेंट कॉफ़ी बनाने के लिए फ़िल्टर की हुई कॉफ़ी को सुखाकर बनायी जाती है, तथा उसमें चिकोरी भी डाली जाती है। चिकोरी एक जड़ी-बूटी है, जिसकी जड़ को सुखाकर व भून कर पीसा जाता है। इसका स्वाद कॉफ़ी के स्वाद को बढ़ाता है, तथा गाढ़ा करता है। कॉफ़ी के बारे में इतनी सारी जानकारी पाकर सभी पर्यटक आनंदित थे। 


संध्या का समय है।दूर से संगीत की आवाज़ आ रही है। इस समय हम होटल के कमरे में हैं। पुत्र व पुत्रवधू नीचे वाले कमरे हैं।कमरे में लिखने की मेज़ और सोफा भी है। बाहर बालकनी में भी कुर्सियाँ रखी हैं। चाय बनाने का समान और कुरमुरे स्नैक्स भी रखे हैं। सुबह बैंगलुरु से आते समय नारियल के एक वृक्ष के कई पत्तों पर श्वेत बगुलों की क़तारें देखी थीं, वह दृश्य जैसे मन में ठहर गया था, अभी-अभी आई पैड पर उसे बनाने का प्रयास किया। असली चित्र तो इससे अनेक गुणा सुंदर था।शाम को कॉफ़ी बाग़ान से लौटते समय हम अय्यनाकेरे झील देखने गये थे पर रास्ता भटक जाने के कारण कुछ देर से पहुँचे। हमने अभी झील के किनारे भ्रमण आरंभ ही किया था, कि एक पुलिस वाले ने आकर  कहा, छह बजे समय सीमा  समाप्त हो जाती है। अब गेट बंद किया जाएगा। हमने कुछ तस्वीरें उतारीं और कल सुबह पुन: आने की बात सोचकर वापस हो लिए। एक अमरूद वाला गेट के पास ही बैठा था, उससे दो अमरूद ख़रीदे, जो बेहद मीठे थे।

संगीत का स्वर और मधुर होता जा रहा था, हम उस स्थान की ओर गये, जहाँ एक युवा दंपत्ति नये-पुराने फ़िल्मी गीत गा रहे थे, हिन्दी और कन्नड़ भाषा के वे गीत भोजनालय से बाहर बरामदे में गाये जा रहे थे।गायक अपनी धुन में मस्त थे, संगीतकार अपनी धुन में, उन्हें इस बात की फ़िक्र नहीं थी कि कोई उन्हें बैठकर सुन रहा है या नहीं, आते-जाते लोग कुछ देर ठहरकर अवश्य सुनते, फिर डिनर स्थल पर चले जाते। हमने भी रात्रि भोज के बाद आकर उन्हें आभार व्यक्त किया, जब वे अपने वाद्य समेट रहे थे। 

अगले दिन सुबह जल्दी उठकर हम कर्नाटक की दूसरी सबसे बड़ी झील अय्यनाकेरे, जो चिकमगलूर शहर से 20 किलोमीटर दूर है, पुन: देखने आये। यह झील खेती के लिए पानी की आपूर्ति के लिए बनाई गई थी. इस झील के चारों ओर तीन पहाड़ हैं, जिनमें शकुनागिरी पहाड़ सबसे खूबसूरत है. यहाँ से बाबा बुदान रेंज की पहाड़ियाँ भी दिखायी देती है। इसका निर्माण सखरायपटना के शासक रुक्मांगदा राय ने करवाया था, जिसका जीर्णोद्धार ग्याहरवीं शताब्दी में हॉयसल शासकों ने करवाया। यहाँ का रख-रखाव देखकर बहुत निराशा हुई, लग रहा था काफ़ी दिनों से वहाँ सफ़ाई नहीं हुई है। पंछियों की उड़ान देखते और जल के कलकल स्वर को सुनते हुए झील पर सुबह का मनोरम समय बिताने के बाद हम बेलूर स्थित यागची नदी पर बना बाँध देखने गये। वहाँ का दृश्य अति मनोरम था। एक विशाल जलाशय दूर तक फैला था। जिसके किनारे-किनारे टहलने के लिए मार्ग बना था। इसके बाद हमने बेलूर स्थित चेन्नकेशवा मंदिर जाने का प्रयास किया पर गूगल की सहायता से हम वहाँ का मार्ग नहीं खोज पाये। ऐसे ही मुल्लायनगिरी पर्वत की चढ़ाई करने की हमारी योजना भी वहाँ के मंदिर में चल रहे एक उत्सव के कारण स्थगित करनी पड़ी है। इस तरह एक बार फिर इस सुंदर स्थान की यात्रा करने का निमित्त बन चुका है। 


