गुरुवार, जून 4

ग्लेशियर पिघल रहे हैं

ग्लेशियर पिघल रहे हैं 



धरती के दोनों ध्रुवों पर पर बसने वाले 

छोटे-छोटे मुल्कों को 

झेलनी पड़ रही है सजा 

उस जुर्म की, जो उन्होंने किया ही नहीं 

हर रोज़ मरते हैं हरित वन 

और जन्मते हैं कंक्रीट के जंगल 

हर रोज़ उगलते हैं करोड़ों वाहन, धुआँ 

एसी, गर्म हवा और चिमनियाँ, आग 

ग्लोबल वार्मिंग का सृजक, शहरी आदमी 

फूँके जा रहा कोयला और तेल बेहिसाब 

कुदरत के प्रति उदासीन 

जब उसका भीषण रूप डराता है 

उसके प्रकोप के आगे 

हर विकास धरा रह जाता है 

टूटते बादल, दरकते पर्वत 

आये दिन छा जाने वाले अंधड़ और तूफ़ान 

आख़िर कब समझेगा इंसान 

जब उसे अपने अस्तित्त्व के लिए 

इसी प्रकृति का आश्रय ही लेना 

तो असजग होकर क्यों जीना ?

 

 

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