सपनों का संसार
वृद्ध हो जाता है इंसान
पर जलती रहती है
कामना की आग
वैराग्य नहीं सधता
अब वृद्ध जनों को
यात्रा जगत की चलती रहती है
जहाँ उम्र के अनुसार ही व्यवहार होता है
उसी परिपक्व बुद्धि में प्यार होता है !
चावल पक गये हैं
फिर भी आग नीचे जल रही है
सोचने वाली बात है
या तो जलेंगे या अधिक गल जाएँगे !
बोध हो गया है
पर चलती रहती है साधना
संतोष नहीं होता
साधकों को
खोज ईश्वर की चलती रहती है
जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है
उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है !
अत्यंत सुंदर रचना। नदी पार करके नाव छोड़ देने का बिंब विशेष रूप से आकर्षक है। सच्ची परिपक्वता साधनों से आसक्ति छोड़ने में है, केवल लक्ष्य तक पहुँचने में नहीं।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर और बौद्धिक सृजन
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