मिलन अधूरा उसे न भाए
जन्मों की मृदु प्रीत पुरानी
कुछ भूली सी अनजानी कुछ,
उस प्रियतम को जरा पुकारो
दौड़ा आता हर पुकार पर !
निज सुख खातिर चाह उठी तो
मिलन नहीं वह केवल है भ्रम,
अहंकार उर शेष रहा तो
कहाँ रहे वैरागी प्रियतम !
उसे चाहता मन वैसे यदि
जैसे जग का हर सुख चाहे,
वह तो पूरा ही मिलता है
मिलन अधूरा उसे न भाए !
मन अंतर चरणों पर अर्पित
बुद्धि इसी पर होती गर्वित,
अहंकार भी चढ़ा प्रेम का
दूरी कभी न होती खंडित !
सब विस्मृत बस सुमिरन उसका
वही-वही बस रह जाए जब,
उससे पूरा मिलन घटेगा
है यही प्रीत का परम सबब !