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शनिवार, अप्रैल 11

हल्का होकर उड़े गगन में

हल्का होकर उड़े गगन में 


ख़ुदबुद करती रही चेतना 

धक-धक करता रहा हृदय यह,

उठतीं-गिरती रहतीं लहरें 

लिप्सा कभी, कभी छाया भय !


कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में !


जब अतीत के गट्ठर फेंके 

हल्का होकर उड़े गगन में, 

  फैला था दूर तक सेहरा

मीलों तक थे फूल चमन में !


किसे बिठायें, किसे विदा दें 

मानव को ही तय करना है।

दस्यु घूमते अफ़वाहों के 

दिल का द्वार भिड़ा रखना है !


शुक्रवार, अप्रैल 3

नयी भोर की आस जग रही


नयी भोर की आस जग रही

दिल में कैसी फांस गड़ रही 
अंतर का जो चैन हर रही, 
अब अतीत का गट्ठर फेंको 
नयी भोर की आस जग रही !

मानवता फिर सिसक रही है 
भरे नहीं थे ज़ख़्म पुराने, 
किंतु निराश न होकर जग में 
 गाये कोकिल नये तराने !

अब भी दिशा दिखाते तारे 
सागर की लहरें गाती हैं, 
उपवन पर गोले बरसाओ 
कलियाँ फिर भी खिल जाती हैं !

जाने कितने ही युद्धों की 
भीषणता से पार हुए हम, 
जीवन एक अकाट्य सत्य है 
उससे क्यूँ बेज़ार हुए हम !

सत्यम् शुवम् सुंदरम् वाले 
गीत सदा अधरों पर आयें, 
लिप्सा का दानव जो जागा 
सच की आँधी उसे मिटाए !


 

शुक्रवार, सितंबर 19

दुख या प्रेम

दुख या प्रेम 


दुख का अंत कैसे होता है ?

क्या ऐसा कभी हुआ भी है ?

या हो सकता है ?


हाँ, यह संभव है

प्रेम में !

पर इसके लिए

रहना होगा शुद्ध वर्तमान में

जहाँ कोई विचार नहीं 

स्मृति नहीं 

चाह नहीं 

प्रतिरोध नहीं 

भीतर कोई गति नहीं 

वहीं तो प्रेम ‘है’ !


दुख अभाव से उपजता है 

अभाव केवल एक विचार है 

क्योंकि उसका ‘होना’ सदा है 

उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता 

उसमें से कुछ घटाया नहीं जा सकता 

होना और न होना दोनों में 

कोई मेल नहीं !

उनके मध्य नया कुछ भी नहीं 

या तो सब अतीत है

या बस शुद्ध ‘अब’ 

‘होना’ पूर्ण है 

प्रेम के लिए ‘होना’ ज़रूरी है और 

होने के लिए विचार से स्वतंत्रता 

अंततः स्वतंत्रता ही प्रेम है !


शुक्रवार, मई 24

अतीत

अतीत 


बातों बातों में   

छू जाती है जब 

अतीत की कोई बात

मन पीछे हट जाता है तत्क्षण चौंक कर  

अतीत उस पर हावी है 

क्योंकि अधूरा रह गया है  कुछ

जो पूरा होना चाहता है। 

 दबा  है भीतर 

अभिव्यक्त होना चाहता है। 

  नहीं प्रकटेगा जब तक 

 आसपास मंडराता रहेगा भूत की तरह

हजार-हजार तरीकों से चौंकाता रहेगा 

कभी-कभी मन में धूल उठती है 

स्मृतियों, भावनाओं, अनुभवों और आघातों की धूल 

जिनके ज़ख़्म अभी भरे नहीं  हैं।

मन  बस उन्हें भूल गया है

क्योंकि वह भूलना चाहता है। 

दूर धकेलता है  उन घावों को

लेकिन वे वहीं बने रहते हैं 

कभी भर नहीं पाते 

जब तक बाहर लाकर 

उन्हें सहला न दे

आँख भर के देख न ले 

स्वीकारे उन्हें, जैसे कोई स्वीकारता है

 प्रियजन की भूलों को 

तब अतीत घुल जायेगा वर्तमान में !


