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बुधवार, अगस्त 6

दुनिया तो बस इक दर्पण है

दुनिया तो बस इक दर्पण है


फूलों की सुवास बिखरायें 

या फिर तीखे बाण चलायें,

शब्द हमारे, हम ही सर्जक 

हमने ही तो वे उपजाए !


चेहरा भी व तन का हर कण 

रचना सदा हमारी अपनी, 

 अस्वस्थ हो तन या निरोगी 

ज़िम्मेदारी ख़ुद ही लेनी ! 


डर लगता है, गर्हित  दुनिया 

हम ही भीतर कहते आये,

अपने ही हाथों क़िस्मत में 

दुख के जंगल बोते आये !


कभी लोभवश, कभी द्वेषवश

कभी क्रोध के वश हो जाते, 

मन के इस सुंदर उपवन को 

पल भर में रौंद चले जाते !


कोई नहीं है शत्रु बाहर 

ख़ुद ही काफ़ी हैं इस ख़ातिर, 

दुनिया तो बस इक दर्पण है 

‘वही’ हो रहा इसमें ज़ाहिर !


शनिवार, मई 31

कामना का अभाव

कामना का अभाव 


जैसे धुएँ से ढकी रहती है अग्नि 

और धूल से दर्पण 

वैसे ही ढक जाती है चेतना 

कामना के आवरण से 

उजागर नहीं होने देती सत्य 

अनावृत मन ही हो जाता अनंत

हर कामना यदि अर्पित हो जाये 

रिक्त अन्तर में विश्वास यह भर जाये 

 पल-पल कुशल-क्षेम कोई रखे ही जाता 

तो हर बार वार अभाव का ख़ाली चला जाता 

पूर्णता की तलाश हर अभाव को मिटाना है 

मुक्त हो हर प्रभाव से, स्वभाव में आ जाना है ! 


बुधवार, अक्टूबर 11

साक्षी

साक्षी 


जैसे दर्पण में झलक जाता है जगत 

दर्पण ज्यों का त्यों रहता है 

पहले देखती हैं आँखें

फिर मन और तब उसके पीछे ‘कोई’ 

पर वह अलिप्त है 

उस पर्दे की तरह 

जिस पर दिखायी जा रही है फ़िल्म 

पर्दा नहीं बनाता चित्र 

पर ‘वही’ बन जाता है जगत 

जैसे सागर ही लहरें बन जाए 

पर पीछे खड़ा देखता रहे 

उठना-गिरना लहरों का   

मन भी दिखाता है एक दुनिया 

विचारों, भावनाओं की 

पर उससे निर्लिप्त नहीं रह पाता 

यही तो माया है !


सोमवार, अक्टूबर 4

अनंत के दर्पण में

अनंत के दर्पण में 


अंतर के तनाव को 

आत्मा के अभाव को 

भावों का रूप बनाकर  

कविता रचती है !

मानो पंक में कमल उगाती  

जीवन में कुछ अर्थ भरती है !

इस अंतहीन दुनिया में 

अरबों मस्तिष्कों के 

 साथ, एक नाता बांधती  

ज्यों अधर में ठहरती है !

अनंत के दर्पण में 

अनायास ही संवरती

बार-बार सच का सामना कराती  

जो अवाक कर दे 

वही बात सुनाती है !

अनावृत हो आत्मा 

गिर जाएँ सारे आवरण 

तभी वह उतरती  

डोलते हुए भंवर में 

टिकने को थल देती है !


मंगलवार, दिसंबर 22

जब नया साल आने को है

जब नया साल आने को है 
 हर भोर नयी हर दिवस नया 
हर साँझ नयी हर चाँद नया,
हर अनुभुव भी पृथक पूर्व से 
हर स्वप्न लिए संदेश नया !

हम बंधे  हुए इक लीक चलें 
प्रतिबिम्ब कैद ज्यों दर्पण में,
समय चक्र आगे बढ़ता पर 
ठिठक वहीं रह जाते तकते !

नयी चुनौती, नव उम्मीदें 
करें सामना नई ललक से, 
बीता कल जो कहीं खो गया 
आने वाला उसे सराहें !

जब नया साल आने को है 
नव आशा ज्योति जगे उर में, 
जो सीख मिली धारें, मन को 
खोलें हर दिन नव चाबी से !


