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शुक्रवार, अप्रैल 3

नयी भोर की आस जग रही


नयी भोर की आस जग रही

दिल में कैसी फांस गड़ रही 
अंतर का जो चैन हर रही, 
अब अतीत का गट्ठर फेंको 
नयी भोर की आस जग रही !

मानवता फिर सिसक रही है 
भरे नहीं थे ज़ख़्म पुराने, 
किंतु निराश न होकर जग में 
 गाये कोकिल नये तराने !

अब भी दिशा दिखाते तारे 
सागर की लहरें गाती हैं, 
उपवन पर गोले बरसाओ 
कलियाँ फिर भी खिल जाती हैं !

जाने कितने ही युद्धों की 
भीषणता से पार हुए हम, 
जीवन एक अकाट्य सत्य है 
उससे क्यूँ बेज़ार हुए हम !

सत्यम् शुवम् सुंदरम् वाले 
गीत सदा अधरों पर आयें, 
लिप्सा का दानव जो जागा 
सच की आँधी उसे मिटाए !


 

सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !



रविवार, जनवरी 11

नये साल की कविता

नये वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 


नये साल में निर्दोष न मारे जायें 

 हो नहीं अन्याय का शिकार भी कोई, 

बंद हों युद्ध, करें  निर्माण देशों का 

हो हितैषी ‘ए आइ’ न छल करे कोई !


मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से 

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने, 

दिल की गहराई में झांक सके मानव 

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने !


एक ही लौ, जल रही है हरेक दिल में 

 संग शीतलता के जो उजाला देती, 

नूतन वर्ष  में बने वही पथ प्रदर्शक 

युगों-युगों से जो सदा हौसला देती !


शनिवार, मई 10

जब युद्ध में हो संवाद !




जब युद्ध में हो संवाद


घंटनाद मंदिरों के अब बन जाने दो सिहंनाद,

आज वही युग आया जब युद्ध में हो संवाद !


जाग उठे अब जन-जन ऐसी रणभेरी बजने दो, 

क्रांति बिगुल बजाए ऐसा हर मस्तक सजने दो ! 


विप्लव आज अवश्यम्भावी युग बीते हम सोये 

कैद हुए नित पीड़ा में पाया क्या बस रोये ? 


भुला दिये कौशल का सम्मान पुनः करना है, 

भारतीयों को जाग के भीतर स्वयं अभय भरना है ! 


भीतर पाकर परम शक्तियाँ जग में उसे दिखाएं, 

आत्म शांति से उपजे कलरव क्रांति गीत बन जाएँ ! 


कोना कोना गूंज उठे फिर ऐसा रोर मचे, 

उखड़ें सड़ी गली नीतियाँ जम के शोर मचे ! 


बुधवार, मई 7

युद्ध

युद्ध 


छाने लगे युद्ध के बादल 

पर भय नहीं दिल में किसी के

अटूट भरोसा है भारतीय सेना पर 

शौर्य और वीरता के चर्चे सुने 

देखी उनकी दरियादिली 

बन सहायक अन्य देशों के 

शांति सेना में बहादुरी के परचम लहराते 

निश्चिंत है हर भारतीय 

युद्ध सीमा पर लड़ा जाएगा 

भारत को अपना दुश्मन मानता है 

उस पाकिस्तान को 

कड़ा जवाब दिया जाएगा 

  प्रधानमंत्री संयत

देश की योजनाओं को 

करते कार्यान्वित 

रक्षा मंत्री स्थिर 

देते देश को आश्वासन 

विपक्षी प्रश्न पूछ-पूछ 

वातावरण को हल्का बनायें 

यदि कुछ न कहें तो 

कहीं लोग उनको भूल न जायें 

 तंग आ चुकी जनता 

आतंक के आकाओं से 

अब आर-पार की लड़ाई होनी है 

 राह की हर बाधा मिटा 

देश को नई फसल बोनी है !


गुरुवार, दिसंबर 21

भारत का प्रकाश फैलेगा

 भारत का प्रकाश फैलेगा 

युद्धों की ज्वाला में जलता 

विश्व छिपा है अंधकार में,  

 भारत का प्रकाश फैलेगा 

शांति सिखाता हर विचार में ! 


