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गुरुवार, अक्टूबर 1

मिलन अधूरा उसे न भाए

मिलन अधूरा उसे न भाए

जन्मों की मृदु प्रीत पुरानी 

कुछ भूली सी अनजानी कुछ, 

उस प्रियतम को जरा पुकारो  

 दौड़ा आता हर पुकार पर !


निज सुख खातिर चाह उठी तो  

मिलन नहीं वह  केवल  है भ्रम,

अहंकार उर  शेष रहा तो 

कहाँ  रहे वैरागी प्रियतम !


उसे चाहता मन वैसे यदि  

जैसे  जग का हर सुख चाहे, 

वह तो पूरा ही मिलता है 

मिलन अधूरा उसे न भाए !


मन अंतर  चरणों पर अर्पित 

बुद्धि इसी पर होती गर्वित, 

अहंकार भी चढ़ा प्रेम का 

दूरी कभी न होती खंडित !


सब विस्मृत बस सुमिरन उसका 

वही-वही बस रह जाए जब, 

उससे पूरा मिलन घटेगा 

है यही प्रीत का परम सबब !