शुक्रवार, अगस्त 28

मन नदिया बन प्यास बुझाता

 मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख-दुःख रूपी तटों के मध्य 

मन की धारा बहती रहती, 

अभी कल्पना की तरंग है 

फिर स्मृति की लहरें उठतीं !

 

जुड़ी रहे यदि नदी स्रोत से 

निर्मल अविरल गतिमय रहती, 

दर्पण सी उसकी काया में 

छवि जग की प्रतिबिम्बित होती !

 

बिछड़ गयी जो अपने घर से 

मरुथल में जाकर खो  जाती, 

या फिर कोई सरवर, पोखर 

बनकर सीमित, दूषित होती !

 

किन्तु कहीं भी कैसा भी हो 

जल तो जल है पथ पायेगा,

तप कर कोई बादल बनकर 

बरस शिलाओं पर जायेगा !

 

मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख की सुंदर फसल उगाता,

वही हुआ दूषित माया से 

जंगल दुःख के भी पनपाता !

 

चंचल मीन भावनाओं की 

क्रोध, बैर के ग्राह तैरते, 

मन तो मन है पल-पल बदले 

लोभ, मान के भँवरे पड़ते !

 

मन ही राम कृष्ण को चाहे 

मन ही बन मन्थरा सिखाये, 

जग को बैरी कभी मानता

गीत कभी उसके ही गाये !


शनिवार, जून 6

वाणी

वाणी 


वाणी का वरदान मिला है 
मानव को !
पर अभिशाप बना लेता है 
व्यर्थ, असत्य, कटु वचनों से 
निज खाते पाप लिखा लेता है 
लहजे में यदि  छिपी शिकायत 
स्वयं की कमजोरी ही झलके  
या तेजी हो शब्दों में तो 
मन की अस्थिरता ज्यों ढलके 
रोषपूर्ण यदि वचन निकलते 
अहंकार का खेल चल रहा 
घुमा-फिरा कर बात कही तो 
मन अनजाना खुद को छल रहा 
स्वयं की राय थोपने जाता 
मन खुद उसमें धँसता जाता 
जब तक दर्पण नहीं बनेगा 
जग जैसा है उसमें आखिर 
कैसे वैसा ही झलकेगा ? 

मंगलवार, अप्रैल 14

उर दर्पण में उसको देखा

उर दर्पण में उसको देखा 


उर दर्पण में ‘उसको’ देखा 
‘उसको’ यानि स्वयं को देखा,
आश्वस्ति की लहर छू गयी
जब-जब भीतर जाकर देखा !

पहले-पहले गहन बवंडर 
झंझावात बहुत उठेंगे, 
अनजाने रस्तों पर मन के 
बीहड़ कंटक पाहन होंगे !

लेकिन दूर कहीं से कोई 
झरने की कल-कल भी आती, 
कभी किसी पंछी की कुह-कुह
मधुरिम कोई प्यास जगाती !

निकट कहीं ही वह बसता है 
श्रद्धा दीप न बुझने पाए, 
बढ़ता रहे निरन्तर राही 
मंजिल इक दिन सम्मुख आए !

एक झलक जो भी पा लेता 
जग में नहीं अजनबी रहता,
पर्वत नदिया बादल उपवन 
सबसे दिल का नाता बनता ! 

कुदरत से संघर्ष नहीं हो 
मानव उसका एक अंश है, 
माँ से दूर गया हो बालक 
चुभता उर में सदा दंश है !

अवसर एक हाथ आया है 
अंबर से हम नाता जोड़ें, 
धरती पर जब पाँव धरें तो 
माँ कहकर ही नमन भी करें ! 

