रविवार, अक्टूबर 18

मृत्यु के उस अंधकार से

मृत्यु के उस अंधकार से

 जो सृष्टि की मूल प्रकृति हैं 

तीनों गुणों को करें सक्रिय, 

घोर विनाश की महारात्रि 

भीषण, उग्र ज्यों अंतिम प्रलय !


काल नहीं ठहरता उनमें 

मृत्यु की भी मृत्यु हैं देवी, 

कालरात्रि अतीव घोरा हैं 

 शुभंकरी कहलातीं देवी !


पीड़ाएँ, दुख रहते जग में 

देवी उन पर शासन करतीं,  

दुख दरिद्रता, रोग, शोक हर 

मंगलमय, शुभ प्रियता भरतीं !


कठिन समय जीवन में आये 

ऐसा भी कुछ साधन करतीं, 

दो-दो हाथ करें हम, क्योंकि 

संघर्षों की आग तपाती !


‘मैं’ ‘मेरा’ के चक्रव्यूह से 

उग्र रूप माँ का ही निकाले, 

मृत्यु के उस अंधकार से 

 गुजर अहम् नव जीवन पा ले ! 


अहंकार को भस्मित करके 

अभय और वरदान लुटातीं, 

ज्वालाएँ नेत्रों से प्रकटे 

विघ्नों को जो सहज हटातीं !


पग-पग पर यह काल डस रहा 

मृत्यु रूप में माँ ही आतीं, 

एक गहन विश्राम दिलाकर 

नव जीवन की ओर बढ़ातीं !


परम रहस्य, गोपनीय छाया 

दिव्य प्रकाश छिपाये भीतर, 

करें सामना भय का यदि हम 

 पार ले चलें अभय दिलाकर !


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