स्वप्न और हकीकत
स्वप्न देखा है मानव ने
न जाने कितनी-कितनी बार
लायेगा चिर स्थायी शांति
इक दिन वह
स्वर्ग से धरा पर उतार
चैन की श्वास लेंगे जब जन
बहेगी प्रीत की बयार..
नहीं चलेगा, मौत का सामान
बेचने वालों का कारोबार
चाहता रहा है यही दिल उसका
देता रहा है यही पुकार
खत्म होगा वैर, साथ
होड़ भी हथियारों की
सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर
नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए
न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल
विजय होगी सौहार्द की
जीतेंगे ज्ञान और बल !
बनेगा नव समाज श्रम से
नहीं होगा अभाव न भूखा कोई
खिलेंगी सभी प्रतिभाएं
नहीं खो जाएँगी अभावों के
मरुथल में
स्वप्न देखा है मानव ने
यह हजारों बार
पर टूट जाते हैं स्वप्न और हकीकत
चेहरा दिखाती है कर चीत्कार
फिर भी...तो
चलता ही रहता है
क्या नहीं ? जीवन हर बार
खोलने नई-नई सम्भावनाओं का द्वार !