पर्यावरण की धुन जिन्हें है 

राकेट-गोले बम दागते, 

घायल करके धरती का दिल 

मासूमों का रक्त बहाते ! 


 आश्रय में रहे प्रकृति माँ के

मानव का विकास तब संभव,  

बहे अनंत कृपा अनंत की 

जिसकी कृति यह अति सुंदर भव !


 नये वर्ष में जागे विवेक

विध्वंस न हो नव सृजन घटे,

हो उत्कर्ष सदा मूल्यों का 

साहचर्य का उल्लास बढ़े !


शनिवार, जुलाई 29

मन का कैनवास

मन का कैनवास 


सिकुड़ जाता है मन का चोला 

तो घुटने लगती हैं श्वासें 

और जन्म होता है हिंसा का 

शायद आत्मरक्षा में 

मन घायल करता है 

पहले स्वयं को 

फिर अपनों को 

यदि शांत न हो पीड़ा तो 

समाज और  

संसार को, 

युद्धों का जन्म ऐसे ही होता है 

सिकुड़ी संकुचित चेतना का परिणाम है क्रोध !

जब फैल जाता है मन का कैनवास 

जिसमें समा जाते हैं धरती और आकाश 

अपने-पराये सब हो अनुकूल 

प्राणी, पशु, पौधे, चट्टान, फूल 

तो प्रेम का जन्म होता है 

प्रेम मुक्त करता है 

सहलाता है 

भर जाता है आनंद से 

सारी कायनात को 

तो किसको चुनेंगे 

संकुचन या विस्तार 

हिंसा या प्यार ! 


सोमवार, मई 17

आदमी


आदमी 

राहबर आये हजारों इस जहाँ में 
आदमी फिर भी भटकता है यहाँ पर !

बेवजह सी बात पर भौहें चढ़ाता  
राह तकता है भला बन शांति की फिर

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर 
किस्से मुक्ति के सुनाता जोश भर कर  

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं से मांगता 
जाने कितने स्वांग भरता भेष धर कर 

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन 
हर युद्ध करता शांति का नाम लेकर  !

उल्टे-सीधे काम भी सभी हो रहे 
है रात-दिन जब मौत का जारी कहर  !
 

बुधवार, जनवरी 27

दिल्ली

दिल्ली 
देश की राजधानी बनने की 
बड़ी ही भारी कीमत चुकाई है अतीत में भी 
अनेकों बार दिल्ली ने ! 
एक बार फिर सुबह की शांत दिल्ली 
दोपहर को बदल गई 
जैसे एक युद्ध क्षेत्र में ! 
लालकिले पर नृशंसता से चढ़ती हुई भीड़ 
और हथियारों का प्रदर्शन खुलेआम ! 
जैसे कोई दुश्मन सेना चढ़ आयी हो
 निरंकुश बेलगाम !
क्या अपने ही देश में !
राष्ट्रीय पर्व पर  
 शोभा देता है अकल्पनीय यह व्यवहार 
जिसमें नागरिक व पुलिस
 हुए दोनों ही घातक हिंसा के शिकार !  
भारत आगे बढ़ता है तो 
कुछ लोग अनुभव करते हैं हीनता का 
परेड में जिस देश की छवि दिखी 
है वह उन्नति के शिखर पर चढ़ता हुआ  
जिन लोगों ने यह निंदनीय कार्य किया है 
 चाहते हैं भारत की विमल छवि बिगाड़ दें,
ऐसा हो उससे पूर्व  ही 
चलो हम इसे रक्षा कवच बाँध दें ! 

सोमवार, अप्रैल 24

चलों संवारें वसुधा मिलकर



चलों संवारें वसुधा मिलकर 

विश्व युद्ध की भाषा बोले
प्रीत सिखाने आया भारत,
टुकड़ों में जो बांट हँस रहे
उनको याद दिलाता भारत !