बुधवार, अगस्त 7

छोटी बुआ

दो वर्ष पूर्व यह संस्मरण मैंने लिखा था, पर तब पीड़ा इतनी थी कि इसे किसी से साझा करने का मन नहीं हुआ, आज दो वर्ष बाद मन कृतज्ञता से भरा है सो आप सब के साथ इसे बाँट रही हूँ.


छोटी बुआ


गैया-मैया बाँय-बाँय
तेरा दूध-दही हम खाएं,
तेरा बछड़ा जोते खेत
जिसकी मेहनत सोना देत,
तेरे गोबर को हम मानें
जो बरसाए मोती दाने !
...............................
............................
३० जून २०११
यह कविता बचपन में मुझे छोटी बुआ ने याद करायी थी, हम साथ-साथ गाया करते थे. बरसों बीतने पर भी जब भी उनसे मिलना हुआ हम इस कविता का जिक्र एक बार जरूर करते थे. उन्हें यह कविता पूरी याद थी और मुझे सदा एकाध पंक्ति भूल जाती थी. धर्मयुग में छपी थी यह कविता, पीछे के पन्नों पर जहाँ बच्चों का कोना हुआ करता था, अब तो न धर्मयुग रह गया है न ही छोटी बुआ का कुछ पता है. उन दिनों पापाजी अपने दफ्तर के पुस्तकालय से लाया करते थे ढेर सारी पत्रिकाएँ और किताबें, कुछ दिन घर पर रहतीं फिर नई आ जातीं. हम सभी भाई बहनों को किताबें पढ़ने का शौक तभी से लग गया था. बुआ ज्यादा नहीं पढ़ती थीं पर इस कविता ने उन्हें बांध लिया था. उम्र में वह दीदी के बराबर ही थीं. माँ बताती थीं की जब दीदी का जन्म होने वाला था तो दादी और वह दोनों एक ही अस्पताल में साथ-साथ गयी थीं, एक ही कमरे में बुआ, भतीजी का जन्म हुआ कुछ दिनों के अंतर से. जाहिर है बुआ हम भाई-बहनों के साथ ही बड़ी हुईं, पर दादी की उम्र ज्यादा थी और ऊपर से उनकी आँखें भी बहुत कम देख पाती थीं, एक आँख बचपन से ही चेचक की शिकार हो गयी और दूसरी काला मोतिया बिगड़ जाने के कारण. अब घर का सारा काम बुआ के सर पर आ पड़ा. वह जैसे बचपन में ही बड़ी हो गयीं. मुसीबत अकेले नहीं आती, मंझले भाई की पत्नी को मिर्गी की बीमारी थी, जिसे विवाह से पहले छिपाया गया था, उनके आने से काम कम होने की बजाय और बढ़ गया.  बुआ मेरे ही स्कूल में पढ़ती थीं पहले मुझसे आगे पर बाद में मुझसे पीछे हो गयीं, एक बार स्कूल में उन्हें नाक पर गहरी चोट लगी, काफ़ी दिनों तक बिस्तर पर रहीं, दिमाग पर असर हो गया था, पढ़ाई में वह पिछड़ने लगीं. लेकिन साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखती थीं, पैरों को एकदम रगड़ कर साफ करतीं, स्कूल की ड्रेस रोज प्रेस करके पहनतीं, हम एक ही स्कूल में थे शायद आठवीं तक. उसके बाद हम दूसरे शहर चले गए. बुआ की पढ़ाई आगे नहीं हो पायी. अब उनके ऊपर अपने नन्हें भतीजे व भतीजी की जिम्मेदारी भी आ गयी