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शुक्रवार, जुलाई 21

अक्सर


अक्सर 


हम जिससे बचना चाहते हैं 

बच ही जाते हैं

जैसे कि कर्त्तव्य पथ की दुश्वारियों से 

अपने हिस्से के योगदान से 

कुछ भी न करके 

हम पाना चाहते हैं सब कुछ 

जगत जलता रहे 

हम सुरक्षित हैं 

जब तक आँच की तपन 

हमें झुलसाने नहीं लगती 

हम हिलते ही नहीं 

अकर्मण्यता की ऐसी ज़ंजीरों ने जकड़ लिया है 

कभी भय, कभी असमर्थता की आड़ में 

हम छुप जाते हैं 

छुपना पलायन है 

पर कृष्ण अर्जुन को भागने नहीं देते 

हर आत्मा को लड़ना ही पड़ता है

एक युद्ध 

प्रमाद के विरुद्ध 

यदि उसे पाना है अनंत 

ऊपर उठना होगा अपनी अक्षमताओं से 

प्रेम को ढाल नहीं कवच बनाकर 

उतरना होगा 

कर्त्तव्य पथ पर !  


बुधवार, मई 11

सच में

सच में 

वह जो कभी नहीं बदलता 

न घटता तिल मात्र 

 न बित्ता भर भी बढ़ता 

वही तो हम हैं असल में 

खींचतान कर जिसे बड़ा किए जा रहे हैं 

वह नहीं 

कभी इसकी कभी उसकी 

टांग खींचते 

या अपना क़द दूसरों की नज़रों में ढूँढते 

बड़ा बनने  की कोई वजह नहीं छोड़ते 

छोटी-छोटी बातों में बड़प्पन झलकाते हैं 

पर हम बड़े हैं ही 

यह राज समझ नहीं पाते हैं 

जो आकाश की तरह रिक्त और अनंत है 

जो महासागरों की तरह विस्तीर्ण और गहरा है 

ऐसा अथाह स्वरूप हमारा है 

कृष्ण ने अर्जुन को इसी ज्ञान से संवारा है ! 

बुधवार, फ़रवरी 16

सब कुछ सौंप दिया है तुझको


हम ईश्वर से कहते हैं कि अपना सब कुछ तुझे सौंपते हैं पर ईश्वर, वह क्या कहता है, क्या उसने सब कुछ मानव को नहीं दे दिया है।


सब कुछ सौंप दिया है तुझको


तेरी ख़ातिर ही तो मैं हूँ

व्यर्थ ही तू फ़िक्र में डूबा, 

उर अंतर श्रद्धा  से भर ले 

अप्राप्य रहेगा कुछ भी ना


संग सदा सहज डोलेंगे

उलझन में तू क्यों भ्रमता है,

मन जो गोकुल बन सकता था

क्यों उदास सा नभ तकता है !


तू है मेरा प्रियतम अर्जुन !

वंचित क्यों है परम प्रेम से,

क्या जग में जो पा न सके तू 

जग चलता है अमर प्रेम से !


सब कुछ सौंप दिया है तुझको

अगन, पवन, जल और धरा में,

किस आकर्षण ने बाँधा है 

डोले सुख-दुःख, मरण-जरा में !


करुणा सदा बरसती सब पर

बस तू मन को पात्र बना ले,

जीवन बन जायेगा मंदिर

दिवस-रात्रि का गान बना ले ! 


बुधवार, सितंबर 9

जरा जाग कर देखा खुद को

जरा जाग कर देखा खुद को 

 

स्वप्न खो गए जब नींदों से 

चढ़ा प्रीत का रंग गुलाल, 

दौड़ व्यर्थ की मिटी जगत में 

झरा हृदय से विषाद, मलाल !

 

द्रष्टा  बन मन जगत निहारे 

बना कृष्ण का योगी,अर्जुन,

कर्ता का जब बोझ उतारा

कृत्य नहीं अब बनते बन्धन !

 

श्वास चल रही रक्त विचरता 

तन अपनी ही धुन में रमता, 

क्षुधा उठाते प्राण, तृषा भी 

कहाँ साक्षी कुछ भी करता !

 

जरा जाग कर देखा खुद को 

सदा पृथक जग से पाता है, 

युग-युग से यह खेल चल रहा 

विवर पात सा उड़ जाता है !

 

वृक्ष विशाल, गगन को छूते  

क्या करते वे, सब होता है, 

जग यूँ ही डोलेगा कल भी 

बोझ न उर पर वह ढोता है !