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शनिवार, अप्रैल 1

आनंदित है कण-कण जड़ का

आनंदित है कण-कण जड़ का 


निशदिन मेघ प्रीत का तेरी 

बरस रहा है झर-झर झर-झर, 

ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ 

दसों दिशाओं  से नित आकर !


जिस पल बनी पदार्थ ऊर्जा 

नवल सृष्टि का जन्म हुआ था,

रूप अनंत धरे जाती है 

मानो कोई खेल चल रहा !


आनंदित है कण-कण जड़ का 

चेतन इसमें छिपा हुआ है, 

कुदरत का सौंदर्य अनूठा 

मधुरिम लय में बँधा हुआ है 


अंतर्मन में गुँथे हुए ज्यों 

श्रद्धा, प्रेम आस्था के स्वर, 

तू ही हमें राह दिखलाता 

खोज निकालें इनको भीतर !


सुख दे खुद  के निकट बुलाए 

दुःख दे उर में विरह जगाए, 

सहज बने कैसे यह जीवन 

पल-पल इसका मार्ग दिखाए !


कैसे करें शुक्रिया तेरा 

तुझसे ही अस्तित्त्व टिका है, 

शांति, प्रेम, सुख सागर बनता 

जो दिल तेरे लिए बिका है !



शुक्रवार, फ़रवरी 17

उर में मुक्ति राग बजें


उर में  मुक्ति राग बजें 

आशा नहीं आस्था के हम मिलकर दीप जलायें 

तज आकाश कुसुम तंद्रा के श्रद्धा पुष्प खिलायें,


हरकर तमस भरेंगे  पावन मधुर  सुवास हृदय में 

मंगल प्रीत अल्पनाओं  पर नेह घट विमल सजायें ! 


मोहपाश तोड़कर सहसा उर में  मुक्ति राग बजें 

नील गगन में भर  उड़ान  मन मयूर निर्मुक्त सजें,


पाषाणों से ढके स्रोत जो सिमटे अपने गह्वर 

सहज  प्रवाहित निर्बाधित  बह निकलें उत्ताल लहर  !


छाए बहार चहुँ ओर मिटे  तामस हर इक घट का 

झांकें गहन  रहस्य खोजें  खोलें  पट घूँघट का ! 


जो  गाए न गीत कभी ना  जिनकी लय-धुन बांधी

परिचय करें अनाम स्वरों  से  गूँजे  नयी रागिनी  !  

​​

बुधवार, फ़रवरी 16

सब कुछ सौंप दिया है तुझको


हम ईश्वर से कहते हैं कि अपना सब कुछ तुझे सौंपते हैं पर ईश्वर, वह क्या कहता है, क्या उसने सब कुछ मानव को नहीं दे दिया है।


सब कुछ सौंप दिया है तुझको


तेरी ख़ातिर ही तो मैं हूँ

व्यर्थ ही तू फ़िक्र में डूबा, 

उर अंतर श्रद्धा  से भर ले 

अप्राप्य रहेगा कुछ भी ना


संग सदा सहज डोलेंगे

उलझन में तू क्यों भ्रमता है,

मन जो गोकुल बन सकता था

क्यों उदास सा नभ तकता है !


तू है मेरा प्रियतम अर्जुन !

वंचित क्यों है परम प्रेम से,

क्या जग में जो पा न सके तू 

जग चलता है अमर प्रेम से !


सब कुछ सौंप दिया है तुझको

अगन, पवन, जल और धरा में,

किस आकर्षण ने बाँधा है 

डोले सुख-दुःख, मरण-जरा में !


करुणा सदा बरसती सब पर

बस तू मन को पात्र बना ले,

जीवन बन जायेगा मंदिर

दिवस-रात्रि का गान बना ले ! 


सोमवार, जनवरी 31

श्रद्धा का फूल



श्रद्धा का फूल 


श्रद्धा का फूल 

जिस अंतर में खिलता है 

प्रेम सुरभि से 

वही तो भरता है !


बोध का दिया जलता 

अविचल, अविकंप वहाँ 

समर्पण की आँच में 

अहंकार ग़लता है !


श्रद्धा का रत्न ही 

पाने के काबिल है 

स्वप्न से इस जगत में 

और क्या हासिल है 

आनंद की बरखा में 

भीगता कण-कण उर का 

सारी कायनात 

इस उत्सव में शामिल है !


हरेक ऊहापोह से

 श्रद्धा बचाती है 

चैन की एक छाया 

जैसे बिछ जाती है 

जो नहीं करे आकलन

 नहीं व्यर्थ रोकटोक 

श्रद्धा उस प्रियतम से

जाकर मिलाती है !