थी, दीदी का विवाह हो गया उसके कई वर्षों बाद तक वह अपने माँ-पिता का घर सम्भालने का काम कर रहीं थीं. रंग साँवला था, शिक्षा भी कम थी और उनके विवाह की चिंता माता-पिता को सता रही थी, एक रिश्ता मिला अच्छा परिवार था सरकारी नौकरी में लड़का था, अब जाकर उनकी जिंदगी में कुछ खुशियाँ आयीं, विवाह के कुछ समय बाद जब मिलीं तो  बुआ बहुत खुश लग रही थीं. वह खाना बहुत अच्छा बनाती थीं, शादी के बाद एक बार वह कुछ दिनों के लिये हमारे घर आयीं, माँ मामा के यहाँ गयीं थीं, दीदी ससुराल की हो गयी थी, सो भोजन बनाने की जिम्मेदारी मुझ पर थी, उन्होंने मुझे आलू-टमाटर की सब्जी बनानी सिखाई, आज तक मैं उसी तरीके से यह सब्जी बनाती हूँ. वह कहती थीं की आलू को उबालने के बाद कभी भी चाकू से काट कर मत डालो, उसे हाथ से दबा दो और टमाटर को पीस लो या कस लो. जीरे का छौंक और हल्की मिर्च व नमक, हल्दी डाल कर बनाओ. एक और कला उनमें थी, दसूती व सिंधी टांके की कढ़ाई वह बहुत अच्छी करती थीं, मैंने उनसे प्रेरित होकर दो डबल बेड की चादरों पर कढ़ाई की, एक आज भी मेरे पास है. विवाह के कुछ समय बाद बुआ के दो बच्चे हुए, बड़ा बेटा और छोटी बेटी, दोनों बहुत होशियार और सुंदर. परिवार सुख से रह रहा था कि फिर गाज गिरी. फूफाजी को स्ट्रोक हुआ और वे पक्षाघात के शिकार हो गए, कई महीने इलाज चला कुछ ठीक भी हुए, दोबारा काम पर भी गए पर ज्यादा नहीं जी सके. इतना बड़ा आघात उन्होंने कैसे सहा होगा, बुआ को पति की जगह काम मिल गया, पढ़ाई कम थी सो काम भी मिला तो चतुर्थ श्रेणी का, जिस दफ्तर में पति ऊँची पोस्ट पर रहे हों वहाँ फाइलें पहुँचाने का काम करते हुए उनके दिल को ठेस लगती रही होगी, वह बीमार रहने लगीं. धीरे धीरे बच्चे भी बड़े हो गए और बेटा पढ़ाई करके नौकरी करने लगा. बेटी कॉलेज में आ गयी. पहले तो फोन पर वह बात करतीं थीं बाद में फोन पर बच्चों से ही खबर मिल जाती थी आज के युग में सभी अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं, सो मिलना तो बरसों से नहीं हुआ न ही वह परिवार की किसी शादी में आयीं, सबसे कटकर रह गयीं, यही दुःख रहा होगा जो उन्हें अंदर ही अंदर खाता गया और वह मानसिक रोग की शिकार हो गयीं, एक-दो बार बिना किसी को बताए घर से चली गयीं, फिर लौट आयीं, अब की बार गयीं हैं तो एक महीने से ऊपर हो गया है अभी तक उनका कोई पता नहीं है, हर रात मैं प्रार्थना करती हूँ कि कल शायद उनकी कोई खबर मिलेगी... ईश्वर ही उनके साथ है इस दुनिया में तो उन्हें सुख कम और दुःख ज्यादा झेलना पड़ा......

