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शनिवार, अक्टूबर 31

अगम, अगोचर बहे सदा ही

अगम, अगोचर बहे सदा ही

सुर-संगीत की तरणि बहती

है अजस्र वह धार परम की,

निशदिन कोई यज्ञ चल रहा

अगम, अगोचर बहे सदा ही !

 

भीगे, डूबे, उतराए उर

पोर-पोर हो सिक्त देह का,

सुन सकते तो धरो कान अब

स्वाद चखो फिर मुक्त नेह का !

 

चुक जाती वह धार नहीं यह

इक अखंड. अनंत सलिला है,

युगों-युगों से तट पर जिसके

करुणा प्रीत बही अनिला है !

 

इसी घाट पर गोपी थिरकी

वंशी की भी तान छिड़ी थी,

स्वीकृत राम की शक्ति पूजा

समाधि अंतिम यहीं घटी थी !

 

गोदावरी, नर्मदा, यमुना

नाम भिन्न पर घाट वही है,

लक्ष्य एक एक ही स्रोत है

हर राही का बाट यही है !   

सोमवार, सितंबर 26

शहंशाहों की रीत निराली


शहंशाहों की रीत निराली

मंदिर और शिवाले छाने, कहाँ-कहाँ नहीं तुझे पुकारा
चढ़ी चढ़ाई, स्वेद बहाया, मिला न किन्तु कोई किनारा ! 

बना रहा तू दूर ही सदा, अलख, अगाध, अगम, अगोचर
भीतर का सूनापन बोझिल, ले जाता था कहीं डुबोकर ! 

कृत्य के बदले जो भी मिलता, तभी अचानक स्मृति आयी
कीमत उससे कम ही रखता, यह अनुपम दी सीख सुनाई !

जो मिल जाये अपने बल से, मूल्य कहाँ उसका कुछ होगा ?
कृत्य बड़ा होगा जिस रब से, पाकर उसको भी क्या होगा ? 

प्रेम से ही मिलता वह प्यारा, सदा बरसती निर्मल धारा,
चाहने वाला जब हट जाये, तत्क्षण बरसे प्रीत फुहारा ! 

वह तो हर पल आना चाहे, कोई मिले न जिसे सराहे,
आकाक्षाँ चहुँ ओर भरी है, किससे अपनी प्रीत निबाहे ! 

इच्छाओं से हों जब खाली, तभी समाएगा वनमाली,
स्वयं से स्वयं ही मिल सकता, शहंशाहों की रीत निराली !