आया बसंत
सरसों
के पीले फूलों पर
गुनगुन
गाते डोल रहे हैं,
मतवाले
मदमस्त भ्रमर ये
कौन
सी भाषा बोल रहे हैं ?
पात
झरे भई शाख गुलाबी
आड़ू
के वृक्ष इतराते,
सूनी
डालें सहजन की सज
आसमान
से करती बातें !
कंचन
भी कतार में खड़ा
गुपचुप
भीतर गुनता है कुछ,
माह
फरवरी आया है तो
वह
भी है खिलने को आतुर
सारी
कायनात महकी है
घुली
पवन में मादक गंध,
रस
की कोई गागर छलके
बहा
जा रहा है मकरंद !
मन
को सुमन बना, कर अर्पित
मुस्कानों
को खुली छूट दें,
प्रीत
की इक रस धार बहाकर
ये
अनंत सौगात लूट लें !



