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गुरुवार, मार्च 18

अनोखा शिल्प

अनोखा शिल्प 

उस दिन एक शिल्प देखा 

नीचे कूल्हे से लेकर दो पैर हैं माटी के 

ऊपर छाती से सिर तक का भाग है 

बीच का पेट गायब है 

ऐसा दृश्य यदि दिखे तो क्या बताता है 

गरीब का पेट पीठ से लग गया है 

इसलिए गायब है 

अमीर का इतना बड़ा हो गया है 

कि लाखों की संपत्ति भी कम पड़ जाती है 

वह बाहर निकल आया है 

और शरीर का भाग नहीं लगता 

यही तो आदमी को कोल्हू की तरह घुमाता है 

रोज भरना होता है उसे 

एक कुएं की तरह है पेट 

जिसमें पेंदी नहीं है 

पेट सीमित हो अपने सही स्थान पर 

तभी पूर्ण हो सकेगा वह शिल्प 

जिसमें कूल्हे के नीचे पैर हैं और 

छाती के ऊपर सिर 

पर मध्य का स्थान खाली है ! 


 

बुधवार, अप्रैल 18

पता है


पता है




पता है

 वही श्वास ले रहा है
हमारे, तुम्हारे, सबके शरीरों द्वारा
वही धड़क रहा है...

अस्तित्त्व भर लेता है खुद को  
जब हम छोड़ते हैं श्वास
और रिक्त होता है हमारे भरने पर...

पता है ?

यह सारा ब्रह्मांड उसकी देह है
वह जीवित है अनंत प्राणियों की देहों से
वही झांकता है कण-कण से
वही जो रेश-रेशे में भीगा है जीवन रस से !

हर कोशिका परमात्मा रूपी स्वर्ण पर जड़ा हीरा है
जिस पर वक्त की परतें जम गयी हैं
वह हरेक को देता है अवसर
जब वह हमारे द्वारा श्वास लेता है !