गुरुवार, मार्च 26

प्रकृति और मानव

प्रकृति और मानव 

एक मास्टर स्ट्रोक मारा उसने 
और बता दिया... कौन है मालिक ?
चेतावनी दी थी 
सुनामी भेजी, कई तूफान भेजे
भूमिकम्प में भी राज खोला था 
इबोला में भी वही बोला था 
पर हमारे कान बहरे थे 
नहीं सुनी हमने प्रकृति की पुकार 
जो लगा रही थी वह बार बार 
जारी रखा अपनी कामनाओं का विस्तार 
भूल गए अपने ही स्रोत को 
भूल गए कि.. हम प्रकृति के स्वामी नहीं 
हैं उसका ही अंग  
सुविधाओं के लोभ में  निरंकुश दोहन कर, 
कर रहे खुद से ही जंग  
जंगल खत्म हो रहे और 
हवा में घुलता जा रहा था जहर 
 सागरों की अतल गहराई तक प्लास्टिक का कचरा 
अब बैठे हैं अपने-अपने घरों में 
नहीं भर रहे नालियों में पॉलीथिन, प्लास्टिक के ग्लास और कटोरे 
बन्द है पार्टियों में व्यर्थ का आडम्बर 
कुछ दिनों के लिए ही सही 
जो भी व्यर्थ है, वह हमसे छुड़वाया जा रहा है 
कोरोना के बहाने हमें दर्पण दिखाया जा रहा है !

सोमवार, दिसंबर 23

मन इक बगिया सा खिल जाता

मन इक बगिया सा खिल जाता



निज के मुखड़े पर धूल लगी
दर्पण को दोष दिए जाते
हिंसा जब मन में बसती हो
अवसर भी उसके मिल जाते

स्वीकार किया जिस क्षण सच को
झर जाता हर संशय उर से
मन इक बगिया सा खिल जाता
मिटते बादल भय के डर के

अपने वैभव को जला दिया
जिस क्षण हिंसा का साथ दिया
कटुता जो सही नहीं जाती
खुद में थी जग को दोष दिया

कितने कलुषित वे क्षण होंगे
जिनमें विद्वेष पला करता
भुला अस्मिता गौरव निज का
मानव हर बार छला जाता

गुरुवार, नवंबर 9

एक निपट आकाश सरीखा



एक निपट आकाश सरीखा



नयन खुले हों या मुँद जाएँ
जीवन अमि अंतर भरता है,
मन सीमा में जिसे बांधता
वह उन्मुक्त सदा बहता है !

चाह उठे उठ कर खो जाये
दर्पण बना अछूता रहता,
एक निपट आकाश सरीखा
टिका स्वयं में कुछ ना कहता !

अकथ कहानी जिसने बाँची
चकित ठगा सा चुप हो जाता,
जाने कितने वेष धरे हैं  
युग युग स्वयं को दोहराता !   

शुक्रवार, फ़रवरी 3

चाँद झलकता है


चाँद झलकता है 

जब सो जाती है झील 
नहीं उठती कोई भी लहर 
उसके आंचल पर 
तब चाँद झलकता है 
बिखर जाती है ज्योत्स्ना 
और भर जाती सुवास 
पर हल्की सी लहर भी 
तोड़ देती है प्रतिबिम्ब  
बिखर जाती चांदनी 
खो ही जाती है 
उथल-पुथल में 
थम जाए पल भर मन 
कुछ भी  न आने दें 
मध्य में अपने और उसके 
फिर होगा मिलन 
थिर होगा जब अंतर का दर्पण  !

शनिवार, दिसंबर 31

नये वर्ष में गीत नया हो


नये वर्ष में गीत नया हो 


राग नया हो ताल नयी हो 
कदमों में झंकार नयी हो, 
रुनझुन रिमझिम भी पायल की 
उर में  करुण पुकार नयी हो !

अभी जहाँ पाया विश्राम 
 बसते उससे आगे राम, 
क्षितिजों तक उड़ान भर ले जो 
पंख लगें उर को अभिराम !

अतल मौन से जो उपजा हो 
सृजें वही मधुर संवाद,
उथले-उथले घाट नहीं अब 
गहराई में पहुंचे याद !

नया ढंग अंदाज नया हो 
खुल जाएँ सिमसिम से द्वार 
नये वर्ष में गीत नया हो
बहता वह बनकर उपहार !

अंजुरी भर-भर बहुत पी लिया  
अमृत घट वैसा का वैसा,
अब अंतर में भरना होगा 
दर्पण में सूरज के जैसा !




शुक्रवार, दिसंबर 16

दृष्टि धूमिल मोहित है मन

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 

 किसी-किसी दिन झूठ बोलता लगता दर्पण
नयन दिखाते वही देखना चाहे जो भी मन !

दृष्टि धूमिल मोहित है मन 
धुंधला-धुंधला सा संसार,
प्रिय को महिमामंडित करता 
छलक रहा जब अंतर प्यार !

