तुम हो
तुम हो, तभी तो
फूल खिलते हैं
मौसम बहारों के
लौट आते
तितलियाँ मंडराती हैं और
कूजती है कोकिल अमराई में
सुना ना तुमने !
तुम हो, तभी तो
दूर कोई सितारा
टूट कर चमक दिखाता है
पपीहा राग सुनाता
प्रपात खिलखिलाता है
एक नज़र भर देखा
बादल बरस गया झूम कर
एक आवाज़ भर दी थी
सागर में लहरें उठीं
लिया चाँदनी को मुट्ठी में भर
तुम हो, तभी तो
जीवन में नया अर्थ खिलता है
तुम्हारे संग साथ से
यह जग
हर रोज़ नया होकर मिलता है !