एक विश्व है इक ही धरती
एक खुदा है इक ही मानव,
कहीं रक्त रंजित मानवता
कहीं भूख का डसता दानव

विश्व आज दोराहे पर है
द्वेष, वैर की आग सुलगती,
भुला दिए संदेश प्रेम के
पीड़ित आकुल धरा  झुलसती

इसी दौर में मेलजोल  के
पुष्प खिलाने आया भारत,
निज गौरव का मान जिसे है
वही दिलाने आया भारत !

ध्वजा शांति की लहरानी है
विश्व ताकता इसी की ओर,
एक एक भारतवासी को
लानी है सुखमयी वह भोर !

बुधवार, मई 27

कुछ भूली-बिसरी यादें

कुछ भूली-बिसरी यादें

लंबा, छरहरा कद, गेहुँआ रंग, फुर्तीला तन और आवाज में युवाओं का सा जोश. ऐसे हैं माथुर अंकल ! जब भी आंटी के साथ बेटी-दामाद से मिलने असम आते उनसे भेंट होती. यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा था. अपने नाती-नातिन के प्रति उनका अति प्रेमपूर्ण व्यवहार, वृद्धा संगिनी का हाथ पकड़ कर सड़क पार कराना, मेहमानों के आने पर रसोईघर में बेटी का हाथ बंटाना, फिर भी घर में ऐसे रहना जैसे हो ही नहीं, ऐसे जैसे हवा रहती है. अगले दिन वे वापस जाने वाले थे, सो उस शाम जब मिलने गयी तो बातों का क्रम उनके अतीत की ओर मोड़ते हुए कुछ सवाल किये. जवाब में उन्होंने कई रोचक संस्मरण सुनाये.
“आप जानती हैं, उस वक्त पूरे सूबे में एक आईजी हुआ करता था, आज तो एक जिले में ही एक से अधिक होते हैं. यह पंडित नेहरू के युग की बात है. आज बच्चे-बच्चे के पास मोबाइल फोन हैं, उस वक्त यदि कोई वीआईपी आने वाला होता था तो कमिश्नर भी घंटों तक खड़े रहकर प्रतीक्षा करने को विवश थे. काफिला कहाँ तक पहुंचा है, जानने का कोई साधन ही नहीं था. मैंने बीएससी की डिग्री लेने के बाद पुलिस के वायरलेस तकनीकी विभाग में वायरलेस ऑपरेशन अधिकारी के पद पर लखनऊ में कार्य करना शुरू किया. मुरादाबाद में हमें सख्त ट्रेनिंग दी गयी, सुबह पांच बजे उठकर परेड करनी होती थी, राइफल चलाना भी सिखाया गया. उस समय उत्तरप्रदेश के पुलिस प्रमुख एक कर्नल थे, उन्होंने हरिद्वार के कुम्भ मेले में पहली बार वायरलेस सेट का इस्तेमाल किया था. ये सेट अमेरिकी सेना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मुम्बई  में छोड़ गयी थी. भारत सरकार ने इसे राज्यों की पुलिस को ले जाने के लिए कहा तो लखनऊ के जोशीजी इन्हें ले आये. बैटरी से चलने वाले इन उपकरणों को अपनी जरूरत के अनुसार बदल  कर हम काम में लाने लगे.
मैंने पहली बार इनका प्रयोग इलाहबाद के कुम्भ मेले में किया. उस साल वहाँ एक भयानक हादसा हुआ था. वहाँ के स्थानीय निकाय तथा पुलिस ने मेले के लिए काफी प्रबंध किये थे लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था. संगम तक पहुंचने के लिए एक ऊंचा टीला पार करना पड़ता था, जिसे मिट्टी वगैरह डालकर ठीकठाक किया गया था. रात को वर्षा हुई व मुँह अँधेरे स्नानार्थियों की भीड़ आनी