सोमवार, जून 1

निजता

निजता 


किसी को, कुछ और नहीं होना है 

जो, जो है, वही होकर, स्वयं को संजोना है 

गुलाब, गुलाब रहकर ही महकेगा 

कमल जल में ही चहकेगा 

निजता को पहचान, उस पर महल बनाना है 

न कि किसी की अनुकृति बनने की दौड़ में 

ख़ुद को तपाना है 

जीवन हरेक के योगदान से बना है 

एक घास का तिनका भी उतना ही ज़रूरी है 

जितना आकाश में कोई वृक्ष तना है 

एक पत्थर भी नदी के तल को 

मज़बूत बनाना है 

हिमालय भी धरती की शोभा बढ़ाता है 

हर कोई अपने जैसा है,  तभी खास है 

कोई दो पत्ते भी एक से नहीं होते

जो रहते आसपास हैं !

1 टिप्पणी:

  1. वाह्ह क्या बात कही आपने सभी स्वयं में अद्भुत है कोई किसी की तरह नहीं है,सभी खास है। यही तो करिश्मा है।
    सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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