अक्सर
हम जिससे बचना चाहते हैं
बच ही जाते हैं
जैसे कि कर्त्तव्य पथ की दुश्वारियों से
अपने हिस्से के योगदान से
कुछ भी न करके
हम पाना चाहते हैं सब कुछ
जगत जलता रहे
हम सुरक्षित हैं
जब तक आँच की तपन
हमें झुलसाने नहीं लगती
हम हिलते ही नहीं
अकर्मण्यता की ऐसी ज़ंजीरों ने जकड़ लिया है
कभी भय, कभी असमर्थता की आड़ में
हम छुप जाते हैं
छुपना पलायन है
पर कृष्ण अर्जुन को भागने नहीं देते
हर आत्मा को लड़ना ही पड़ता है
एक युद्ध
प्रमाद के विरुद्ध
यदि उसे पाना है अनंत
ऊपर उठना होगा अपनी अक्षमताओं से
प्रेम को ढाल नहीं कवच बनाकर
उतरना होगा
कर्त्तव्य पथ पर !

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