सच
यहाँ अपना कुछ भी नहीं है
काया यह कुदरत से मिली
मन माया भी जिसमें खिली
भाषा ज्ञान मिला जगत से
जग से ही पाया जब सब कुछ
यहाँ खोना कुछ भी नहीं है
बस एक अहसास है, होने का
वह कौन है ? कोई क्या माने
कभी रस धार मन में फूटती सी
कहाँ हैं स्रोत ? कोई क्या जाने
कभी इक दर्द भी दिल में समाता
जहाँ में दुःख बहुत देखा न जाता
हुआ है मौन मन ! अब क्या कहे यह
अजाना है सफर ! जाना किधर !
न कोई यह बताता
इशारों में ही, सूनी राह पर, लिए है जाता
मगर हर बार गिरने से भी वह ही बचाता
फ़िकर किसको ? जब पाना कुछ भी नहीं है
यहाँ अपना कुछ भी नहीं है !
