स्मृति का देवदूत
याद के घट में प्रीत की नमी
भरके जब दिल के करीब लाई ही थी वह
क्षण भर भी नही लगा
बादल छा गये अंतर आकाश पर
ऐसा खामोश अंधड़ उठा भीतर
चुप्पी की गर्जना हुई
दामिनी दमकी टीस सी
और तभी कूकने लगी कोयल सी धारा
नृत्य जगा शांत कदमों में
हँसी जो बाहर नहीं सुनी किसी ने
पर गूंज उठा अंतर उपवन
कोलाहल बहुत था
उमड़ती भाव रश्मियों का
स्पंदनो और कम्पनों का
अनसुना नहीं रहा होगा किसी के तो कानों से
दूत बन कर जो आया था स्मृति का
ठगा सा तकता रहा निर्निमेष !
