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मंगलवार, अप्रैल 6

कोरोना काल

कोरोना काल 

यह भय का दौर है 

आदमी डर रहा है आदमी से 

गले मिलना तो दूर की बात है 

डर लगता है अब तो हाथ मिलाने से 

 घर जाना तो छूट ही गया था

 पहले भी अ..तिथि बन  

अब तो बाहर मिलने से भी कतराता है 

एक वायरस ने बदल दिए हैं सारे समीकरण 

दूरी बनी रहे किसी तरह 

इसका ही बढ़ रहा है चलन 

डरा हुआ आदमी हर बात मान लेता है 

बिना बुखार के भी गोली फांक लेता है 

सौ बार धोता है हाथ 

नकाब पहन लेता है 

वरना एक को हुआ जुकाम तो 

सारा घर कैदी हो जाता है 

घर में अजनबी बन जाते हैं लोग अब 

दूसरे कमरे में बैठी 

माँ मानो चली गई हो दूसरे गाँव 

इस डर ने छीन ली है आजादी 

छीन ली है खुले बरगद की छाँव 

 दौर ही ऐसा है 

यह डरने और डराने का

यहाँ बस काम से काम रखना 

किसी की ओर नजर भी नहीं उठाने का ! 


 

शनिवार, जून 15

कुछ ऐसा है कि




कुछ ऐसा है कि


आँखें बाहर देखती हैं
मन संसार की सुनता है
कान शब्दों में डूबे हैं
और वह भीतर बैठा है !

फिर इसमें कैसा आश्चर्य ?
हम कभी उससे मिले नहीं...
अजनबियों के साथ ही जीवन बिताया
तभी संग रहकर सबके.. सबने खुद को
नितांत अकेला ही पाया !

इसको कभी उसको अपना भी बनाया
पर अपना सा जहाँ में.. एक ना आया
जिसकी तलाश है वह तो कहीं और है
दूर है वहाँ से..अपना जहाँ ठौर है !

फूलों को सराहा निर्झरों  को चाहा
कभी झलक मिली एक पलकें भी मुंदीं
एक किरण रोशनी.. जाने क्या कर गयी
उस ने ही शुभ घड़ी भेजा था पैगाम
सीता का राम वह या राधा का श्याम !


मंगलवार, दिसंबर 6

बस वही खिल मुस्कराया

बस वही खिल मुस्कराया


एक रिश्ता दोस्ती का
 फलसफा यह जिंदगी का,
खूबसूरत सा जहाँ  यह
एक नाता हो ख़ुशी का !

अजनबी बनकर रहा जो
भेंट आँसूं , दर्द पाया,
घर बनाया जग को जिसने
बस वही खिल मुस्कराया !

चाँद-तारे गा  रहे यह
फूल, पंछी भी सुनाते,
झोलियाँ भर गीत उर में
हर घड़ी वे गुनगुनाते !

बह  रहा अंतर गुहा से
एक निर्झर  प्रीत का है,
द्वार खुलते ही मिलेगा
पाहनों से जो ढका है  !

सुन रही सारी  दिशाएँ
खोल दें अरमान दिल के,
बाँह  फैलाये खड़ा वह
निकट आ जाएगा चल के !