बैसाखी की आत्मा
फसल पक गई जब खेतों में
बगिया में रस घट भर आये,
मधुर पताशों की लज्जत का
सुमिरन अंतर में हो आये !
खालिस शिष्य बनाये इस दिन
पंथ खालसा तभी कहाया,
अपने धर्म की रक्षा हेतु
हाथों में कृपाण उठवाया !
मिटा दिये थे भेदभाव सब
अनंतपुर ने दी थी साखी,
तलवार बनी, ढाल भीरु की
बन प्रेरक आयी गुरु वाणी !
लेकर पाँच विकार के पार
अन्याय का विरोध सिखाता,
बैसाखी का गीत-संगीत
गुरु गोविंद की सुध दिलाता !

बैसाखी की शुभकामनाओं सहित इस सुंदर कविता हेतु अभिनंदन आपका
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार आपका!
हटाएंशुभकामनाएं
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंवाह्ह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १४ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार श्वेता जी!
हटाएंye baisakhi par meri favourite rachnaaoon mein se hai!!! Thank you so much!
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लगा यह जानकर, स्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर समयानुकूल रचना
जवाब देंहटाएंआभार
स्वागत व आभार!
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