३० जुलाई २०१३
अब इस बात का पूरा यकीन हो गया है कि ईश्वर सदा हमारी प्रार्थनाएं सुनता है. कल रात अभी हम सोने की तैयारी कर रहे थे कि फोन की घंटी बजी, छोटे भाई का फोन था, बुआ की खबर मिल गयी है, सुनते ही विश्वास नहीं हुआ, दो वर्ष हो गये हैं उन्हें घर से गये हुए, उनके बच्चों ने ढूँढने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पुलिस में रिपोर्ट तो तभी दर्ज करा दी थी, अख़बार, टीवी सभी में उनकी गुमशुदगी का समाचार दे दिया था. आज अचानक कैसे क्या हुआ ? भाई ने बताया, वह मैसूर स्थित टाइम्स ग्रुप के करुणा ट्रस्ट के मानसिक अस्पताल में हैं, लगभग पौने दो वर्ष पूर्व उन्हें बैंगलोर रेलवे स्टेशन पर वहाँ की पुलिस ने देखा और उनकी हालत देखकर मैसूर भेज दिया. अब वे ठीक हो रही हैं, उन्होंने अपने बच्चों का नाम व घर का पता बताया जिससे लखनऊ पुलिस को खबर की गयी. आज शाम को चार बजे जब उनके दोनों बच्चे अपने-अपने काम पर थे. पुलिस का एक सिपाही आया, पड़ोसिन ने ही उसके फोन से बुआ से बात की और उन्हें पहचान लिया. भाई ने कहा इस वक्त उनका पुत्र अपने दफ्तर के लोगों की सहायता से हवाई जहाज द्वारा बैंगलोर रवाना हो चूका है और सम्भवतः कल या परसों वे अपने घर लौट आएँगी. बताते समय भाई की आवाज ख़ुशी से भरी हुई थी और सुनते समय मेरे मन में एक ही बात गूंज रही थी, ईश्वर ने कितने लोगों को निमित्त बनाया और बिछुड़े हुओं को मिलाया. उसकी कृपा अपार है.


शुक्रवार, अक्टूबर 21

दादी ! प्यारी दादी


दादी ! प्यारी दादी

मेरे बचपन की मधुर यादों में एक याद यह भी है, मेरे द्वारा अपनी दादीजी को रामायण (रामचरितमानस) पढ़कर सुनाना. भगवान राम पर उनकी पूरी आस्था थी. पहले दीदी से फिर मुझसे रामायण सुनती थीं. हमारे जाने के बाद छोटी भाभी से सुना करती थीं. आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है, मैं उस समय कितना सत्य मानती थी इस कथा को और दादीजी वह तो पूरी डूब जातीं थीं. पर उनके लिये शायद सत्य-असत्य का प्रश्न ही नहीं था, वह समर्पित थीं इस भावना को कि भगवान की कथा को सुनने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं. मैं पढ़ती जाती थी, पढ़ती जाती थी और कई बार तो जब काफ़ी छोटी थी तो पढ़ा हुआ एक भी शब्द समझ में नहीं आता था. फिर मैं पेज गिनती और दादी जी कहतीं, बस.. अब तुम थक गयी होगी.

दशहरे के दिन या उससे कुछ दिन पूर्व हम लंका कांड पढ़ना शुरू करते. दशहरे के दिन रावण की मृत्यु का वर्णन सुनाती तो उनकी आँखों में, नहीं उनकी आँखों में विश्वास नहीं दिखाई देता था बस वह संतुष्ट लगती थीं. उनकी एक आँख तो बचपन में ही चेचक के कारण जाती रही थी, दूसरी की रोशनी भी घटती जा रही थी. सहारनपुर के निकट  चमारीखेडा आंखों के अस्पताल में, जहाँ मैं अपने पिता के साथ साईकिल पर बैठकर उन्हें देखने गयी थी, २२ किमी० की वह यात्रा और जीवन में पहली और अंतिम बार गाँव में एक रात बिताने का अवसर आज तक याद है. सुबह-सुबह रहट पर जाकर हाथ मुँह धोया था. बाद में भवानी अस्पताल में  तथा सीतापुर में भी उनकी आँखों का इलाज कराने की कोशिश तो की गई थी पर सफलता नही मिली.