बुधवार, मई 25

अमी प्रेम का

 अमी प्रेम का 

जब बन जाता है मन 

कोरे कागज सा 

तब उकेर देता है अस्तित्त्व 

उस पर एक ऐसी इबारत 

जो पढ़ी नहीं जाती 

महसूस होती है 

हवा की तरह नामालूम सी 

सर्दियों के सूरज की मानिंद 

नर्म और गर्म 

परों सा हल्का होकर 

उड़ने लगता है 

मन का पंछी 

न ही अतीत का गट्ठर 

न भावी का डर 

अनंत की सुवास भरे 

खिलने लगता है 

 स्मृति इक जंजीर है 

 विकल्प इक आवरण 

रिक्त हुआ जब घट बासी जल से 

तब भर देता है अस्तित्व 

अमी प्रेम का सुमधुर 

एक घूँट पर्याप्त है 

उस रस स्रोत में डूबने के लिए 

कोई जाने या न जाने 

उस के भीतर भी यही 

तलाश है 

चखने की चाह जिसे 

वह जीवन प्रकाश है !


गुरुवार, दिसंबर 23

अभी मिलन घट सकता उससे

अभी मिलन घट सकता उससे 


 ना  अतीत जंगल के उगते  

ना उपवन भावी के जिसमें, 

वर्तमान का पुष्प अनोखा 

खिलता उसी मरूद्यान में !


एक स्वप्न से क्या मिल सकता 

जिससे ज़्यादा ना दे अतीत, 

जाल कल्पना का भी मिथ्या 

भावी के सदा गाता गीत !


एक बोझ का गट्ठर लादे 

कितना कोई चल सकता है, 

यादों का सैलाब डुबाता 

भव सागर कब तर सकता है !


कल की फ़िक्र आज को खोया 

संवरे अब बने कल सुंदर, 

इस पल में हर राज छुपा है 

पहचानें  ! क्यों टालें कल पर !


अभी-अभी इक सरगम फूटी 

अभी अभी बरसा है बादल, 

अभी मिलन घट सकता उससे 

है परे काल से सदा अटल !




मंगलवार, दिसंबर 15

ध्यान में

ध्यान में 
 ज्यों बेदखल कर देता है 
कोई पिता नाकारा संतति को 
अपनी वसीयत से 
कई बार समझाने पर  
राह पर न आना चाहे जो 
वैसे ही नादां मन जब तक नहीं किया जाता बेदखल 
चैन नहीं मिलता पल भर 
अतीत की स्मृतियों को उभारेगा
नए-नए सुझाव और विचार देगा उन्नति के 
पूर्वाग्रहों और धारणाओं से बाँधना चाहेगा 
ऊँच-नीच समझाएगा 
वैसे जैसे पुत्र रोयेगा -गिड़गिड़ायेगा 
 कठोर होना पड़ता है पिता को 
ऐसे ही झटक देना होगा विवेक से 
और स्वयं में पूर्णतया का अनुभव कर
 अपनी ही गरिमा में ठहरना सीखना होगा 
मन तो बच्चा है लाख समझाओ 
वही उसकी फितरत है 
वह बड़ा होना नहीं चाहता !
 

बुधवार, दिसंबर 2

पल-पल है चेतना नई सी

पल-पल है चेतना नई सी


ग्रह - नक्षत्र, धरा,रवि, चाँद 

पादप, पशु, नदिया, चट्टान,  

पवन डोलती तूफ़ां उठते 

सृष्टि पूर्ण मानव अनजान !


बंधी एक नियम, ऋत, क्रम में 

नित नूतन यह पुनर्नवा सी, 

अंतर घिरा अतीत धूम्र से 

पल-पल है चेतना नई सी !


सुख की चाह रहे भरमाती 

पीड़ा के वन में ले जाए, 

जितनी दौड़ लगे कम पड़ती 

भोला मन यह समझ न पाए !


जाने कब यह क्रम छूटेगा 

मन पर छाया भ्रम छूटेगा, 

ब्रह्मांड से एक हुआ फिर 

निज महिमा का बोध जगेगा !

 

शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 

अतीत के अनन्त युग सिमट  आते हैं 
वर्तमान के एक नन्हे से क्षण में 
भविष्य की अनंत धारा भी 
छोटा सा यह पल कितना गहरा है 
साक्षी है जो बीते  बरसों का 
और छिपा है जिसमें भावी का हर स्वप्न 
हर क्षण अतीत की कोख से जन्मा  है और 
निज गर्भ में समेटे है  कल 
नहीं टूटती है यह श्रृंखला 
नहीं टूटी है आजतक !
इस पल में ठहरना ही ध्यान है 
इस पल में रुकना ही तोड़ देता है हर सीमा 
जो घेर लेती है आत्मा को 
करने कैद उसकी ही मान्यताओं के घेरे में !


