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मंगलवार, जून 9

सपनों का संसार

सपनों का संसार 



 वृद्ध हो जाता है इंसान

पर जलती रहती है 

कामना की आग 

वैराग्य नहीं सधता 

अब वृद्ध जनों को 

यात्रा जगत की चलती रहती है 

जहाँ उम्र के अनुसार ही व्यवहार होता है 

उसी परिपक्व बुद्धि में प्यार होता है !

 

चावल पक गये हैं 

फिर भी आग नीचे जल रही है 

सोचने वाली बात है 

या तो जलेंगे या अधिक गल जाएँगे !


बोध हो गया है 

पर चलती रहती है साधना 

संतोष नहीं होता 

साधकों को 

खोज ईश्वर की चलती रहती है 

जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है 

उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है !




शनिवार, अप्रैल 18

कितनी बार धरा पर आये


कितनी बार धरा पर आये

योग वशिष्ठ पर आधारित 

इस ब्रह्मांड में परम अनंत, एक बस रहा जानें इसको

राम ने छोटी सी आयु में, पहचाना इसी असलियत को !


मुक्त हुए थे अपने भीतर, राम स्वयं ही चिंतन करके 

गुरु वशिष्ठ ने ज्ञान दिया था, परम मोक्ष की व्याख्या करके ! 


जैसे किसी भी मरुभूमि में, कोई फसल नहीं उग सकती, 

ज्ञेय तत्व भी वहाँ न होता, जहाँ वैराग्य आग न जलती !


 प्राप्त हुए विश्रांति को राम, शोभा उनकी बहुत निखरती, 

ज्ञेय वस्तु मन में झलकेगी, जैसे दर्पण में छवि बनती ! 


जीव की बुद्धि में बढ़ता, जो हृदयकाश में कल्पित होता, 

बाद विनाश के परलोक की, जीव सदैव कल्पना करता !


पाँच भूत आदि सभी मिथ्या, किंतु उन्हें मन सत्य मानता, 

  महासागर यह अज्ञान का, अंतहीन प्रतीत है होता ! 


न जाने किस अनंत काल से, धार समय की बहती जाती, 

सृष्टि हुई, फिर प्रलय घटा है, बार-बार यही सृष्टि होती !


कितनी बार धरा पर आये, कितनी बार हँसे रोये हैं, 

जिसका यह अज्ञान मिटा है, उसने तृप्ति बीज बोए हैं !


सागर चाहे शांत हुआ हो, या उसमें तूफ़ान उठ रहे, 

दोनों में जल तो जल रहता, उसमें कोई भेद कब रहे?


देह सहित या देह बिना हो, अंतर एक जीव का रहता, 

हवा बह रही या प्रशांत हो, नाम उसका वायु ही रहता !


 विश्व में अनथक पुरुषार्थ से, प्राप्त हुआ करता है कुछ भी, 

मनसा, वाचा और कर्मणा, चाहोगे दृढ़ता से जो भी !


 क्या नहीं मिलता अभ्यास से, उद्योग सदा करना होगा 

शास्त्र वचनों के अनुसार ही, जीवन में श्रम करना होगा !

 

सोमवार, अप्रैल 30

बुद्ध का निर्वाण


बुद्ध का निर्वाण


एक बार देख मृत देह
हो गया था बुद्ध को वैराग्य अपार
हजार मौतें नित्य देख हम
बढ़ा रहे सुविधाओं के अंबार
जरा-रोग ग्रस्त देहों ने उन्हें
कर दिया दूर भोग-विलास से
हम विंडो शॉपिंग के भी बहाने हैं ढूँढ़ते
बढ़ती जा रही है दरार आज
 धनी और निर्धनों के मध्य
जितनी बढ़ती है संख्या आलीशान महलों की
 बढ़ जातीं उसी अनुपात से
शहर में झुग्गी-झोपड़ियाँ भी !

राजा जब बन जाता था परिव्राजक
तो खुल जाते भंडार भी वणिकों के
आम जनता के लिए
पर जहाँ शासक बैठा हो बना अट्टालिकाएं
वहाँ बटोरने लगते हैं व्यापारीगण अपनी तिजोरियां
कुछ भी नहीं कह पाता राजा
सिवाय आँख मूंद लेने के...

ली थी वन की राह बुद्ध ने
मात्र अपने निर्वाण के लिए ?
नहीं, मंशा थी कुछ और
नहीं है धन ही सब कुछ दुनिया में
दान का महत्व सिखाने हित
वे बन बैठे थे स्वयं दानी
सेवा का उपदेश ही नहीं दिया
वर्षों तक विहार किया
हम जो देखना ही भुला बैठे हैं गावों की ओर
खत्म कर रहे हैं वनों को
होकर दूर बुद्ध की शिक्षाओं से
एक बार फिर से वैराग्य की अलख तो जगानी ही होगी
भोगी बने मनों को योग की सच्ची राह दिखानी होगी
तभी मनेगी सच्ची बुद्ध पूर्णिमा !