मै जब कॉलेज में पहुँच गयी तो लगता था कि अब रामायण पढ़कर सुनाऊं तो पहले जैसी बात नहीं रहेगी, जबकि तब मैं पहले से कहीं अच्छी तरह समझ सकती थी या समझा सकती थी. पर एक तो तब समय नहीं मिलता, कभी उनसे मिलने भी जाती तो यह याद ही नहीं रहता और दादीजी भी कभी नहीं कहती थीं. फिर विवाह के बाद तो उनसे मिलना साल में या दो साल में एक बार होता था. वह जैसे जैसे वृद्ध होती जा रही थीं आँखें बिल्कुल ही नहीं देख पाती थीं, उनकी मृत्यु भी इसी कारण हुई, आज उनकी बहुत सी यादें स्मृति पटल पर दस्तक दे रही हैं. कल रात बरसों बाद उन्हें स्वप्न में देखा. हम जिन पूर्वजों के कारण इस दुनिया में आते हैं उन्हें ही भूल जाते हैं, हमारी स्मृति बहुत अल्प है.
दादीजी हमें बताती थीं कि जब उनकी शादी हुई तो उनकी सासूजी उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें कोई भी एक काम में लगाने के बाद जल्दी ही दूसरा काम बता देतीं थी, जैसे कि वह आटा गूँथ रही हैं तो उन्हें कहती जा एक गिलास पानी ले आ. वह आटा गूँथना छोड़ कर फौरन पानी देने पहुंच जाती. उनका कहना था कि वह कभी किसी काम के लिए न नही करतीं थीं, उनकी सासूजी का पूरा नियंत्रण था उन पर.

दादीजी हमें कहानियाँ भी सुनाती थीं, दया करने वाली चिड़ियों और एहसान फरामोश चुहियों की कहानी. एक राजा और और उसकी सात रानियों की कहानी. एक अनार सौ बीमार वाली कहानी भी सुनाती थीं, हर मंगलवार को  हनुमान चालीसा भी मुझसे सुनती थीं.

यह भी उनके बारे में सुना था कि उन्हें बाहर जाने के लिए कपड़े बदलने में जरा भी आलस्य नहीं आता था, भले ही दिन में तीन चार बार कपड़े क्यों न बदलने पड़ें. और बिना ढंग के कपड़े पहने वह कभी बाहर नही निकलती थीं. आटे के बिस्किट, गली की खुली बेकरी से अपने सामने बनवा के लाती  थीं. उन बिस्कुटों का स्वाद अभी तक किसी ब्रांड के बिस्किट्स में नही आया.

दीदी ने बताया कि बचपन में मथूरो चाचीजी की बेटी लक्ष्मी के घर श्राद्ध का खाना हम बच्चे लेकर नुमाइश कैम्प स्थित उनके घर जाते थे. हलवा, पूड़ी, खीर एक बड़े से टिफिन में भर कर, एक बार हम नुमाइश कैम्प से आते समय थोड़ा दूसरे रास्तों से घूमते हुए घर देर से वापिस आये तो दादीजी ने समझाया कि लडकियां ऐसे इधर उधर नही भटकतीं, सीधे रस्ते से घर आना चाहिए.

मन की आँखो के सामने उनकी तस्वीर चूल्हे में लकडियाँ जलाने के लिए फूंकते हुए आती है या फिर राख से बर्तन साफ़ करते हुए या रामायण सुनते हुए. मुझे उनका अहोई के त्यौहार के दिन बच्चों को एक जगह छिपने को कहकर फिर आवाज देकर बुलाना भी याद है, जिसके बाद हमें प्रसाद मिलता था. पंडित जी घर पर आकर सभी के हाथों में लाल सूत्र बांध जाते थे. अब न वह त्योहार रहे न ही आज बच्चों के पास इतना समय रह गया है.

दादीजी में यह विशेषता भी थी कि कहीं भी उन्हें कोई चित्र बना हुआ दिख जाये तो वह उसे अपनी याददाश्त से कसीदकारी(कढ़ाई)में उतार देती थीं.पर जल्दी ही आँखे खराब हो जाने से यह गुण छुपा ही रह गया. आज उनको याद करते हुए शत शत नमन करने के सिवाय और कुछ भी नहीं कर सकती... हाँ यह कामना जरूर कर सकती हूँ कि वे जहाँ भी हों अपने नए रूप में... खुश रहें और अपने आस-पास खुशियाँ बिखराती रहें.