शनिवार, अगस्त 9

भीतर एक नदी बहती है



भीतर एक नदी बहती है

भीतर एक नदी बहती है
लेकर कितने भेद हृदय में,
अंतर को सिंचित करती है !

उद्गम कहाँ ? कौन जानता
अंत भी अनदेखा ही रहता,
निर्मलता उर में भरती है !

तट पर कितने दुर्ग बनाये
युद्ध लड़े हारे जितवाए,
अनथक वह गतिमय रहती है !

सुर सरिता है यूँ भासता
देवलोक से आई भू पर,
मृत अतीत संग ले जाती है !

भावों की हाला भर उर में
मृदु मद्धिम गाती इक सुर में,
मंथर गति से इतराती है !



बुधवार, जनवरी 1

नया वर्ष दस्तक देता है

नया वर्ष दस्तक देता है


धरती ने की पूर्ण सूर्य की, एक परिक्रमा देखो और
बीत गयीं कुछ अमावसें व, जगीं पूर्णिमाओं की भोर !

पुनः ली करवट ऋतु चक्र ने, सहज पुकारे है जीवन
हुई शोख रंगत फूलों की, सुन भ्रमरों की बढ़ती गुंजन !

अनल गगन की नव रश्मि से, हम भी तो भीतर सुलगा लें
भरकर भीतर नई ऊष्मा, कुहरा मन का छंट जाने दें !

करें पूर्ण जो रहा अधूरा, जो छूटे संग उन्हें ले लें
धूल सा झाड़ें जो अनचाहा, तज अतीत हल्के हो लें !

उम्मीदों की धूप जगाएं, ख्वाब भरें सूनी आँखों में
रब ने दी जिन्दगी जिनको, न्याय मांगते पर राहों में !

प्रेम जग दिलों में उनके, लोभ, स्वार्थ जहाँ है भारी
नये वर्ष में यही प्रार्थना, कोई न भूखा, न लाचारी !

नहीं घुले जहर मिट्टी में, हों निर्मल नदियों के जल
शुद्ध हवाएं, कटें न जंगल, तंग न हो किसी का दिल !

बेवजह गमजदा आदमी, जागे वह खुद को पहचाने
नहीं गुलामी करे किसी की, आजादी का सुख भी जाने !

एक नयी आस्था भीतर, जीवन का आधार बने
जीत सत्य की ही होगी, पुनः यही हुंकार उठे !

भय से नहीं प्रेम से जोड़ें, शुभ संस्कृतियाँ पुनः खिलें
नया वर्ष दस्तक देता है, खुशियों की सौगात मिले !

गुरुवार, अगस्त 23

कवयित्री राजेश कुमारी का काव्य संसार- खामोश ख़ामोशी और हम


   
मुज्जफरनगर, उत्तरप्रदेश में जन्मी राजेश कुमारी जी, जियो और जीने दो.. में विश्वास रखती हैं. संगीत व चित्रकला में भी इनकी रूचि है. अतीत से सीख लेकर वर्तमान को सुधारतीं और भविष्य की ओर सजगता से कदम बढ़ातीं हैं. खामोश ख़ामोशी और हम में इनकी छह कवितायें हैं, सभी विविध विषयों पर लिखी हुईं. किसी में प्रेम की असीमता का वर्णन है जैसे, प्रिये हम कितनी दूर निकल आये, जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया में जीवन की कटु सच्चाई का, भ्रूण हत्या का विरोध करती एक कविता है मुझको दुनिया में आने दो और बालिका शिक्षण को बढ़ावा देती देखो शिखर सम खड़ा हुआ, परमात्मा की कृपा का बखान करती मृग तृष्णा और जीवन का लेखाजोखा लेती जीवन आख्याति....

