मंगलवार, जून 9

सपनों का संसार

सपनों का संसार 



 वृद्ध हो जाता है इंसान

पर जलती रहती है 

कामना की आग 

वैराग्य नहीं सधता 

अब वृद्ध जनों को 

यात्रा जगत की चलती रहती है 

जहाँ उम्र के अनुसार ही व्यवहार होता है 

उसी परिपक्व बुद्धि में प्यार होता है !

 

चावल पक गये हैं 

फिर भी आग नीचे जल रही है 

सोचने वाली बात है 

या तो जलेंगे या अधिक गल जाएँगे !


बोध हो गया है 

पर चलती रहती है साधना 

संतोष नहीं होता 

साधकों को 

खोज ईश्वर की चलती रहती है 

जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है 

उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है !




16 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सुंदर रचना। नदी पार करके नाव छोड़ देने का बिंब विशेष रूप से आकर्षक है। सच्ची परिपक्वता साधनों से आसक्ति छोड़ने में है, केवल लक्ष्य तक पहुँचने में नहीं।

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    1. वाह!! कविता के मर्म को समझकर त्वरित और सुंदर प्रतिक्रिया हेतु आभार!!

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  2. बहुत ही सुंदर और बौद्धिक सृजन

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 20 जून 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आपका !

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    2. भूल-सुधार:

      आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 21 जून 2026 को लिंक की गयी है....

      http://halchalwith5links.blogspot.in
      पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


      !

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  4. चावल पक गये हैं

    फिर भी आग नीचे जल रही है

    सोचने वाली बात है

    या तो जलेंगे या अधिक गल जाएँगे
    ये बोध हो जाय समय रहते और मोह भी कम हो तो नाव क्यों ही ढोये कोई
    बोध कम और मोह ज्यादा
    यही विडंबना है।

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    1. सही कहा है आपने, मोह ही आदमी को जकड़ लेता है बोध होने नहीं देता, स्वागत व आभार!

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