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शनिवार, अगस्त 2

जीवन एक अदृश्य ज्योति सा

जीवन एक अदृश्य ज्योति सा 

कोई कहीं तलाश न करता 

भीतर न सवाल कोई शेष, 

नहीं राग अब सुख का उर में 

रह नहीं गया दुखों से द्वेष !


एक खेल सा जीवन लगता 

 अब न मोह में डाले माया,

एक अनंत मिला है बाहर 

एक शून्य भीतर जग आया !


इस पल में ही छुपा काल है 

एक बिंदु में सिंधु समाया, 

कण-कण में ब्रह्मांड बसे हैं 

इसी पिंड में उसको पाया !


जीवन एक अदृश्य ज्योति सा 

चारों ओर हवा सा बिखरा, 

सुमिरन की सुवास इक हल्की 

श्वासों से जाता है छितरा !


सोमवार, जून 16

कैसे मन की गागर भरती


कैसे मन की गागर भरती


कितने पल ख़ाली बीते हैं 
अक्सर हम यूँ ही रीते हैं, 
भर सकते थे उर उस सुख से 
जिसकी ख़ातिर ही जीते हैं !

किंतु नज़रें सदा अभाव पर 
कैसे मन की गागर भरती, 
भय से छुपे रहे गह्वर  में 
रिमझिम जब धाराएँ झरती !

निज शक्ति पर डाले पहरे 
निज आनंद की खबर नहीं थी, 
पीठ दिखाकर ज्योति पुंज को 
अंधकार की बाँह गही थी !

जाने कैसा मोह व्याप्त है 
ख़ुद से ही मन दूर भागता, 
दुनिया भर की खोज-खबर ले 
पल भर भीतर नहीं झाँकता !

मंगलवार, जून 18

हम आत्मदेश के वासी हैं

हम आत्मदेश के वासी हैं 


भीतर एक ज्योति जलती है 

जो तूफ़ानों में भी अकंप, 

तन थकता जब मन सो जाता

जगा रहता आत्मा निष्कंप !


तन शिथिल हुआ मन दृढ़ अब भी 

‘स्वयं’ सदा जागृत है भीतर, 

हम आत्मदेश के वासी हैं 

फिर क्यों हो जरा-मृत्यु से डर !


मृत्यु पर पायी विजय हमने 

जिस पल भीतर देखा ख़ुद को, 

नित मौन अटल घटता अंतर

बाहर बैठाया हर  दुख को  !


जीवन की संध्या आती है 

कब मेला यह उठ जाएगा ? 

नहीं शिकायत कोई जग से 

संग ‘वही’ अपने जाएगा  !


शनिवार, जून 15

जीवन रहे बुलाता हर पल

जीवन रहे  बुलाता हर पल


​​भीतर इक संसार दूसरा 

शायद  यह जग कभी न जाने, 

इस जीवन में राज छिपे हैं 

लगे सभी हैं जिन्हें छिपाने !


लेकिन इसी अँधेरे में इक 

दीप जला करता है निशदिन, 

देख न पाते, कहीं दूर है 

खुला जो नहीं तीसरा नयन !


कोई कहाँ जान सकता है 

मन की दुनिया बड़ी निराली, 

यूँ ही नहीं सुनाते आगम 

अंधकार ने ज्योति चुरा ली !


फिर भी यह श्वासें चलती हैं 

चाहे लाख तमस ने घेरा, 

 कैसे अर्थवान हो जीवन 

इसी प्रश्न ने डाला डेरा !


कोई पीछे खड़ा हँस रहा 

जीवन रहे बुलाता हर पल, 

रंग-बिरंगी इस दुनिया की 

याद दिलाती है हर हलचल !  


कितना गहरे और उतरना 

 अभी सफ़र बाकी है कितना, 

जहां पुष्प प्रकाश के खिलते 

जहाँ बसा अपनों से अपना ! 


मंगलवार, दिसंबर 27

उजियारा मन बाती कारण


उजियारा मन बाती  कारण


देह दीप माटी का जैसे

उजियारा मन बाती  कारण, 

स्नेह प्राण का, ज्योति आत्म की 

जग को किया  उसी ने धारण !


दीपक छोटे, बड़े क़ीमती 

मन भी भिन्न क्षमता की  बात, 

प्राणों में बल घटता-बढ़ता 

किंतु ज्योति है एक दिन-रात !


उसी ज्योति की ओर चले थे 

ऋषि ने जब तमसो गाया था, 

वही ज्योति शुभ मार्ग दिखाती 

महाजनों को जो भाया था !





