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गुरुवार, जुलाई 12

आस एक अनपली रह गयी


आस एक अनपली रह गयी

एक कथा अनकही रह गयी
व्यथा एक अनसुनी रह गयी,
जिसने कहना सुनना चाहा
वाणी उसकी स्वयं सह गयी !

एक प्रश्न था सोया भीतर
एक जश्न भी खोया भीतर,
जिसने उसे जगाना चाहा
निद्रा उसकी स्वयं सो गयी !

एक चेतना व्याकुल करती
एक वेदना आकुल करती,
जिसने उससे बचना चाहा
पीड़ा उसकी सखी हो गयी !

एक प्यास अनबुझी रह गयी
आस एक अनपली रह गयी,
जिसने उसे पोषणा चाहा
अस्मिता भी कहीं खो गयी !

एक पुकार बुलाती थी जो
इक झंकार लुभाती थी जो,
जिसने उससे जुडना चाहा
घुलमिल उससे एक हो गयी !