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शुक्रवार, सितंबर 19

दुख या प्रेम

दुख या प्रेम 


दुख का अंत कैसे होता है ?

क्या ऐसा कभी हुआ भी है ?

या हो सकता है ?


हाँ, यह संभव है

प्रेम में !

पर इसके लिए

रहना होगा शुद्ध वर्तमान में

जहाँ कोई विचार नहीं 

स्मृति नहीं 

चाह नहीं 

प्रतिरोध नहीं 

भीतर कोई गति नहीं 

वहीं तो प्रेम ‘है’ !


दुख अभाव से उपजता है 

अभाव केवल एक विचार है 

क्योंकि उसका ‘होना’ सदा है 

उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता 

उसमें से कुछ घटाया नहीं जा सकता 

होना और न होना दोनों में 

कोई मेल नहीं !

उनके मध्य नया कुछ भी नहीं 

या तो सब अतीत है

या बस शुद्ध ‘अब’ 

‘होना’ पूर्ण है 

प्रेम के लिए ‘होना’ ज़रूरी है और 

होने के लिए विचार से स्वतंत्रता 

अंततः स्वतंत्रता ही प्रेम है !


सोमवार, जुलाई 4

अनजानी राहों से आकर


अनजानी राहों से आकर 

एक बात भूली बिसरी सी 
एक स्वपन चिर काल पुराना,
एक तंतु जो जोड़े तुझ से 
मधुरिम स्मृति की बहती धारा !

कोई  है जो छिपा हुआ भी 
जैसे चारों ओर बिछा है, 
शब्दों  की गहराई में जो 
मीलों मधुर मौन फैला है !

सुरभि लिए पवन  का झोंका
ज्यों उसका संदेशा लाये, 
कोयल की मधु कूजन जैसे 
सुमिरन की माला सी गाये !

कोई तार जुड़ा है जैसे 
मन क्यों उसकी राह ताकता,
अनजानी राहों से आकर 
सुधिया अपनी फिर भर जाता !

जीवन कोई बंद द्वार ज्यों 
अपनी ओर बुलाता सबको, 
ज्यों उज्ज्वल उपहार प्रीत का 
सहज बँट रहा पालो इसको !

मंगलवार, जनवरी 18

यह पल

यह पल 


माना अनंत युग पीछे हैं 

और इतने ही आगे हमारे 

किंतु यह क्षण 

न कभी हुआ न होगा दोबारा 

हर दिन नया है 

हर घड़ी पहली बार भायी है 

चक्र घूम चुका हो चाहे कितनी बार 

पर हर बार बरसात 

किसी और ढंग से आयी है 

स्मृतियों का बोझ न रहे सिर पर 

न भावी का कोई डर 

इस पल में ही जी लें और मरना पड़े तो जाएँ मर 

हर क्षण हमें पूरा ही चाहता है 

पूर्ण होकर ही पूर्ण से मिला जा सकता है 

हरेक फूल द्वारा 

अपनी तरह से ही खिला जा सकता है 

इसलिए यह पल दर्द का है या ख़ुशी का 

अनमोल है 

वक्त के लम्बे दौर में 

न इसका कोई मोल है ! 


मंगलवार, जनवरी 19

बस इतना सा ही सरमाया

बस इतना सा ही सरमाया

गीत अनकहे, उश्ना उर की 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

काँधे पर जीवन हल रखकर 
धरती पर जब कदम बढाये 
कुछ शब्दों के बीज गिराकर  
उपवन गीतों से महकाए ! 

प्रीत अदेखी, याद उसी की 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

कदमों से धरती जब नापी
अंतरिक्ष में जा पहुँचा मन 
कुछ तारों के हार पिरोये 
डोल चन्द्रमाओं के सँग-सँग  ! 

कभी स्मृति कभी जगी कल्पना 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

मंगलवार, जनवरी 5

नींद में ही सही...

नींद में ही सही...
कुछ स्मृतियाँ कुछ कल्पनाएँ 
बुनता रहता है मन हर पल 
चूक जाता है इस उलझन में 
आत्मा का निर्मल स्पर्श....
 यूँ तो चहूँ ओर ही है उसका साम्राज्य 
 घनीभूत अडोल वह है सहज ही ज्ञातव्य 
 पर डोलता रहता है पर्दे पर खेल 
मन का अनवरत 
तो छिप जाती है आत्मा 
असम्भव है जिसके बिना मन का होना
उसके ही अस्तित्त्व से बेखबर है यह छौना
नींद में जब सो जाता है मन कुछ पल को 
आत्मा ही होती है भीतर 
तभी नींद सबको इतनी प्यारी है 
नींद में ही हो जाती है खुद से मुलाकात 
 पर अफ़सोस ! नहीं हो पाती तब भी उससे बात 
जागरण में तो दूर हैं ही उससे 
शयन में भी हो जाते हैं दूर उससे 
कब होगा वह ‘जागरण’ 
जब जगते हुए भी प्रकटेगी वह और नींद में भी.... 
 

