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बुधवार, दिसंबर 6

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


भरें न कल्पना की उड़ानें 

कैसे नये क्षितिज पायेंगे ? 

नियत सोच में सिमटे रहकर 

बस पुरातन दोहरायेंगे !


जहाँ अनंत कपाट खुले हों 

कैसे कोई घर में बैठे, 

महासमंदर ठाँठे मारे 

क्यों न मुसाफ़िर गहरे पैठे !


पलकों में सपने तिरतें हों 

अंतर भरे उमंग उल्लास, 

अधरों पर हों गीत मिलन के 

जागा रहे पल-पल विश्वास !


दूरी नहीं जरा भी उससे 

जिसका पथ ये कदम ढूँढते, 

अहर्निशम् दीपक जलता है 

नयन मुँदे हों या हों जगते !


कोकिल और पपीहा प्यासे 

अब भी लगन जगे अंतर में, 

चातक तकता नील गगन को 

अब भी मोर नाचते वन में !


जीवन दे उपहार अनोखे 

अपनी ही झोली क्यों ख़ाली, 

सब दे कर भी कभी न चुकता

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली ! 


गुरुवार, अक्टूबर 19

अनजाने पथ पर वह सहचर

अनजाने पथ पर वह सहचर

नव सृजन घटे नव द्वार खुलें

 कदम पड़ेगा जब अनंत का,

नूतन राग जगेंगे,  जैसे 

 शीश उठाये कोमल दूर्वा !


नव भाषा, नव छंद, शब्द नव 

है अपार उसका भंडारा,  

मिलकर जिससे जीवन जी ले 

मिले सदा के लिए सहारा !


पुष्प खिलेंगे जब श्रद्धा के 

 इक अभिनव मुस्कान उठेगी, 

हर लेगी हर तमस भाव वह 

शुभ्र ज्योत्सना छा जाएगी !


चहुँ दिशाओं में गुंजित सदा 

  तान नशीली प्रेम की अमर, 

हाथ पकड़ कर ले जाता है 

अनजाने पथ पर वह सहचर !


अंतर्यामी मन का वासी 

जो आह्लादित पल-पल रहता, 

अति निकटता के क्षण में कभी  

मौन मुखर उसका हो जाता !


 अपना वही नहीं जो सपना 

हाथ बढ़ाकर छूलें जिसको, 

जिसके होने से ही जग है 

कैसे भला बिसारें उसको !


मंगलवार, दिसंबर 6

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी 


झांक रहा कोई भीतर से 

भारी पर्दे क्यों लटकाए, 

बाहर अबद्ध  गगन बुलाता 

  पिंजरे में विहग घबराए !


विमुक्त करो मानस शक्ति को 

जो अनंत बन खिलना चाहे, 

संकरे पथ सीली धरा  को 

तज भूमा से मिलना चाहे !


वक्त बीतता जाता है अब 

पल भर भी की ना  देर करो, 

रस्ता दो उर की  नदिया को 

अब सिंधु मिलन की टेर भरो !


पलकों में सुख  स्वपन क़ैद हैं 

हृदय कमल भी सुप्त हैं अभी, 

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी 

गहन तिमिर में पड़े हैं सभी !


अब राहों को खुद गढ़ना है 

नियति स्वयं  हाथों में लेकर, 

सोए-सोए युग बीते हैं 

स्वर्णिम पथ पर जाना जगकर !




शुक्रवार, सितंबर 2

रास्ते हैं, यह बहुत है

रास्ते हैं, यह बहुत है
 

​​मंज़िलें हों दूर कितनीं  

मंज़िलें हैं, यह बहुत है, 

चल पड़े हैं ग़म नहीं अब 

रास्ते हैं, यह बहुत है !


पथ कँटीला पाँव हारे 

जोश दिल में, यह बहुत है, 

नज़र न आए तो क्या है 

साथ है तू, यह बहुत है !


इक अनोखी चीज़ दुनिया 

जश्न मनते, यह बहुत है, 

कब किसी की हुईं पूरी 

चाहतें हैं, यह बहुत है !


उम्र केवल एक गिनती 

बचपन जवाँ, यह बहुत है, 

अजनबी कोई नहीं अब 

तू यहीं है, यह बहुत है !




सोमवार, मार्च 21

एक हँसी भीतर जागी थी

एक हँसी भीतर जागी थी 

 

नयन टिके हैं सूने पथ पर 

किसकी राह तके जाता मन,

खोल द्वार दरवाजे बैठा

किसकी आस किये जाता मन !

 

एक पाहुना आया था कल

एक हँसी भीतर जागी थी,

हुई लुप्त फिर घट सूना है

फिर से इक मन्नत माँगी थी !

 

हर आहट पर चिहुँक ताकता 

किसकी बाट जोहता हर पल,

किसकी याद सँजोये बैठा

किसकी चाह किये जाता मन !

 

मिला बहुत पर नहीं वह मिला

बन बसंत जो साथ सदा हो,

स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  

शीतल सुरमय  मधुर राग हो  !

 

किसको यह आवाज लगाये

किसकी नजरों को तरसे मन, 

फीका जग का हर रस लगता 

किसकी प्यास भरे जाता मन !