बुधवार, अगस्त 24

बच्चों के स्कूल की पत्रिका के लिए एक संस्मरणात्मक लेख


बचपन के दिन भी क्या दिन थे

अभी कुछ दिन पूर्व टाइनी टॉटस् स्कूल की प्रधानाध्यापिका ने फोन पर कहा कि मैं उनकी स्कूल- पत्रिका के लिए कोई लेख या संस्मरण लिखूं. मानस पटल के पृष्ठ पलटे तो मुझे उन्नीस-बीस बरस पहले की कई बातें याद आने लगीं, जब मेरा पुत्र सिद्धार्थ (गुड्डू) पहले नर्सरी फिर किंडर गार्टन में पढने गया था. वह तीन वर्ष का था जब हमने पहले-पहल उसका नाम लिखवाया पर कुछ ही दिन वह स्कूल गया होगा, कुछ पारिवारिक कारणों से व बी.एड. करने के विचार से एक वर्ष के लिए मैं उसे लेकर वाराणसी चली गयी. पुनः चार वर्ष की आयु में उसका दाखिला हुआ. उसे ऐसा ही लगा जैसे पहली बार वह स्कूल गया है, उस दिन वह थोडा उदास था. मुझे याद है उसे पहले दिन स्कूल छोडकर मैं भी घर नहीं जा पाई थी सामने जालोनी क्लब में चली गयी कुछ देर बाद पुनः उसकी कक्षा के बाहर से ही झांक कर देखा वह टीचर के पास ही खड़ा था, और हँस कर कुछ बात कर रहा था. मैं फिर आश्वस्त होकर घर लौट गयी. पर मन में बहुत सी बातें घूम रहीं थीं, अब उसे अपने आप खाना भी सीखना होगा, सुबह जल्दी उठना नहीं चाहता है, सुबह उसे कुछ खाना भी पसंद नहीं है, कैसे वह अकेले रहेगा. लेकिन वह स्कूल से लौटा तो बहुत उत्साहित था, अगले कुछ ही दिनों में कई राईमस् भी याद करके सुनाने लगा था.

उसकी अध्यापिका से बात करके हमने उसे के.जी. के लिए टेस्ट दिलवाया और वह नई कक्षा में जाने लगा. रोज सुबह स्कूल जाने से पहले बोलता, बस आज मैं नहीं जाऊंगा सिर्फ आज, जबकि उसे पता होता कि वह जायेगा जरूर. कभी कभी आंसू भी निकल आते पर मैं रिक्शे पर बैठा कर उसे विदा कर देती, यह सोचते हुए कि थोड़ी देर में अपने आप चुप हो जायेगा. पर कभी-कभी स्कूल जाने के लिए उसका उत्साह देखते ही बनता था, घर आकर गृह कार्य करता और ढेर सारी बातें बताता, पता नहीं बच्चों में इतनी ऊर्जा कहाँ छुपी रहती है. शायद उन्हें परमात्मा का रूप इसीलिए कहते हैं क्योंकि  उनका सम्बन्ध ऊर्जा के स्रोत परमात्मा से जुड़ा ही रहता है. छुट्टी के दिन वह दिन में सोना नहीं चाहता, शाम होते ही झूला पार्क जाने की तैयारी शुरू हो जाती, अब तो वह अकेला भी जाने लगा.

एक दिन स्कूल से आकर उसने कहा कि उसका टिफिन किसी बच्चे ने फिर से खा लिया, हमने पूछा तो क्या पहले भी खाया था. तो उसने कहा, “अरे, क्या आपको पता नहीं है बच्चे एक दूसरे का टिफिन खाते ही रहते हैं ! मैं उसका मुख ही देखती रह गयी. शुरू शुरू में वह शर्माता बहुत था, किसी को कविता सुनाने में घबराता भी था. एक दिन घर आकर कहने लगा आज मैं रोया था, आपकी याद आ रही थी.