गुरुवार, नवंबर 19

ढाई आखर प्रेम के

ढाई आखर प्रेम के


‘प’ से परस स्नेह भरा

आश्वस्त करता हुआ

भीतर की सारी शुभता को

प्रियतम में भरता हुआ

परख ले जो अंतर की अकुलाहट

पनपा दे अनायास ही मुस्कुराहट !

 

‘र’ से रमा हो कण-कण में अस्तित्व के

रमणीय हो उसके अपनेपन की आभा !

 

‘ए’ से एक की ही याद दिलाता

सारा द्वैत इक पल में मिट जाता !

 

‘म’ से माँ की तरह समेट ले विशाल हृदय में

मधुर बन पूर्ण करे हर अभाव प्रियस्पद का !

 

ऐसा निश्चछल प्रेम ही हर मन की आस है

जिसकी स्मृति ही भर देती जीवन में उजास है !

 

‘प’ से जब पाना ही होता है लक्ष्य

‘र’ बन जाता है रौरव

एषणायें जगाता

ममता की बेड़ियों में जकड़ा

प्रेम मुक्त नहीं करता

पीड़ा के फूल ही अंचल में भरता ! 

शुक्रवार, अगस्त 28

मन नदिया बन प्यास बुझाता

 मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख-दुःख रूपी तटों के मध्य 

मन की धारा बहती रहती, 

अभी कल्पना की तरंग है 

फिर स्मृति की लहरें उठतीं !

 

जुड़ी रहे यदि नदी स्रोत से 

निर्मल अविरल गतिमय रहती, 

दर्पण सी उसकी काया में 

छवि जग की प्रतिबिम्बित होती !

 

बिछड़ गयी जो अपने घर से 

मरुथल में जाकर खो  जाती, 

या फिर कोई सरवर, पोखर 

बनकर सीमित, दूषित होती !

 

किन्तु कहीं भी कैसा भी हो 

जल तो जल है पथ पायेगा,

तप कर कोई बादल बनकर 

बरस शिलाओं पर जायेगा !

 

मन नदिया बन प्यास बुझाता 

सुख की सुंदर फसल उगाता,

वही हुआ दूषित माया से 

जंगल दुःख के भी पनपाता !

 

चंचल मीन भावनाओं की 

क्रोध, बैर के ग्राह तैरते, 

मन तो मन है पल-पल बदले 

लोभ, मान के भँवरे पड़ते !

 

मन ही राम कृष्ण को चाहे 

मन ही बन मन्थरा सिखाये, 

जग को बैरी कभी मानता

गीत कभी उसके ही गाये !


रविवार, अगस्त 27

किसका रस्ता अब जोहे मन



किसका रस्ता अब जोहे मन

तू गाता है स्वर भी तेरे
लिखवाता नित गान अनूठे,
तू ही गति है जड़ काया में
सहज प्रेरणा, उर में पैठे !

किसका रस्ता अब जोहे मन
पाहुन घर में ही रहता है,
हर अभाव को पूर गया जो
निर्झर उर में वह बहता है !

तू पूर्ण हमें पूर्ण कर रहा
नहीं अज्ञता तुझको भाती,
हर लेता हर कंटक पथ का
स्मृति अंतर की व्यथा चुराती !

तिल भर भी रिक्तता न छोड़े
अजर उजाला बन कर छाया,
सारे खन्दक, खाई पाटे
समतल उर को कर हर्षाया !

इक कणिका भी अंधकार की
तुझ ज्योतिर्मय को न सुहाती,
एक किरण भी हिरण्यमय की
प्रतिपल यही जताने आती !

गुरुवार, फ़रवरी 25

उसका साथ


उसका साथ

एक अदृश्य हाथ सदा थामे रहता  
बढ़ो, तुम आगे बढ़ो !
कोमल स्पर्श उसका, सहला जाता  
छालों को पावों के
 स्मृति का आँचल समेट लेता
जब कभी बिखरते मोती मन के
जो सदा मित्र की तरह साथ दे   
उठा जमीन से बिठा फलक पर दे
एक खोल की तरह
वह छिपाए है अपने भीतर
उन्मुक्त होकर पर्वतों को लाँघ जाओ,
तेज बहती धार में भी या नहाओ !
उससे कुछ भी न बाहर है,
सब कुछ उसको ही जाहिर है
उसके कदमों पर अर्पित कर दो
अपनी मुस्कान की चमक
 धूपबाती बने स्वप्नों की महक
फौलादी इरादे ही आरती का थाल हो
जो सुनाया जाये उसको
अपने दिल की लगन से आगे
न कोई दूसरा हाल हो !