शुक्रवार, अगस्त 6

मौन समर्पण



मौन 


प्रकाश कहा नहीं जाता 

अंधकार की कहे कौन ?

असीम शब्दों में नहीं समाता 

अच्छा है रहें मौन 

 मुखर जब मौन होगा 

सुवास बन खुद बहेगा 

चकित हुआ मन जहाँ 

मधु रस में पगेगा 



समर्पण 


हो समर्पित उर उन्हीं चरणों पे ऐसे 

धूलि जिनकी करे पावन 

बन सके फिर मन यह दर्पण 

 झलक जाए जग यह सारा 

पर छू न पाए एक कण भी 

तैरता इक जल के ऊपर 

हो अछूता कमल जैसे 

हो समर्पित उर किन्हीं कदमों में ऐसे 

मार्ग पाए चल पड़े फिर 

भूलकर सारी व्यथाएँ 

एक ही पथ चुन ले राही 

 कदम फिर उस पर बढ़ा दे  

इक तने पर खड़ा है वट 

अनगिनत शाखाएँ धारे 


सोमवार, जुलाई 6

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 

हर कदम पर कौन हमसे पूछता है 
श्रेय का या प्रेय का तुम मार्ग लोगे, 
बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 
प्रेय के पथ पर कदम रखते रहे हैं !

चन्द कदमों तक हैं राहें अति कोमल 
फूल खिलते और निर्झर भी बिखरते, 
किन्तु आगे राह टेढ़ी है कँटीली 
दिल हुए आहत जहाँ रोते रहे हैं !

फिर कहीं से इक जरा आवाज आती 
प्रेय का तज श्रेय का हम मार्ग लेते, 
झेलते दुश्वारियां थोड़ी शुरू  में 
चैन की फिर नींद हम सोते रहे हैं !

सत्य का पथ, प्रेम का पथ श्रेय का है 
आज दिल पर हाथ रखकर यह शपथ लें, 
प्रेय जो लगता नयन को छल निकलता 
पथ वही शुभ श्रेय ही जिसमें छुपा है !

शुक्रवार, नवंबर 29

निशदिन बँटता जाता है वह



निशदिन बँटता जाता है वह



चाँद, सितारे, सूरज मांगे
वही बने हकदार ज्योति के,
काली रातें आँसू चाहे
कैसे  बिछें उजाले पथ में !

निशदिन बँटता जाता है वह
खुद ही तो जड़-चेतन होकर,
अनगिन बार मिला है सब कुछ
फिर-फिर द्वार खड़े सब खोकर !

कितनी बार ख़ुशी छलकी थी
अंतर प्रेम जगाया  सुंदर,
कितने मीत बनाए जग में
कितने गीत रचे थे मनहर !

जितना पाया वह क्या कम था
तुष्टि पुष्प खिला नहीं अब तक,
हो कृतज्ञ कहाँ छलके अश्रु
फिर भी देते जाता है रब !

जो भी जिसने माँगा जग में
अकसर वही वही पाया है,
जितना बड़ा किसीका दामन
उतना उसी में समाया है !


गुरुवार, दिसंबर 15

निज पैरों का लेकर सम्बल


निज पैरों का लेकर सम्बल


कितनी बार झुकें आखिर हम 
कितनी बार पढ़ें ये आखर,
जीवन सारा यूँ ही बीता 
रहे साधते वीणा के स्वर !

श्वास काँपती मन डोलता 
हौले-हौले सुधियाँ आतीं,
कितनी बार कदम लौटे थे 
रह-रह वे यादें धड़कातीं !

निज पैरों का लेकर सम्बल
इक न इक दिन चढ़ना होगा,
छोड़ आश्रय जग के मोहक 
सूने पथ पर बढ़ना होगा !

कितने जन्म सोचते बीते 
जल को मथते रहे बावरे,
कब तक स्वप्न देख समझाएँ 
कब तक राह तकें सांवरे ! 

सोमवार, जुलाई 1

पिता की स्मृति में


पिता की स्मृति में


एक आश्रय स्थल होता है पिता
बरगद का वृक्ष ज्यों विशाल
नहीं रह सके माँ के बिना
या नहीं रह सकीं वे बिना आपके
सो चले गये उसी राह
छोड़ सभी को उनके हाल....

पूर्ण हुई एक जीवन यात्रा
अथवा शुरू हुआ नवजीवन
भर गया है स्मृतियों से
मन का आंगन
सभी लगाये हैं होड़ आगे आने की
लालायित, उपस्थिति अपनी जताने की
उजाला बन कर जो पथ पर
चलेंगी साथ हमारे
बगीचे से फूल चुनते
सर्दियों की धूप में घंटों
अख़बार पढ़ते
नैनी के बच्चे को खिलाते
मंगलवार को पूजा की तैयारी करते
जाने कितने पल आपने संवारे....

विदा किया है भरे मन से
काया अशक्त हो चुकी थी
पीड़ा बनी थी साथी
सो जाना ही था पंछी को
 छोड़कर यह टूटा फूटा बसेरा
नये नीड़ की तलाश में

जहाँ मिलेगा एक नया सवेरा... 

(पिछले माह १८ जून को ससुर जी ने देह त्याग दिया, काशी में उनको अंतिम विदाई देकर आज ही हम लौटे हैं)