उसकी पहली परीक्षा आयी तो हम उसे ज्यादा पढाना चाहते थे, वह खेलना चाहता था, पढ़ने के लिए उसे बैठाना कितना मेहनत और सूझबूझ भरा काम था इसे कोई माँ ही जान सकती है. बच्चा और खेल एक-दूसरे के पर्याय हैं. जब तक वह जगता है खेलना ही चाहता है, आज सुनती हूँ कि जीवन को खेल की तरह लेना चहिये तो बच्चों पर प्यार आता है पर मुझे याद है उस वक्त तो उसे  जबरदस्ती खेल से उठाना ही पड़ता था.

एक बार वह स्वप्न में बहुत हंस रहा था जब जगा तो मैंने कारण पूछा. उसने अपना स्वप्न सुनाया और यह भी कहा कि इसे डायरी में लिख लीजिए ताकि बाद में पापा भी पढ़ सकें, “ मैं और एक बच्चा जा रहे थे, कि एक आइसक्रीमवाला तथा एक किताबवाला मिला. आइसक्रीमवाले के पास मैं गया और उसे एक लकड़ी दी कहा कि इस पर आइस क्रीम लगा दो, उसने मना कर दिया. लकड़ी पर नहीं लगाई पर मेरे चेहरे पर उसने आइस क्रीम लगा दी, और मैं खूब हँसने लगा.

घर के खाली कमरे को उसने अपना दफ्तर बना लिया था. रोज स्कूल से आकर खाना खाकर पहले वहाँ जाता और पता नहीं किसे-किसे टेलीफोन करता व टाइपराइटर पर कुछ काम करता, जाने क्या-क्या कहता और कौन उसकी बातों का जवाब भी देता. मुझे याद है एक बार वह स्कूल से लौटा तो किसी और के कपड़े पहने हुए था जाहिर है हमें थोड़ी उत्सुकता हुई, पता चला वह स्कूल में गिर गया था कपड़े गंदे हो गए सो टीचर ने दूसरे कपड़े पहना दिए. तब भी हमें और कई अवसरों की तरह स्कूल पर गर्व हुआ था.

स्कूल में यदि टेस्ट हो तो तबियत ठीक न होने पर भी वह जाने की जिद करता था. एक बार उसकी बांयी आंख हल्की लाल थी, वर्षा भी हो रही थी मैंने कहा आज वैसे भी बच्चे कम आएंगे तुम मत जाओ, पर स्कूल छोडना उसे गवारा नहीं. एक दिन स्कूल जाने से पहले वमन हो गया तो मैंने कहा आज रहने दो कहीं स्कूल में कुछ ऐसा हुआ तो क्या करोगे, जवाब में उसने कहा टीचर से “एक्सक्यूज मी” कहकर सिंक पर चला जाऊंगा और कुल्ला करना भी मुझे आता है.

एक बार की बात हमें कभी नहीं भूलती शाम को, बल्कि रात ही हो गयी थी वह बाथरूम में था कि रोने लगा, बहुत पूछने पर बताया, परीक्षा में उसने एक स्पेलिंग गलत लिख दी थी, अब उसे सही स्पेलिंग याद आयी है, हम उसे मुश्किल से समझा पाए. बच्चों का मन कितना कोमल होता है उनके मन पर धीरे- धीरे दुनिया के रंग-ढंग चढते जाते हैं, बड़ों के तनाव का असर भी उनके मन पर पड़े बिना नहीं रह सकता. माता-पिता के शिक्षक भी बन जाते हैं कई बार बच्चे, जब वे अपनी  झूठी अहम् की लड़ाई में यह भूल ही जाते हैं कि बच्चा चाहे कुछ न कहे सब समझ रहा है.

