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सोमवार, मई 23

बन जाओ गर राग प्रेम का

बन जाओ गर राग प्रेम का 


खुद से दूर हुआ है जो भी 

तुझसे दूर रहा करता है, 

प्रेमी ही यदि खोया हो तो 

प्रियतम कहाँ मिला करता है !


बजा रहा है कान्ह बाँसुरी 

गोपी जन को याद दिलाने, 

बन जाओ गर राग प्रेम का 

सुर उसका गूँजा करता है !


गुरुओं की बातें सच्ची हैं 

कोई हमसा भीतर रहता, 

हरदम कोई आँख गड़ाए 

सुबहो-शाम तका करता है !


जिससे ये श्वासें चलती हैं 

उससे ही अनजान रहा मन, 

उससे आँखें चार हुईँ कब 

सारा जग घूमा करता है !


नित नूतन है कान्ह सलोना 

बहता जैसे पावन पानी, 

हर लेता है पीर हिया की 

जो भी ग्वाल सखा बनता है !