शुरू हो गयी. टीले की ऊंचाई पर लोग आराम से पहुंच रहे थे पर उतरते समय फिसलन इतनी ज्यादा हो गयी कि लोग गिरते-पड़ते नीचे पहुंचने लगे. पीछे आने वालों को इसकी खबर नहीं थी, भीड़ बढती जा रही थी, लोग कुचले जा रहे थे. हमने टावर से यह हादसा देखा, वायरलेस सेट का प्रयोग कर जब तक हम लोगों को सचेत कर पाते कई सौ कीमती जानें जा चुकी थीं. कतार में रखे सफेद चादरों में लिपटे शवों का वह दृश्य आज भी कंपा जाता है.”
हम सब भी यह सुनकर सन्न रह गये थे. अंकल थोड़ा प्रकृतिस्थ हुए तो आगे कहने लगे,
“सन् बासठ के चीनी आक्रमण के वक्त मुझे मुरादाबाद भेजा गया, जहाँ से हमारी यूनिट उत्तरकाशी, जोशीमठ तथा आगे गंगोत्री तक गयी. बर्फ गिरने से रास्ते बंद हो गये थे. सेना से भी आगे रहकर दुश्मन के हमले को झेला. वायरलेस सिस्टम के द्वारा ही संदेश भेजना सम्भव हो सका था.”
हम सभी उनकी बातें बड़े आश्चर्य के साथ सुन रहे थे. आगे उन्होंने बताया, “अगले कुछ वर्षों तक मेरी ड्यटी अति विशिष्ट अधिकारियों के साथ लगी. कुछ दिन खुफिया विभाग में काम किया और संचार मंत्रालय में भी. जब कभी वीआइपी आते थे, मिनट-मिनट बड़ा कीमती होता था, उन्हें सुरक्षित लाने के लिए कितनी बार रिहर्सल होती थी. उनके सामने खुर्श्चेव आये, ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा आये और दलाई लामा, राजेन्द्र प्रसाद के साथ भी उनकी ड्यूटी लगी थी. नेहरू जी जब लखनऊ आते तो हिंडन ब्रिज पर काफिला रोककर दिल्ली पुलिस लौट जाती थी. फिर यूपी पुलिस की जिम्मेदारी थी. नेहरू जी का एक रोचक किस्सा उन्होंने बताया, एक बार लोग उनके दर्शनों के इंतजार में खड़े-खड़े थक गये थे, जब वे पहुँचे, उन्होंने गाड़ी रुकवाई और लोगों से मिलने लगे, सारी सुरक्षा धरी रह गयी, किसी ने लड्डू दिया तो उन्होंने खा लिया.
माथुर अंकल के पास और भी मजेदार किस्से थे, कैसे सुल्ताना डाकू को पकड़ने ब्रिटेन से एक कैदी आया था. एक बार वह खुद यूनिट के साथ मान सिंह को पकड़ने गये थे. कहने को तो पुलिस तन्त्र था पर कई तरह के काम उन्होंने किये. माइक, जेनरेटर भी सुधारे. उनके काम से अफसर बहत खुश थे, तरक्की भी मिलती गयी. उन्हें पुलिस पदक भी मिला, पड़ोसी ने अख़बार पढ़ा और उन्हें आकर यह खबर सुनाई. राजभवन में शानदार आयोजन हुआ था.
हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बात कहते समय उनकी आँखें चमक रही थीं, “लखनऊ की पुलिस लाइन में रहते समय सभी मिलजुलकर सब त्यौहार मनाते थे. जफर साहब कीर्तन में शामिल होते थे, ईद व दीवाली सब मिल कर मनाते थे.” शाम काफी हो गयी थी. सब से विदा लेकर हम घर आये तो मन में वह स्मृतियाँ ताजा थीं. आज उन्हें कागज पर उतार दिया है, ताकि कुछ और लोग भी पढ़कर भारत के अतीत से रूबरू हो सकें औत माथुर अंकल जैसे व्यक्तित्व से भी.