शनिवार, दिसंबर 24

ज्योति कमल नित नए खिलाता

ज्योति कमल नित नए खिलाता


वह अनंत ही, सांत बना है 

भरमाता खुद को, माया से 

सत्य मान जो, भ्रमित हो गया 

डर जाता है, जो छाया से !


नित  प्रेम जो, मोह में फँसता

सदा शांत, पर द्वेष जगाए 

जीवन विमल अमृत सा बरसे, 

अनजाने में गरल बनाए !


सुख की चाह सदा भरमाती 

खुद से दूर चला जाता है, 

अपने भीतर भर भंडारे 

उर चिर तृषित  छला जाता है !


जो हल्का है लघु तिनके सा 

भारी भीषण हिम पर्वत सा, 

दूर अति नक्षत्र अनंत सा 

श्वासों से भी निकट बसा है !


जिसका होना वही जानता

बिरला कोई  ही लख पाता,

गुनगुन भँवरे सा गाता है 

ज्योति कमल नित नए खिलाता !


मंगलवार, अक्टूबर 25

दिवाली की अगली भोर

दिवाली की अगली भोर 


सूर्य ग्रहण लगने वाला है 

किंतु अभी है शेष  उजाला 

उन दीयों का 

जो बाले थे बीती रात 

जगमग हुईं थी राहें सारी 

गली-गली, हर कोना भू का 

चमक उठा था जिनकी प्रभा से 

ज्योति प्रेम की झलक रही थी 

आशा व विश्वास जगाती 

नयी भोर का 

भर लें मन में नीर कृपा का 

देवी माँ का उजला मुखड़ा

उठा वरद हस्त गणपति का 

कान्हा की मोहक मुस्कान 

हर आँगन में देव उतरते

सँग मानव के क्रीड़ा करते 

विमल प्रेम, उल्लास धरा पर 

युग-युग से लाते 

वे ही चमक हैं भारत माँ की 

देवों के सँग बातें दिल की 

गुरू ज्ञान भी 

अंधकार हर रहे मिटाता 

एक वर्ष फिर करें प्रतीक्षा 

युग-युग से यह पर्व अनोखा 

भर उमंग नव राह दिखाता !




शुक्रवार, सितंबर 16

शुभ दीपक एक जलाना है

शुभ दीपक एक जलाना है


छँट जाएगा घोर अँधेरा 

उहापोह, उलझन का डेरा, 

थोड़ा सा स्नेह जगाना है 

शुभ दीपक एक जलाना है !


एक से फिर अनेक जल सकते

ज्योति की आकर बन सकते,

अनथक पथ चलते जाना है 

मग दीपक एक जलाना है !


फूल खिलाये हैं जिसने नित 

नीरवता गूँजे जिसके मित,

उसका इक गीत सुनाना है 

यश दीपक एक जलाना है !


करुणा, प्रेम, तपस, प्रार्थना 

दिलों में सोयी मधुर भावना, 

हौले से  पुनः जगाना है 

जय दीपक एक जलाना है !


दीप जल रहे जो नयनों में 

सुहास झरे मृदुल बयनों में, 

ऐसा इक राग सुनाना है 

हित दीपक एक जलाना है !


वचन कभी जो शर से चुभते 

निज अंतर  का भी बल हरते,

ना ऐसा रुख अपनाना है 

 मधु दीपक एक जलाना है !



बुधवार, जुलाई 13

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता


सदगुरु दोनों हाथ लुटाता

खुद से बढ़कर कुछ भी जग में

पाने योग्य नहीं है, कहता,

उसी एक को पहले पालो

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

 

जग में होकर नहीं जगत में

सोये जागे वह तो रब में,

उसके भीतर ज्योति जली है

देखे वह सबके अंतर में !

 

भीतर का संगीत जगाता

खोई सी निज याद दिलाता,

जन्मों का जो सफर चल रहा

उसकी मंजिल पर ले जाता !

लूट मची है राम नाम की

निशदिन उसकी हाट सजी है,

झोली भर-भर लायें हम घर

उसको कोई कमी नहीं  है !


ऐसा परम स्नेही न दूजा

अनुपम उसका द्वार खुला है,

बिगड़ी जन्मों की संवारें 

सुंदर अवसर आज मिला है ! 


गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित


शुक्रवार, जनवरी 28

एक सूर्य उग आए ऐसा

एक सूर्य उग आए ऐसा


​​
दीप जले अंतर में ऐसा 

ज्योति कभी ना ढके तमस से, 

जगमग कर दे राहें सारी 

कोई विकार छिपे न मन से !


