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बुधवार, फ़रवरी 9

सच

सच  

यहाँ अपना कुछ भी नहीं है 

काया यह कुदरत से मिली   

मन माया भी जिसमें खिली 

भाषा ज्ञान मिला जगत से 

जग से ही पाया जब सब कुछ

यहाँ खोना कुछ भी नहीं है 

बस एक अहसास है, होने का 

वह कौन है ? कोई क्या माने 

कभी रस धार मन में फूटती सी 

कहाँ हैं स्रोत ? कोई क्या जाने 

कभी इक दर्द भी दिल में समाता  

जहाँ में दुःख बहुत देखा न जाता 

 हुआ है मौन मन  ! अब क्या कहे यह 

अजाना है सफर !  जाना किधर ! 

न कोई यह बताता 

इशारों में ही, सूनी राह पर, लिए है जाता 

मगर हर बार गिरने से भी वह ही बचाता 

फ़िकर किसको ? जब पाना कुछ भी नहीं है 

यहाँ अपना कुछ भी नहीं है !


मंगलवार, मार्च 9

नीलगगन सी विस्तृत काया

नीलगगन सी विस्तृत काया 


एक शून्य है सबके भीतर

एक शून्य चहुँ ओर व्यापता, 

जाग गया जो भी पहले में 

दूजे में भी रहे जागता !


शून्य नहीं वह अंधकार मय 

ज्योतिर्मयी प्रभा से मंडित, 

पूर्ण सजग हो रहता योगी 

निज आभा में होकर प्रमुदित !


 उसी शून्य का नाम सुंदरम्

प्रेम-ज्ञान की जो मूरत है, 

परम अनादि-अनंत तत्व शिव 

अति मनहर धारे सूरत है !


रखता तीन गुणों को वश में  

मन अल्प, चंद्रमा लघु धारे, 

मेधा बहती गंगधार में 

भस्म काया पर, सर्प धारे !


नीलगगन सी विस्तृत काया 

व्यापक धरती-अंतरिक्ष में,  

शिव की महिमा शिव ही जाने 

शक्ति है अर्धांग  में जिसको !