  


सोमवार, जुलाई 28

जहाँ मौसम बदलते नहीं

जहाँ मौसम बदलते नहीं


जहाँ कोई नहीं दूसरा
एक ऐसा भी देश है
जो नहीं धारण किया जाता प्रदर्शन के लिए
एक ऐसा भी वेश है
जहाँ टूट जाती हैं सब बेड़ियाँ
छूट जाती हैं रागात्मक छवियाँ
एक ऐसा भी प्रदेश है
जहाँ ठहर जाता है काल का रथ
ध्वनि का होता नहीं प्रवेश है
जहाँ नहीं कोई विरोध
जन्म लेती नहीं कोई कुंठा
कोई विडम्बना भी नहीं सताती
जहाँ दो न रहने से कोई स्मृति भी नहीं रह जाती
जहाँ खो जाती है अपनी छाया भी
नितांत एकांत ही जिसका होना है
एक ऐसा भी आदेश है
जहाँ मौसम बदलते नहीं पल-पल
जहाँ वसंत पतझड़ के आने की आहट नहीं देता
जहाँ बिन बरसे बादल कभी गुजरा ही नहीं
जहाँ नित एक रस मधुरता छायी है
जिसमें होना विपदा का मानो विदेश है
जहाँ निर्धूम अग्नि जलती है
 ज्योति की अखंड शिला पल-पल पिघलती है
जहाँ कोई मार्ग नजर नहीं आता
पर मंजिल हर कदम पर मिलती है
ऐसा भी एक स्वदेश है
जाना जहाँ संकट के मार्ग से गुजरना है
जहाँ टिकना तलवार की धार पर चलना है
 जो स्वयं को खो कर ही जाना जाता है
एक ऐसा भी महेश है !  


बुधवार, जून 11

घटता है जो इक ही पल में

घटता है जो इक ही पल में



कभी अचानक झर जाता ज्यों
 मेघ भरा हो भाव नीर से,
रिस जाता अमि अंतर घट का
रहा अछूता जो पीड़ा से !

सहज कभी पुरवाई बहती
खुल जाते सब बंद कपाट,
भीतर बाहर मधु गंध इक
उमड़ संवारे प्राण सपाट !

घोर तिमिर में द्युति लहर ज्यों
पथ प्रशस्त कर देती पल में,
भर जाता अनुराग अनोखा
कोई आकर हृदय विकल में !

मुस्काता ज्यों शशि झील में
झलक कभी आ जाती उसकी,
 स्मृति नहीं, ना ही भावना
घटता है जो इक ही पल में !

मंगलवार, जनवरी 21

नींद में ही सही...

नींद में ही सही...


कुछ स्मृतियाँ कुछ कल्पनाएँ
बुनता रहता है मन हर पल
चूक जाता है इस उलझन में
आत्मा का निर्मल स्पर्श....
 यूँ तो चहूँ ओर ही है उसका साम्राज्य
 घनीभूत अडोल वह है सहज ही ज्ञातव्य
 पर डोलता रहता है पर्दे पर खेल
मन का अनवरत
तो छिप जाती है आत्मा
असम्भव है जिसके बिना मन का होना
उसके ही अस्तित्त्व से बेखबर है यह छौना
नींद में जब सो जाता है मन कुछ पल को
आत्मा ही होती है भीतर
तभी नींद सबको इतनी प्यारी है
नींद में ही हो जाती है खुद से मुलाकात
 पर अफ़सोस ! नहीं हो पाती तब भी उससे बात
जागरण में तो दूर हैं ही उससे
शयन में भी हो जाते हैं दूर उससे
कब होगा वह ‘जागरण’
जब जगते हुए भी प्रकटेगी वह और नींद में भी....




सोमवार, जुलाई 29

स्मृति का देवदूत


स्मृति का देवदूत

याद के घट में प्रीत की नमी
भरके जब दिल के करीब लाई ही थी वह
क्षण भर भी नही लगा 
बादल छा गये अंतर आकाश पर
ऐसा खामोश अंधड़ उठा भीतर
चुप्पी की गर्जना हुई
दामिनी दमकी टीस सी
और तभी कूकने लगी कोयल सी धारा
नृत्य जगा शांत कदमों में
हँसी जो बाहर नहीं सुनी किसी ने
पर गूंज उठा अंतर उपवन
कोलाहल बहुत था
उमड़ती भाव रश्मियों का
स्पंदनो और कम्पनों का
अनसुना नहीं रहा होगा किसी के तो कानों से
दूत बन कर जो आया था स्मृति का
ठगा सा तकता रहा निर्निमेष !