सत्य छिपा ही रहता इक तरफ़ा जब अर्पण 
श्रवण सुनाते वही सुनना चाहे जो भी मन !

पक्षविहीन खड़ा  हो जग में 
शक्तिहीन के लिए असम्भव,
झुक जाता है निज पक्ष में 
झेल आत्मा का पराभव !

थोड़े में सन्तुष्ट हुआ जो काट सके न बंधन 
बुद्धि सुझाती वही जानना चाहे जो भी मन !


सोमवार, अगस्त 4

दर्पण सा खाली रहता है



दर्पण सा खाली रहता है



शब्द कहाँ वह कह पाएंगे
हर पल जो अस्तित्व गा रहा,
पत्ता-पत्ता, कण-कण भू का
भर-भर जो भी दिए जा रहा !

अंकुर फूटा कोख धरा की
देखो कैसे बढ़ता पादप,
माटी रूप बदलती कितने
रस, गंध की झरती गागर !

दर्पण सा खाली रहता है
लाखों रूप नाम गढ़ जाता,
जीवन रस प्रतिक्षण बहता है
कभी स्रोत न होता रीता !

उसी मौन में जग जाये जो
हर सलीब उतर जाती है,
किरणों के संग जगता सोता
नव चन्द्रिमाँ झर जाती है !



शनिवार, सितंबर 21

किसने कहा होगा

किसने कहा होगा ?


पुकारो ! एक बार फिर
 मेरा आधा-अधूरा नाम
उन तमाम हसरतों के साथ
पुकारो कि मेरा वजूद सही हो मन को
सोच के तानो-बनों में अटका
फिर खो गया है

संवारो
संवारो मेरे बिखरे पलों को
उलझी लटों की तरह
 संवारो कि अपनी सूरत देख तो लूँ
 जो टूटे दर्पण में मन के
टुकड़े टुकड़े हो गयी है 

शनिवार, जुलाई 21

कैसे कोई बच सकता है


कैसे कोई बच सकता है


पलकों पे थमे झट से न गिरे
वे दो कतरे आँसू के झरे
मन भीग गया..
प्राची में जब फूल उगे
हिम शिखरों पर चांदी बिखरे
पिघले सोना सागर में जब
अवाक् हुआ मन भीग गया..

पर्वत पर छाया है किसकी
यह तुमुलनाद नभ में किसका
उन आँखों में यह कौन दिखा
मुस्कानों में झलकें किसकी
छोटा-छोटा खंड-खंड सा
वह तो मिलता ही रहता है
सोच यही मन भीग गया..

दर्पण में है सूरत किसकी
झील में ज्यों चाँद गगन का
छोटे छोटे अनुभव उसके
पर सारा का सारा वह है
बस देख यही मन भीग गया..

कैसे कोई बच सकता है
वही-वही तो चारों ओर
टुकड़ा-टुकड़ा खुद को देता
टुकड़ों में वह ही पाता है
वरना वह तो सदा बुलाए
जान यही मन भीग गया.. 

शुक्रवार, फ़रवरी 24

देखो कोई ताक रहा है


देखो  ! कोई ताक रहा है


सम्मुख आने से घबराए

आहट भर से झट छुप जाए,

उर के भीतर से ही देखे

चुपके-चुपके झांक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


पर्दे के पीछे वह रहता

सारी नादानी को सहता,

पल-पल छिन-छिन गुपचुप निशदिन

चलता उसका चाक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


लुका छिपी का खेल चल रहा

यूँ हर पल ही मेल हो रहा,

दर्पण यह मन बन ना जाए 

तब तक जीवन खाक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


दृश्य वही द्रष्टा भी वह है

फिर भी पटल  मध्य में डाला,

कैसा खेल रचाया माधव

अनुपम, अद्भुत आंक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है

 

प्रेम धार जब दिल में बहती

तब सारे पर्दे गिर जाते,

प्रकट हुआ वह छिप न सके तब

प्रेमी-प्रियतम आप रहा है !


देखो ! कोई ताक रहा है


जब प्रियतम भी खो जाता है

शेष प्रेम ही प्रेम रहे उर, 

न प्याला न मधु ही बचता, बस 

मदहोशी का आक रहा है !

 

देखो  ! कोई ताक रहा है