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बुधवार, जून 4

अपना सा दर्द




अपना सा दर्द 

फिर वही झूला, वही ढलती हुई शाम है
कई दिनों बाद मिली दिल को फुर्सत, आया आराम है
आसमां चुप है सलेटी सी चादर ओढ़े
पेड़ खामोश है, हवा भी बंद, नहीं कोई धुन छेड़े
एक खलिश सी भीतर कोई अपना बीमार है
दुआ के सिवा दे न सकें कुछ ये हाथ लाचार हैं
लो एक कार की रफ्तार से पत्तों में हरकत आयी
हिल-हिल के जैसे भेज रहे उसे दवाई
जीवन है तभी तक दिल धड़कते हैं
रोते हैं, हँसते हैं साथ बड़े होते हैं
दो हैं कहाँ जो कोई असर हो दिल पे किसी की बात का
दो हैं कहाँ जो दूजा लगे, अपना सा दर्द है जज्बात का
दुःख कहने से जो भीतर कसक उठती है वह अहम है
या कोई आजमाया हुआ वहम है

सोमवार, मार्च 21

एक हँसी भीतर जागी थी

एक हँसी भीतर जागी थी 

 

नयन टिके हैं सूने पथ पर 

किसकी राह तके जाता मन,

खोल द्वार दरवाजे बैठा

किसकी आस किये जाता मन !

 

एक पाहुना आया था कल

एक हँसी भीतर जागी थी,

हुई लुप्त फिर घट सूना है

फिर से इक मन्नत माँगी थी !

 

हर आहट पर चिहुँक ताकता 

किसकी बाट जोहता हर पल,

किसकी याद सँजोये बैठा

किसकी चाह किये जाता मन !

 

मिला बहुत पर नहीं वह मिला

बन बसंत जो साथ सदा हो,

स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  

शीतल सुरमय  मधुर राग हो  !

 

किसको यह आवाज लगाये

किसकी नजरों को तरसे मन, 

फीका जग का हर रस लगता 

किसकी प्यास भरे जाता मन !


शुक्रवार, जुलाई 7

यहाँ दो नहीं हैं


यहाँ दो नहीं हैं

हर बार जब मैंने तुम्हें चाहा है
खुद को ही पसंद किया है
हर बार जब तुम्हारी किसी बात को सराहा है
अपनी पीठ थपथपाई है
हर कोई खुद से प्यार करे
तो कितनी हसीन हो जाये यह दुनिया
हर बार जब मैं तुम से दूर हुई
खुद से ही दूर हुई हूँ
हर शिकायत जो मैंने तुमसे की है
दरअसल वह अपने आप से की है
हर शूल जो मैंने तुम्हें चुभोया है
मेरे ही दिल में घाव बनकर कसक दे गया है
यहाँ हर कोई खुद से ही मुखातिब है
हम स्वयं को नहीं चाहते  
और इल्जाम दूसरों पर लगाये जाते हैं
खुद को सीधे-सीधे सता भी तो नहीं सकते
किसी के द्वारा खुद को सताये जाने का
इंतजाम भी खुद ही कर लेते हैं
यहाँ दो नहीं हैं
तुमसे जुड़ी हर बात खुद से ही जुड़ी थी
यहाँ केवल तुम ही तुम हो या केवल मैं ही मैं
यहाँ दो नहीं हैं !