श्रद्धा का दीप जले 

अंतर उजियारा है  

हर घड़ी साथ दे 

यह ऐसा सहारा है 

अकथनीय, अनिवर्चनीय 

जीवन की पुस्तक को

 इसने निखारा है !


शुक्रवार, अक्टूबर 8

काली माँ, कपालिनी अम्बा

काली माँ, कपालिनी अम्बा


कल्याणी, निर्गुणा, भवानी

अखिल विश्व आश्रयीदात्री,

वसुंधरा, भूदेवी, जननी

धी, श्री, कांति, क्षमा, सुमात्री !


श्रद्धा, मेधा, धृति तुम माता 

अम्बा गौरी, दुःख निवारिणी

जया, विजया, धात्री, लज्जा

कीर्ति, स्पृहा, हो दया कारिणी !


चिन्मयी दिव्य पराम्बा तुम

उमा, पार्वती, सती, भवानी,

ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मस्वरूप 

सावित्री, शाकम्बर देवी !


काली माँ, कपालिनी अम्बा

स्वाहा तुम्हीं स्वधा कहलाती,

विश्वेश्वर, आनन्ददायिनी

क्षेमंकरी, पर्वत वासिनी  I


त्रिगुणमयी, करुणामय, कमला

चण्डी, शाम्भवी, हो सुभद्रा,

हे भुवनेश्वरी, मात गिरिजा

मंगल दायी, हे जगदम्बा !  


सिंह वाहिनी, कात्यायनी

चंद्रघंटा, कुष्मांडा भी, 

अष्टभुजा, स्वर्णमयी माता 

त्रिनेत्री तुम सिद्धि दात्री I


शुक्रवार, मई 28

भीतर रस का स्रोत बहेगा

भीतर रस का स्रोत बहेगा 


छा जाएं जब भी बाधाएं 

श्रद्धा का इक दीप जला लें, 

दुर्गम पथ भी सरल बनेगा

जिसके कोमल उजियाले में !


एक ज्योति विश्वास की अटल  

अंतर्मन में रहे प्रज्ज्वलित, 

जीवन पथ को उजियारा कर 

कटे यात्रा होकर प्रमुदित !


कोई साथ सदा है अपने 

भाव यदि यही प्रबल रहेगा, 

दुख-पीड़ा के गहन क्षणों में 

भीतर रस का स्रोत बहेगा !


श्रद्धालु ही स्वयं को जाने 

कैसे उससे डोर बँधी है,

भटक रहा था अंधकार में 

अब भीतर रोशनी घटी है !


जिसने भी यह सृष्टि रचाई 

दिल का इससे क्या है नाता,

एक भरोसा, एक आसरा

जीवन में अद्भुत बल भरता !

 

मंगलवार, अप्रैल 14

उर दर्पण में उसको देखा

उर दर्पण में उसको देखा 


उर दर्पण में ‘उसको’ देखा 
‘उसको’ यानि स्वयं को देखा,
आश्वस्ति की लहर छू गयी
जब-जब भीतर जाकर देखा !

पहले-पहले गहन बवंडर 
झंझावात बहुत उठेंगे, 
अनजाने रस्तों पर मन के 
बीहड़ कंटक पाहन होंगे !

लेकिन दूर कहीं से कोई 
झरने की कल-कल भी आती, 
कभी किसी पंछी की कुह-कुह
मधुरिम कोई प्यास जगाती !

निकट कहीं ही वह बसता है 
श्रद्धा दीप न बुझने पाए, 
बढ़ता रहे निरन्तर राही 
मंजिल इक दिन सम्मुख आए !

एक झलक जो भी पा लेता 
जग में नहीं अजनबी रहता,
पर्वत नदिया बादल उपवन 
सबसे दिल का नाता बनता ! 

कुदरत से संघर्ष नहीं हो 
मानव उसका एक अंश है, 
माँ से दूर गया हो बालक 
चुभता उर में सदा दंश है !

अवसर एक हाथ आया है 
अंबर से हम नाता जोड़ें, 
धरती पर जब पाँव धरें तो 
माँ कहकर ही नमन भी करें ! 

बुधवार, जुलाई 31

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा


चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा


मानस की घाटी में श्रद्धा का बीज गिरा
प्रज्ञा की डालियों पर शांति का पुष्प उगा,
मन अंतर सुवास से जीवन बहार महकी  
रिस-रिस कर प्रेम बहा अधरों से हास पगा !

कण-कण में आस जगा नैनों में जोत जली
हुलसा तन का पोर-पोर अनहद नाद बजा,
मधुरिम इक लय बिखरी जीवन संगीत बहा
कदमों में थिरकन भर अंतर में नृत्य जगा !

