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शुक्रवार, फ़रवरी 21

मन

मन 


नींदों के पनघट पे 

यादों को बुनता है, 

ख़्वाबों के झुरमुट में 

शब्द पुष्प चुनता है !


भावों की माला रच 

ताल में पिरोता है, 

अर्पित कर चरणों में 

अश्रु में भिगोता है !


जाने क्या पाएगा 

गीत रोज़ गाता है, 

तारों से बात करे 

चंदा संग जगता है !


किसकी वह राह तके 

किसको पुकारे सदा, 

शब्दों की नाव बना 

मन, सागर तिरता है !


शनिवार, दिसंबर 30

बीत गया एक और वसंत

बीत गया एक और वसंत

जाते हुए बरस का हर पल 

याद दिलाता सा लगता है,

बीत गया एक और वसंत

सपना ज्यों का त्यों पलता है !


दस्तक दे नव भोर जतन हो 

स्वप्न अधूरा मत रह जाये,   

नये वर्ष में हर कोई मिल 

 जीवन का गीत गुनगुनाये !


 गली का हर कोना स्वच्छ हो 

गौरैया को दाना डालें,

 ख्वाब अधूरा जो वर्षों का 

 अंजाम पर उसे पहुँचायें  !


दरियाओं को और न पाटें 

जहर फिजाओं में न मिलायें, 

सुख की नींद मिले  माँओं को 

बेटियों  को कभी  न जलायें !


ख़ुद को पहचाने  हर बच्चा 

 तालीम का सूरज उगायें, 

दम न तोड़े  भटक कर यौवन

 सब अपनी भूमिका निभायें  !


छंट जाएँ आतंक की धुँध  

हर जुल्मो सितम से छुड़ायें,

घर से दूर हुए नौनिहाल 

बिछुड़े हुओं को पुन: मिलायें  !


 बेघर किया जिन्हें वन काटे

 स्वार्थ हेतु न उन्हें मरवायें, 

 छुड़ा   क़ैद  से मासूमों को

हक सुखद जीवन का दिलायें !


नया वर्ष दस्तक दे, उससे 

पहले कुछ नव रस्म बना लें,

छूट गये जो साथी पीछे

निज संग चलने को मना लें !


रविवार, अप्रैल 16

पलकों में है बंद ख़्वाब इक


पलकों में है बंद ख़्वाब इक 


झर-झर झरता बादल नभ से 

सम्मुख दरिया भी बहता है,

सब कुछ पाकर भी इस दिल का 

प्याला ख़ाली ही रहता है !


जाने किसको ढूँढ रही हैं 

 दिवस-रात्रि स्वप्निल दो आँखें  

जाने कैसे बिगड़ी जातीं  

 बनते-बनते सारी बातें ! 


हर सुख पाया है इस जग का

फिर भी इक कंटक  चुभता है, 

पलकों में है बंद ख़्वाब इक 

अक्सर ही आकर तकता है ! 


पूर्ण नहीं होती यह कैसी 

प्यास जगी है अंतर्मन में, 

जीवन सूना-सूना लगता 

थिरता कब  आयी जीवन में !


कसक न दिल की दूर हुई है 

 कैसे होगी यह भान नहीं, 

सुख-सुविधा के अंबार लगे  

ख़ुद का ही नर को ज्ञान नहीं ! 


बुधवार, नवंबर 24

नया दिन

नया दिन 


मिलता है कोरे काग़ज़ सा 

हर नया दिन 

जिस पर इबारत लिखनी है 

ज्यों किसी ख़ाली कैनवास पर 

रंगों से अनदेखी आकृति भरनी है 

धुल-पुंछ गयीं रात की बरसात में 

मन की गालियाँ सारी 

नए ख़्यालों की जिनसे 

बारात गुजरनी है 

हरेक दिन 

एक अवसर बनकर मिला है 

कई बार पहले भी 

कमल बनकर खिला है 

हो जाता है अस्त साथ दिनकर के 

पुनः उसके उजास में 

 कली उर की खिलनी है 

जीवन एक अनपढ़े उपन्यास की तरह 

खुलता चला जाता है 

कौन जाने किस नए पात्र से 

कब मुलाक़ात करनी है 

हर दिन कोई नया ख़्वाब बुनना है 

हर दिन हक़ीक़त भी 

अपनी राह से उतरनी है 

अनंत सम्भावनाओं से भरा है जीवन 

कौन जाने कब किसकी 

क़िस्मत पलटनी है !