कुछ ऐसा है कि
आँखें बाहर देखती
हैं
मन संसार की
सुनता है
कान शब्दों में
डूबे हैं
और वह भीतर बैठा
है !
फिर इसमें कैसा
आश्चर्य ?
हम कभी उससे मिले
नहीं...
अजनबियों के साथ
ही जीवन बिताया
तभी संग रहकर
सबके.. सबने खुद को
नितांत अकेला ही
पाया !
इसको कभी उसको
अपना भी बनाया
पर अपना सा जहाँ
में.. एक ना आया
जिसकी तलाश है वह
तो कहीं और है
दूर है वहाँ
से..अपना जहाँ ठौर है !
फूलों को सराहा
निर्झरों को चाहा
कभी झलक मिली एक
पलकें भी मुंदीं
एक किरण रोशनी..
जाने क्या कर गयी
उस ने ही शुभ घड़ी
भेजा था पैगाम
सीता का राम वह
या राधा का श्याम !