एक बार पाँच स्पेलिंग याद करके ले जाने को उसकी टीचर ने कहा था और अगले दिन डिक्टेशन लेने को कहा था, उसको शायद याद करने में इतनी मुश्किल नहीं होती पर वह थोडा डर गया, बोला एक दिन में बच्चे कैसे याद कर सकते हैं, बच्चे बहुत संवेदनशील भी होते हैं. मजाक में उसके पिता ने कह दिया कि जीरो मिलेंगे बस आँखों में आंसू भर लाया. बच्चे पिता को अपना आदर्श मानते हैं, एक दिन कहने लगा कि उसे अंग्रेजी फिल्मों में या तो कॉमेडी पसंद है या जेम्सबॉंड की फ़िल्में. एक बार पिता के मुख से सुन लिया कि उन्हें हर सब्जी में आलू नहीं अच्छे लगते, कुछ दिनों के बाद स्कूल से लौटा तो गम्भीर होकर बोला, “आप रोज-रोज आलू ही क्यों देती हैं, मुझे जरा भी पसंद नहीं” जबकि आलू उसे बहुत पसंद थे.
कहानियाँ सुनना उसे बहुत भाता, सुपर मैन, ही मैन, स्पाइडर मैन उसके मनपसंद नायक थे. रामायण की कहानी याद ही हो गयी थी मैं शुरू करती तो आगे खुद ही सुनाने लगता. कभी-कभी टीवी पर कहानी सुन कर हमें भी खूब चटखारे ले लेकर सुनाता. कभी हम अपनी किसी रोचक पुस्तक में मगन होते तो वह चम्पक पढ़ने की जिद करता हम डांट कर उसे सुला देते. हमें थोड़ी देर अफ़सोस भी होता पर जानते थे कि सोकर उठेगा तो सब कुछ भूल चुका होगा. तभी तो बच्चे इतने प्यारे लगते हैं वे हम बड़ों की तरह बात को पकड़ते नहीं.

बच्चे को दिनोंदिन व धीरे-धीरे समझदार होते और बड़ा होते हुए देखना माता-पिता दोनों के लिए एक अनोखा अनुभव होता है. एक पल वह नन्हा बच्चा बन जाता है पर अगले ही पल कोई ऐसी बात कहेगा कि लगता है, अब बड़ा हो गया है. एक रात कहने लगा, माँ, जब मैं अकेला होता हूँ तो अकेला नहीं होता, कोई मेरे साथ रहता है जो मेरी बाते सुनता है बस जवाब नहीं दे पाता. मैंने पूछा कौन है वह, तो बोला,  “मेरा मन” उसके साथ मैं खूब बातें करता हूँ.

हल्की सर्दी में एक बार उसे पूरी बांह की कमीज पहना दी तो बोला कुछ अच्छा नहीं लग रहा है, शायद उसे गर्मी लग रही थी, लेकिन थोड़ी ही देर में वह खुश हो गया. बच्चे हर वक्त कैसे खिले खिले रह लेते हैं .... तभी तो वे बच्चे हैं....एक बार सर्दियों की शुरुआत थी, आकाश पर बादल थे, स्वेटर पहनाने के लिए कहने लगा, तर्क दिया, क्या पता मौसम बिगड जाये.

मैंने जब उसके लिए फलालेन की नाईट ड्रेस सिल कर दी, पूरा दिन लग गया था. उसका चेहरा खिल गया, कहने लगा, आप मुझे हमेशा खुद सिल कर कपड़े दीजियेगा. मुझे व्यायाम करते देख उसने भी सीख लिया था, और लिखता देख खुद भी डायरी लेकर बैठ जाता. स्कूल के सिल्वर जुबली उत्सव में भी उसे भाग लेने का मौका मिला था, खरगोश की ड्रेस में उसकी तस्वीर आज भी हमारे पास है.

बातें तो कितनी हैं, हर माँ के मन में अपने बच्चे की बातों का एक खजाना होता है. उसके जीवन में स्कूल की कितनी बड़ी भूमिका होती है इसे माँ ही जानती है, जब हर रोज वह उसकी कापियां देखती है, उसे नया पाठ सीखते हुए देखती है, उसका मन टीचर के लिए और स्कूल के लिए कृतज्ञता से भर जाता है. जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते उनका जीवन एक बहुत बड़ी संपदा से वंचित रह जाता है, ज्ञान की संपदा जिसके जैसा इस जगत में कुछ भी नहीं. मेरी हार्दिक कामना है कि टाइनी टॉटस् स्कूल सदा इसी तरह नन्हे-मुन्नों के जीवन में रोशनी बिखेरता रहे.