ना अब कुंठाओं के घेरे हैं
ना मायूसियों के साये
मैं पदचाप सुनूं तेरी
तू पदचाप सुने मेरी
...
बाँहों में बाहें थाम प्रिये
हम कितनी दूर निकल आये
देखो क्या मंजर है प्रिये
नभ धरा का मस्तक चूम रहा
तिलस्मी हो गयी दिशाएं
नशे में तृण तृण झूम रहा
रजनी हौले से आ रही
तारों भरा आंचल फैलाये
बाँहों में बाहें थाम प्रिये
हम कितनी दूर निकल आये
..
चल हाथ पकड़ मेरा प्रिये
अब अपने पथ पर बढ़ जाएँ
मैं पदचाप सुनूं तेरी
तू पदचाप सुने मेरी

समाज में कितने बच्चे और बच्चियां समय से पहले बड़े हो जाने को मजबूर हैं, बाल मजदूरी करने को विवश बच्चे अपना बचपन जी भी नहीं पाते कि समाज उनके हाथों में औजार पकड़ा देता है...

निष्ठुर हाथों ने बचपन छुड़ाया
जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया
अभी खिसकना सीखा था
वक्त ने कैसे बड़ा किया
...
कुछ समाज की दोहरी चालों ने
कुछ दोगली फितरत वालों ने
समय से पहले बड़ा किया
अभी खिसकना सीखा था
वक्त ने कैसे बड़ा किया

बालिका भ्रूण हत्या आज समाज की ज्वलंत समस्या है, भारत के कितने ही राज्यों में लिंग का अनुपात विषम हो गया है. कवयित्री इस पर कलम उठाती है-

मैं तेरी धरा का बीज हूँ माँ
मुझको पौधा बन जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमें ऐसा
मुझको दुनिया में आने दो

...
जंगल उपवन खलिहानों में
हर नस्ल के पुष्प महकते हैं
स्वछन्द परिंदों के नीड़ों में
दोनों ही लिंग चहकते हैं

प्रकृति के इस समन्वय का
उच्छेदन मत हो जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमें ऐसा
मुझको दुनिया में आने दो

...
नारी अस्तित्त्व के कंटक का
मूलोच्छेदन करना होगा
तेरे दूध पर मेरा भी हक है
दुनिया को ये समझाने दो

अगली कविता कवयित्री ने उन माता-पिता के नाम की है जिन्होंने सर्वप्रथम बालिका शिक्षण की शुरुआत की.

देखो शिखर सम खड़ा हुआ
सकुचाया सा डरा डरा
..
जाने कब हो जाये हनन
सघन तरु की छाया में
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआ
..
बीते कितने पतझड़ बसंत
हुआ कद उसका और बुलंद
...
अरि आलोचक मूक बनाये
अपने दम पर खड़ा हुआ
..
कहाँ भीरुता दुर्बल तन
अब बन गया वो तरु सघन
मेरी धरोहर मेरा वंश
उसके ही दम से चला हुआ

मृग तृष्णा शीर्षक कविता अपनी विषय वस्तु और सहज प्रवाह के कारण सीधा हृदय में प्रवेश करती है
मृग तृष्णा में लिप्त
अनवरत गति से भागते हुए
जब थक कर चूर होकर
मायूसी के मरुस्थल में लेट जाती हूँ
..
पूछती हूँ प्यासी हूँ कहाँ जाऊँ
उसने हथेली पे मेरी
एक जल की बूंद गिरा दी
अगर तू है
तो तुझे सुनना चाहती हूँ
उसने बादलों की गर्जना सुना दी
...
कैसे बनाऊँ अपना स्वर्ण महल
उसने चोंच में तिनका लेकर
जाती हुई चिड़िया दिखा दी
..
मैंने कहा अब विश्राम करना चाहती हूँ
उसने तरु की एक कोमल
पत्ती बिछा दी

जीवन आख्याति में कवयित्री जीवन की यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर पल भर ठहरती है और आगे बढ़ जाती है

दुनिया में आया तो जननी प्यारी मिली
वात्सल्यता की देवी
जीवन संचारी मिली
बाल्यावस्था में खेल खिलौने
पुस्तक और मित्रों की यारी मिली
किशोरावस्था में भ्रमित, जिज्ञासु  मन
और प्रश्नों की श्रंखला
विस्मयकारी मिली
युवावस्था में दिल की
संगत न्यारी मिली
..
प्रौढावस्था में कुछ परिपक्व अनुभव
कुछ संचयन आबंटन की हकदारी मिली
..
अतिम चरण में
मौत जीवन में भारी मिली

राजेश कुमारी जी कि इन कविताओं को पढ़ते हुए उनके सामाजिक सराकोरों से दो चार होते हुए और जीवन यात्रा का आकलन करते हुए एक सुखद अहसास हुआ, आशा है सभी सुधी पाठक जन भी इनका रसास्वादन करेंगे.