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शनिवार, दिसंबर 21

अपने में

अपने में 


क्या है 

जिसे मानव खोज रहा है 

धरती क्या कम थी 

अब  ख़ाक  छानने लगा है 

अन्य ग्रहों की भी

बस्तियाँ तक बसाने की सोच रहा है 

क्या पाएगा 

सागर की अतल गहराई में 

या अंतरिक्ष की असीम ऊँचाई में 

क्या है जो उसे 

अपने में नहीं मिल सकता 

सुना है 

 तपस्या करते थे ऋषिगण

और सारा हाल जान लेते थे

 एक जगह बैठे-बैठे 

कहते हैं, 

सब कुछ तो मन में ही है 

मन की गहराई में 

पहले-पहले शोर सुनायी देता है 

फिर संगीत 

उसके बाद अंतहीन सन्नाटा 

फिर भी बढ़ते रहो आगे तो 

भेद खुल जाते हैं 

कोई न कोई देवगण 

राह में मिल जाते हैं 

तृप्त हो जाता होगा मन 

थम जाती होगी सारी खोज 

जो जब चाहा हाज़िर हो जाता होगा 

 भर जाता होगा

 एक मधुर संतोष भीतर 

नयन मुस्काते होंगे 

अधर गाते होंगे 

थिरकते होंगे कदम 

फूल बिखरते होंगे हर तरफ़ 

 नींद आती होगी चैन की

स्वर्ग के आते होंगे 

शायद स्वप्न भी !




बुधवार, मार्च 23

तेरी निष्ठुर करुणा भी

तेरी निष्ठुर करुणा भी 


कामना की अगन भीषण
जल रहा दिन-रात अंतर,
हृदय अकुलाया भटकता 
शोक से व्याकुल हुआ उर  !

तू दृढ़ अंकुश बन आया 
 ताप से मुझको बचाने, 
तेरी निष्ठुर करुणा भी 
बसी जीवन औ' मरण में !

दिए तन-मन प्राण,वसुधा   
 नील अम्बर बिना माँगे, 
तृप्त उर कुछ भी न चाहे 
मिटे लालसा शुभ जागे  !

कभी थक अलसाए नैन 
कभी अधजगा सा  चलता, 
एक खोज में लगा हुआ  
तेरे पथ  बढ़ता जाता !

लिए ओट तू छिप जाता 
राज यह मैंने जाना , 
पूर्व मिलन से योग्य बनूँ 
मक़सद तेरा पहचाना !


(गीतांजलि से प्रेरित पंक्तियाँ)

सोमवार, जून 19

तृषित उर की मालती है


तृषित उर की मालती है

खिल न पाया कमल दिल का
यही पीड़ा सालती है,
इक तंद्रालस ने घेरा
बात कल पर टालती है !

जगत केवल इक बहाना
एक अवसर, रास्ता इक,
खोज खुद की चल रही है
तृषित उर की मालती है !

साज भी है उँगलियाँ भी
मृदु रागिनी भी बज रही,
श्रवण लेकिन सुन न पाते
 चेतना धुन पालती है !

नीलवर्णी शुभ्र नभ पर
डोलते हैं मेघ सुंदर,
इस व्यूह में खो गया मन
पाश माया डालती है !

चले मीलों दूर फिर भी
मंजिलों से रहते सदा,
नींद लोरी दे सुलाए
सोमरस जो ढालती है !

सोमवार, मार्च 6

एक बीज बोया अंतर में


एक बीज बोया अंतर में


 ऊपर कितना ही साधा हो 
एक खोज भीतर चलती है, 
नहीं यहाँ विश्राम किसी को 
सदा वही पथ पर रखती है !

किन्तु अनोखे राहीगर हम 
हर पड़ाव पर खेमे गाड़े,
जैसे मिल ही गयी हो मंजिल
हुए बेखबर खुद से हारे !

जाग रहा है भीतर कोई 
रहे ताकता पल-पल जैसे,
बाहर ही बाहर हम तकते 
मिलन घटे फिर उससे कैसे !

है अनंत धैर्यशाली वह 
किन्तु डसे अधीरता मन को,
प्रीत पगा वह सहज डोलता 
मुरझाया उर तपन सहे जो !

श्वासों की अलख डोरी सा 
मिल सकता पर नहीं मिला है 
एक बीज बोया अंतर में 
खिल सकता पर नहीं खिला है !



रविवार, मार्च 18

जहाँ शून्य ही व्याप रहा था


जहाँ शून्य ही व्याप रहा था

एक खोज कबसे चलती है,
जिस पर जीवन वार दिया था
आपाधापी अब खलती है !

जन्मों से यह खेल चल रहा,
एक त्रिकोण सदा बन जाता
अंतर्मन को यूँही छल रहा !

पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो गए,
कब तक बंधन रहे अटूट
जहाँ प्रेम के अर्थ खो गए !

शब्दों का आकर्षण त्यागा,
कब तक कैद रहेगा उनमें
आखिर मन का पंछी जागा !

जंजीरें स्वयं ही गढ़ लीं थीं,
जहाँ शून्य ही व्याप रहा था
वहाँ व्यथाएं क्यों पढ़ लीं थीं !

खुद को ही लिखते पढ़ते हैं,
दुनिया भर के शास्त्र बांच लें
नित निज के नियम गढ़ते है !