हिंसा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंसा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, मार्च 14

टूट जाते हैं स्वप्न

टूट जाते हैं स्वप्न

स्वप्न देखा है मानव ने

 न जाने कितनी-कितनी बार

लायेगा चिर स्थायी शांति

इक दिन वह

स्वर्ग से धरा पर उतार

चैन की श्वास लेंगे जब जन

 बहेगी प्रीत की बयार.. 

नहीं चलेगा, मौत का सामान

बेचने वालों का कारोबार

चाहता रहा है यही दिल उसका

 देता रहा है यही पुकार

खत्म होगा वैर, साथ

होड़ भी हथियारों की

 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर

नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए

न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल

विजय होगी सौहार्द की 

जीतेंगे ज्ञान और बल !

बनेगा नव समाज श्रम से

नहीं होगा अभाव न भूखा कोई

खिलेंगी सभी प्रतिभाएं

 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में

स्वप्न देखा है मानव ने

यह हजारों बार

पर टूट जाते हैं स्वप्न

और हकीकत

बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है 

मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है ! 


सोमवार, जुलाई 15

मानवता का धर्म

मानवता का धर्म


दिल में एक हूक सी उठती है 

जब सड़कों पर आगज़नी 

देखने को मिलती है 

फूँक दिये जाते हैं लाखों के वाहन 

भारत की यह पावन भूमि 

 निर्दोषों के खून से रंग जाती है !


काँप उठता है दिल जब 

टीवी पर दिखाए जाते हैं 

बाढ़ में फँसे निरीह जन 

जिनके घरों में घुस गया है पानी 

बेबस हैं छतों पर लेने को शरण !


आक्रोश से भर उठता है दिल 

जब आतंकवादी निशाना बना देते हैं 

जवानों को आये दिन 

चंद पैसों की ख़ातिर 

सत्ता की ताक़त में मदहोश सरकारें 

वोट की ख़ातिर बर्दाश्त करती हैं 

हिंसा और अन्याय 

अपने ही नागरिकों पर !


दिल खून के आंसू रोता है 

देखकर आदर्शों की हार 

और धन की जीत चुनावों में 

जब रेवड़ी बाँटने वाले नेताओं की 

होती है चाँदी 

स्वच्छ भारत के नाम पर 

सड़कों के किनारे बढ़ते हुए कूड़े के ढेर !


हर तरफ़ मची है कैसी अफ़रातफ़री 

जैसे फिर से दिशाहीन हो गया है 

देश का युवा 

क्यों छाये हैं निराशा के बादल 

क्याँ गमगीन है आज दिल इतना !


चलें ! हम निकलें सड़कों पर 

छोड़कर घर की सुरक्षा और आराम 

जगायें सोये हुए लोगों का ज़मीर 

फैलायें मानवता के धर्म का पैग़ाम 

जो सनातन है, सत्य है और शाश्वत है 

जो ढक जाये भले ऊपर-ऊपर 

भीतर पूर्णत: जागृत है !


शनिवार, जुलाई 29

मन का कैनवास

मन का कैनवास 


सिकुड़ जाता है मन का चोला 

तो घुटने लगती हैं श्वासें 

और जन्म होता है हिंसा का 

शायद आत्मरक्षा में 

मन घायल करता है 

पहले स्वयं को 

फिर अपनों को 

यदि शांत न हो पीड़ा तो 

समाज और  

संसार को, 

युद्धों का जन्म ऐसे ही होता है 

सिकुड़ी संकुचित चेतना का परिणाम है क्रोध !

जब फैल जाता है मन का कैनवास 

जिसमें समा जाते हैं धरती और आकाश 

अपने-पराये सब हो अनुकूल 

प्राणी, पशु, पौधे, चट्टान, फूल 

तो प्रेम का जन्म होता है 

प्रेम मुक्त करता है 

सहलाता है 

भर जाता है आनंद से 

सारी कायनात को 

तो किसको चुनेंगे 

संकुचन या विस्तार 

हिंसा या प्यार ! 


बुधवार, अप्रैल 22

पालघर

पालघर 

जो घर है और जो पालता है 
वहाँ नरभक्षी घुस आये हैं 
जिनसे भयभीत हैं जनता के रक्षक भी 
सुना है 
रावण ऋषि-मुनियों को मरवाया करता था 
निरीह साधुओं पर यह घिनौना अत्याचार 
शायद लौट आयी है 
वही अपसंस्कृति और आसुरी अनाचार 
जहाँ मनों में सद्भाव शेष न रहा हो 
जहाँ साधुओं के प्रति अनास्था का विष घोला जा रहा हो 
जहां मानवता की शिक्षा भी लुप्त हो गयी 
वह समाज कैसे सफल हो सकता है 
गांव जो आश्रय देते थे कभी 
अजनबियों को 
शक की निगाह से देखने लगे हैं अपनों को 
जहाँ जलाया जा रहा हो 
बापू के सपनों को 
जानना होगा उस भीड़ का अभिप्राय 
जो लॉक डाउन में आधी रात को 
बाहर निकल आ जाती है 
केवल संदेह की बिना पर जानवरों की तरह 
घात लगाती है 
किसने भरा
 यह अविश्वास उनके मनों में 
क्यों घेर लिया निरीह यात्रियों को 
क्रोध से अंधे हुए इन आदिवासी जनों ने 
रक्षक भी बेबस हुए देखते रहे 
पालघर में हिंसा के खेल चलते रहे !