मुस्काई हर धड़कन लहराया जब वसंत
अपने ही आंगन में प्रियतम का द्वार खुला,
लहरों सी बन पुलकन उसकी ही बात कहे
बिन बोले सब कह दे अद्भुत आलाप उठा !

हँसता है हर पल वह सूरज की किरणों में
चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा,
पल-पल संग वही संवारे सुंदर भाग जगा
देखो यह मस्ती का भीतर है फाग सगा !

युग-युग से प्यासी थी धरती का भाग खुला
सरसी बगिया मन की जीवन में तोष जगा,
वह है वही अपना रह-रह यह कोई कहे
सोया था जो कब से अंतर वह आज जगा !


गुरुवार, अगस्त 23

पाया परस जब नेह का



पाया परस जब नेह का


तेरे बिना कुछ भी नहीं
तेरे सिवा कुछ भी नहीं,
तू ही खिला तू ही झरा
तू बन बहा नदिया कहीं !

तू लहर तू ही समुन्दर
हर बूंद में समाया भी,
सुर नाद बनकर गूँजता
गान तू अक्षर अजर भी !

है प्रीत करुणा भावना
सपना बना तू भोर में,
छू पलक तू ही जगाता
सुख सम भरा हर पोर में !

तुझसे हृदय की धड़कनें
मृत्यु है तेरी गोद में,
श्रद्धा, सबूरी, अर्चना,
नव चेतना हर शब्द में !

भीतर मिला हर स्वर्ग बन
जीवन का सहज मर्म तू,
खोयी कहीं दुःख की अगन
हर नीति औ’ हर धर्म तू !

कतरा-कतरा विदेह बन
डूबा सरल उर भाव में,
पाया परस जब नेह का
मन खो गया इस चाव में !

कण-कण पगा रस माधुरी
भीगा सा मन वसन हिले,
तेरी झलक जब थिर हुई
उर में हजार कमल खिले !

मद मस्त हो उर गा उठा
जीवन बिखरता हर घड़ी,
तू ही निखरता भोर में
तू ही सजा तारक लड़ी !

तू ही गगन में चन्द्रमा
तू ही धरा पर मन हुआ,
रविकर हुआ छू ले जहाँ
तू ही खिला बन कर ऋचा !


सोमवार, जुलाई 10

मानव और परमात्मा


मानव और परमात्मा

मुक्ति की तलाश करे अथवा ऐश्वर्यों की
परमात्मा होना चाहता है मानव
या कहें ‘व्यष्टि’ बनना चाहता है ‘समष्टि’
प्रभुता की आकांक्षा छिपी है भीतर
पर कृपण है उसका स्नेह
जो प्रेम में नहीं बदलता
बदल भी गया तो धुंधला-धुंधला है  
पावन है यदि प्रेम तो धुआं नहीं देगा दर्द का
अग्नि सम जला देगा हर द्वैत को
जिसकी चट्टान ही
नहीं पनपने देती आत्म के बीज को 
  जो खिलकर अस्तित्त्व से एक हो  
धरा-आकाश, जड़-चेतन से एक
शुद्ध प्रेम ही खिलायेगा श्रद्धा का फूल
  उड़ेल दी श्रद्धा जब उसके चरणों में
तब जन्मेगी भक्ति
  बनेगा भक्त.. भगवान भी उसी क्षण !

बुधवार, जून 29

सच क्या है

सच क्या है

सच सूक्ष्म है जो कहने में नहीं आता
सच भाव है जो शब्दों में नहीं समाता
सच एकांत है जहाँ दूसरा प्रवेश नहीं पाता
सच सन्नाटा है जहाँ एक ‘तू’ ही गुंजाता
सच में हुआ जा सकता है पर होने वाला नहीं बचता
सच एक अहसास है जिससे इस जग का कोई मेल नहीं घटता
सच बहुत कोमल है गुलाब से भी
सच होकर भी नहीं होने जैसा है
सच का राही चला जाता है अनंत की ओर
थामे हुए हाथों में श्रद्धा की डोर !

मंगलवार, मई 27

रास रचाएं संग वनमाली

रास रचाएं संग वनमाली



चलो झटक दें हर वह पीड़ा
जो उससे मिलने में बाधक,
सभी कामना अर्पण कर दें
बन जाएँ अर्जुन से साधक !

चलो उगा दें चाँद प्रीत का
उससे ही करें प्रतिस्पर्धा,
या फिर अंजुरी भर-भर दें दें
भीतर उमग रही जो श्रद्धा !

चलो गिरा दें सभी आवरण
गोपी से हो जाएँ खाली,
उर के भेद सब ही खोल दें
रास रचाएं संग वनमाली !