अंत:लोक में जाग उठें हम 

एक सूर्य उग आए ऐसा, 

युगों युगों की नींदें टूटें 

स्वप्न कभी मत घेरे मन को !


अब भी बादल छाते नभ पर 

तूफां भीषण तेज हवाएँ, 

किंतु अमर यह ज्योति अनुपम 

बाल न बाँका ज़रा कर पाएँ !


जो भी जगता इस प्रकाश में 

उसे न अंधकार का भय है, 

मिथ्या जैसे स्वप्न लोक है 

वैसे ही यह जगत लुप्त है  !


शुक्रवार, नवंबर 5

रहें सदा दिल मिले हमारे

रहें सदा दिल मिले हमारे

ज्योति जले ज्यों हर घर-बाहर 

गलियाँ , सड़कें, छत, चौबारे, 

मन में प्रज्ज्वलित स्नेह प्रकाश 

रहें सदा दिल मिले हमारे !

 

घर-आँगन ज्यों स्वच्छ दमकते 

कोना-कोना हुआ उजागर, 

रिश्तों की यह मधुरिम डाली 

निर्मल भावों से हो भासित !

 

सुस्वादु पकवानों की जहाँ 

मीठी-मीठी गंध लुभाती, 

आत्मीयता, अपनेपन की 

धारा अविरल बहे सुहाती !

 

दीवाली का पर्व अनोखा 

दीप, मिठाई, फुलझड़ियों का, 

ले आता है पीछे-पीछे 

सुखद उत्सव भाई दूज का !

 

तिलक भाल पर हँसी अधर पर 

यह भंगिमा बहन को भाए, 

दुआ सदा यह दिल से निकले

सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य सदा पाएँ !


गुरुवार, सितंबर 2

देह दीप में तेल हृदय यह


देह दीप में तेल हृदय यह


ज्योति पुष्प उर के उपवन में 

खिला सदा है उसे निहारें,

सुख का सागर भीतर बहता 

सदा रहा है उसे पुकारें !


नयनों में उसी का उजाला 

अंतर में विश्वास बना है, 

वही चलाता दिल की धड़कन 

रग-रग में उल्लास घना है !


ज्योति वह दामिनी बन चमके 

सूर्य चंद्रमा में भी दमके, 

उसी ज्योति से पादप,पशु हैं 

वही ज्योति हर जड़ चेतन में !


देह दीप में तेल हृदय यह 

ज्योति समान आत्मा ही है, 

माटी का हो या सोने का 

दीपक आख़िर दीपक ही है !


ऐसे ही हैं तेल जगत में 

कुछ सुवास से भरे हुए मन, 

कई आँखों में धुआँ भरते 

किंतु ज्योति न होती कभी कम !

शनिवार, मई 22

पूर्ण भीतर पल रहा है

पूर्ण भीतर पल रहा है 


ज्योति जिसकी शांत कोमल 

चाँदनी सी बिछी पथ में, 

सब तरफ बिखरा उजाला 

एक दीपक जल रहा है !


जगत का मंगल सदा ही 

मांगता, वह ज्ञान देता, 

एक उस का ही पसारा

पीर मन की हर रहा है !


 प्रकटे वही हर शब्द से 

 मूल कारण शब्द का जो 

गड़ी गहरी पीर उर में 

गाँठ हर वह खोलता है !


कसक कुछ न कर सके   

हर अधूरी चाह मन की, 

दूर ले जाती उसी से 

पूर्ण भीतर पल रहा है !


 मन समर्पित हो सके तो 

ढाल बन कर दे सहारा,

सौंप दें हर चाह उसको 

रस सुरीला घोलता है ! 




 

बुधवार, दिसंबर 16

चिदाकाश में भरे उड़ान

चिदाकाश में भरे उड़ान 

मोह तमस का जाल बिछा है 
हंस बना है उसका कैदी, 
सुख के दाने कभी-कभी हैं 
उहापोह है घड़ी-घड़ी की !

टूटे जाल मुक्त हो हंसा 
चिद आकाश में भरे उड़ान, 
गीत गूँजते कण-कण में जो 
सुनकर मगन हुआ अनजान ! 

देह में रह विदेह बना जो 
राज वही जीवन का जाने, 
जल में नाव, नाव में जल ना  
यही कह गए सभी सयाने !

देह छूटती जाती पल-पल 
इक दिन उड़ कर जाना होगा, 
तब तक जग का मेला देखेँ 
जो ना कभी पुराना होगा !

ज्योति मिले ज्योति संग जिस पल  
याद उसी की बनी रहे उर, 
सहज नदी यह बहती जाती 
पहुँचेगी इक दिन तो सागर !