गुरुवार, जुलाई 24

करुण पुकार इस धरा की

करुण पुकार इस धरा की


इजराइल में आग उगलती हैं तोपें
फिलिस्तीन जलता है
युक्रेन में शहीद होते हैं निर्दोष नागरिक
रूस भी पिघलता है
युद्ध की ज्वाला खा रही है इराक को
सीरिया का जख्म अभी है हरा
ए खुदा ! मारी गयी है मत तेरे बन्दों की
हिरोशिमा-नागासाकी से जी उनका नहीं भरा
लाचार है यूएनओ लाचार है अमेरिका और चीन भी
भारत इस हिंसा को देखता मौन है
फिर ढूँढ़ता हल इसका कौन है ?
करुण पुकार इस धरा की
नहीं जाती किसी के कानों में  
डूबी जाती है अन्याय व अत्याचार के भार से
जहाँ अमृत बरस सकता हो हर क्षण
वहाँ जहर फैला है अज्ञान का
दिलों और देशों को जो एक नहीं होने देता
भुलाकर भेद धर्म और जाति का
इन्सानियत का पुष्प खिलने नहीं देता
तब क्या अर्थ रह जाता है
धर्म के नाम पर होते इस संघर्ष का
इक्कीसवीं सदी की यह कैसी मानसिकता  
अंधकार मय युग की जहाँ छायी कालिमा  
कबीलों की जगह अब कौमें हैं लड़ती
विकास के नाम पर सभ्यता सिर धुनती  
किस सच की बात कर रहे विद्वान् विश्वविद्यालयों में
संदेश मिल रहे कैसे नई नस्ल को वाचनालयों में
कैसे मन्दिरों और मस्जिदों का वर्चस्व रहेगा  
जब नामलेवा इन्सान का हृदय ही
हिंसा से कठोर होकर न बचेगा ?




बुधवार, सितंबर 11

स्वप्न और हकीकत

स्वप्न और हकीकत



स्वप्न देखा है मानव ने
 न जाने कितनी-कितनी बार
लायेगा चिर स्थायी शांति
इक दिन वह
स्वर्ग से धरा पर उतार
चैन की श्वास लेंगे जब जन
 बहेगी प्रीत की बयार.. 
नहीं चलेगा, मौत का सामान
बेचने वालों का कारोबार
चाहता रहा है यही दिल उसका
 देता रहा है यही पुकार
खत्म होगा वैर, साथ
होड़ भी हथियारों की
 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर
नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए
न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल
विजय होगी सौहार्द की 
जीतेंगे ज्ञान और बल !
बनेगा नव समाज श्रम से
नहीं होगा अभाव न भूखा कोई
खिलेंगी सभी प्रतिभाएं
 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में
स्वप्न देखा है मानव ने
यह हजारों बार
पर टूट जाते हैं स्वप्न और हकीकत
 चेहरा दिखाती है कर चीत्कार
फिर भी...तो
 चलता ही रहता है
 क्या नहीं ? जीवन हर बार
खोलने नई-नई सम्भावनाओं का द्वार !


गुरुवार, अगस्त 11

ऐसा कोई क्यों करेगा


लन्दन के दंगों को किसी तरह रोका गया तो हिंसा की आग ब्रिटेन के दूसरे शहरों में फ़ैल रही है. ईश्वर की बनाई इस सुंदर दुनिया के किसी भी कोने में घटी हिंसा की वारदातें एक स्वच्छ सतह पर काले धब्बे की तरह चुभती हैं और भीतर कई सवालों का जन्म होता है....


ऐसा कोई क्यों करेगा 

वहशी, कुछ दरिंदे, पागल
हाथ में मौत का सामान लिए
दाखिल होते हैं लोगों के हुजूम में
और देखते-देखते भडक उठते हैं शोले
आतंक फ़ैल जाता है,
कुचल दिए जाते हैं हंसते-खेलते जीवन...
अमानवीय कृत्य करने वाले वे भी
जन्मे तो थे इसी धरती पर
खेले थे वे भी किसी के आंगन में
हो सकता है न मिली हो उन्हें माँ की गोद
या स्नेह पिता का
कुंवारी माँ की सन्तान हों
या अलग हो गए हों उनके जनक
उनके जन्म के पूर्व
या फिर पले हों वे छोटी सी आयु से
अकेले सड़कों पर
या बंद घर में, कम्प्यूटर पर गेम खेलते
जहां खून के छींटे पड़ने पर मिलते हैं पॉईंटस्
या छोड़ दिए गए हों
माता-पिता के काम पर जाने के बाद अकेले
टीवी पर हिंसा के दृश्य देख-देख हुए हों बड़े
गोली चलाना सीखा हो शायद पहली बार
 किसी खिलौना बंदूक से
जो माँ-बाप ले आए हों उनके दूसरे जन्म दिन पर
और फिर हर वर्ष एक नई पिस्तौल
पूर्व से अधिक विकसित
हिंसा की ट्रेनिंग ले ली हो उन्होंने
गली-मोहल्लों में
बम बनाना, आगजनी सीखी हो दादा लोगों के साये में
या फिर सताया गया हो उनका कोई परिचित (निर्दोष)
पुलिस के हाथों....
वे देखना चाहते हों असली आग की लपटें
लोगों के चेहरे पर भय
स्क्रीन पर होते दृश्य अब उत्तेजित न कर पाते हों उन्हें
या फिर याद आए हों उन्हें हिंसा के वे कारनामे
जिन्हें करके अमर हो गए कुछ सिरफिरे
कैसे विकृत हुआ होगा उनके मस्तिष्क
जिनमे हिंसा का जहर भरा गया होगा धीरे-धीरे
मरती गयी होगी उनकी आत्मा
दफन हो गयी होगी उस जगह
जहां से कोई आवाज नहीं आती...
नहीं तो कोई ऐसा क्यों करेगा...?