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सोमवार, जून 19

तृषित उर की मालती है


तृषित उर की मालती है

खिल न पाया कमल दिल का
यही पीड़ा सालती है,
इक तंद्रालस ने घेरा
बात कल पर टालती है !

जगत केवल इक बहाना
एक अवसर, रास्ता इक,
खोज खुद की चल रही है
तृषित उर की मालती है !

साज भी है उँगलियाँ भी
मृदु रागिनी भी बज रही,
श्रवण लेकिन सुन न पाते
 चेतना धुन पालती है !

नीलवर्णी शुभ्र नभ पर
डोलते हैं मेघ सुंदर,
इस व्यूह में खो गया मन
पाश माया डालती है !

चले मीलों दूर फिर भी
मंजिलों से रहते सदा,
नींद लोरी दे सुलाए
सोमरस जो ढालती है !