गुरुवार, जुलाई 24

करुण पुकार इस धरा की

करुण पुकार इस धरा की


इजराइल में आग उगलती हैं तोपें
फिलिस्तीन जलता है
युक्रेन में शहीद होते हैं निर्दोष नागरिक
रूस भी पिघलता है
युद्ध की ज्वाला खा रही है इराक को
सीरिया का जख्म अभी है हरा
ए खुदा ! मारी गयी है मत तेरे बन्दों की
हिरोशिमा-नागासाकी से जी उनका नहीं भरा
लाचार है यूएनओ लाचार है अमेरिका और चीन भी
भारत इस हिंसा को देखता मौन है
फिर ढूँढ़ता हल इसका कौन है ?
करुण पुकार इस धरा की
नहीं जाती किसी के कानों में  
डूबी जाती है अन्याय व अत्याचार के भार से
जहाँ अमृत बरस सकता हो हर क्षण
वहाँ जहर फैला है अज्ञान का
दिलों और देशों को जो एक नहीं होने देता
भुलाकर भेद धर्म और जाति का
इन्सानियत का पुष्प खिलने नहीं देता
तब क्या अर्थ रह जाता है
धर्म के नाम पर होते इस संघर्ष का
इक्कीसवीं सदी की यह कैसी मानसिकता  
अंधकार मय युग की जहाँ छायी कालिमा  
कबीलों की जगह अब कौमें हैं लड़ती
विकास के नाम पर सभ्यता सिर धुनती  
किस सच की बात कर रहे विद्वान् विश्वविद्यालयों में
संदेश मिल रहे कैसे नई नस्ल को वाचनालयों में
कैसे मन्दिरों और मस्जिदों का वर्चस्व रहेगा  
जब नामलेवा इन्सान का हृदय ही
हिंसा से कठोर होकर न बचेगा ?




मंगलवार, जुलाई 16

अग्नि एक संकल्प की जगे

अग्नि एक संकल्प की जगे




जाना है दूर अति सुदूर
पावों में पड़ी हैं बेड़ियाँ ,
कांटे बिखरे कदम-कदम पर
पुकारतीं किन्तु रण भेरियां !

एक युद्ध लड़ा जाना है
यात्रा इक आमन्त्रण देती,
आरोहण उच्च आकांक्षा का
ज्योति एक निमन्त्रण देती !

एक लक्ष्य साधना है पावन
‘कुछ’ तो अनावृत करना है,
नन्हे-नन्हे स्फुलिंगों से  
मन का अंधकार भरना है !

चमकीले रंगो वाले कुछ
जगत अनोखे कहीं छिपे हैं,
आओ उनको ढूँढ़ निकालें
छाया जिनकी यहीं कहीं है !

 दस्यु छिपे हैं अंधकार में
छिप कर वार किया करते,
निर्मल मन के शीतल जल में
विष की धार भरा करते !

अग्नि एक संकल्प की जगे
ज्योति प्रखर रोशन सब कर दे
एक ऊष्मा अमर प्रेम की
प्रज्ज्वलित कण-कण नभ तक कर दे


सोमवार, अप्रैल 9

हम पहले ही मारे जा चुके हैं....



हम पहले ही मारे जा चुके हैं....

सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ
अस्तित्त्व के गर्भ में....
जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का !

महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है
अब हमारी बारी है...
वहाँ सब कुछ है !
थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को
उपकरण खेल से पूर्व
अब अच्छा या बुरा खेलना निर्भर है उन पर !

वहाँ शब्द हैं अनंत
जिनसे रची जा सकती हैं कवितायें
या लड़े जा सकते हैं युद्ध,

वहाँ बीज हैं
रुप ले सकते हैं जो मोहक फूलों का
 बदल सकते हैं मीठे फलों में
परिणित किया जा सकता है जिन्हें उपवन में
या यूँ ही छोड़ दिया जा सकता है
सड़ने को !

उस महासागर में मोती पड़े हैं
जिन्हें पिरोया जा सकता है
मुक्त माल में
अनजाने में की गयी हमारी कामनाओं की
पूर्ति भी होती है वहाँ से
हम ही चुन लेते हैं कंटक....
जानता ही नहीं जो, उसे जाना कहाँ है
अस्तित्त्व कैसे ले जायेगा उसे और कहाँ ?
जो जानता ही नहीं खेल के नियम
वह खेल में शामिल नहीं हो पायेगा
लीला चल रही है दिन-रात
उसके और उसके अपनों के मध्य
हम पहले ही मारे जा चुके हैं....