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शनिवार, अक्टूबर 31

अगम, अगोचर बहे सदा ही

अगम, अगोचर बहे सदा ही

सुर-संगीत की तरणि बहती

है अजस्र वह धार परम की,

निशदिन कोई यज्ञ चल रहा

अगम, अगोचर बहे सदा ही !

 

भीगे, डूबे, उतराए उर

पोर-पोर हो सिक्त देह का,

सुन सकते तो धरो कान अब

स्वाद चखो फिर मुक्त नेह का !

 

चुक जाती वह धार नहीं यह

इक अखंड. अनंत सलिला है,

युगों-युगों से तट पर जिसके

करुणा प्रीत बही अनिला है !

 

इसी घाट पर गोपी थिरकी

वंशी की भी तान छिड़ी थी,

स्वीकृत राम की शक्ति पूजा

समाधि अंतिम यहीं घटी थी !

 

गोदावरी, नर्मदा, यमुना

नाम भिन्न पर घाट वही है,

लक्ष्य एक एक ही स्रोत है

हर राही का बाट यही है !   

रविवार, अगस्त 23

महाभूत जो महादेव का

महाभूत जो महादेव का

 

कल-कल, छल-छल, सलिला का जल 

अविरल निर्मल  बहता रहता, 

जल जीवन को धारण करता 

भू को सिंचित करता बढ़ता !

 

दिनकर रश्मियों संग वाष्पित 

चंचल अनिल उड़ा ले जाता, 

जल धारा बना पुनः धरा पर 

नदियां नाले पोखर भरता !

 

बादल बन अम्बर में रहता 

पावन शीतल नीर बरसता,

पशु, पादप, कीट, विटज, मानव 

सर्व प्राण की तृषा बुझाता !

 

महाभूत जो महादेव का 

जल तत्व को सभी जन चाहें,

नहीं हो दूषित, व्यर्थ बहे न

जल के देव वरुण को ध्याएँ !

 

सरस बनाता, स्वाद जगाता 

अंगों को रखता कोमलतम, 

जल ना हो तो जल जाए जग  

जल है सत्यम शिवम सुंदरम !